सभी सत्ताओं पर भारी डिजिटल सत्ता
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....

सभी सत्ताओं पर भारी डिजिटल सत्ता

व्यंग्य के बारे में यह धारणा प्रचलित है कि उसका निशाना सदैव सत्ता पर होना चाहिए। इसका मूल कारण यह है कि सत्ता के पास ही वास्तविक शक्ति निहित होती है। सत्ताधारी, चाहे राजनीतिक हों या किसी अन्य क्षेत्र के, जब चाहे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए कमजोरों पर अत्याचार कर सकते हैं। यहाँ सत्ता से आशय केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं है; इसमें समाज में मौजूद सभी प्रकार की सत्ताएँ – राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, संगठनात्मक या प्रशासनिक, शामिल हैं। ये घोषित अथवा अघोषित रूप से एक ही सिद्धांत का पालन करती हैं – अपनी श्रेष्ठता का निरंतर प्रदर्शन। सत्ता के इन सभी स्वरूपों में, किसी न किसी रूप में अधिनायकवाद प्रवेश कर ही जाता है।

1955 में प्रकाशित युनेस्को की एक रिपोर्ट में सत्ता को “स्वीकृत, सम्मानित, ज्ञात एवं औचित्यपूर्ण शक्ति” कहा गया है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विचारक हेनरी फेयोल के अनुसार – “सत्ता आदेश देने का अधिकार और आज्ञा का पालन करवाने की शक्ति है।” एक अन्य विचारक थियो हैमेन मानते हैं -“सत्ता वह वैधानिक शक्ति है, जिसके बल पर अधीनस्थों को निर्धारित सीमाओं के भीतर कार्य करने का अधिकार दिया जाता है।” रॉबर्ट बायर्सटेड के शब्दों में – “सत्ता शक्ति के प्रयोग का वैधानिक अधिकार है, स्वयं शक्ति नहीं।”

अन्य संदर्भों में भी सत्ता की कई परिभाषाएँ मिलती हैं, जैसे –

रोबे: “व्यक्तियों और समूहों का हमारे राजनीतिक निर्णय व व्यवहार को प्रभावित करने का अधिकार।”

जैक्यूज मेरिटेन: “नेतृत्व एवं आदेश देने, दूसरों के द्वारा सुने जाने एवं अनुज्ञा पालन करवाने का अधिकार।”

हैरॉल्ड डी. लासवेल: “सत्ता का वास्तविक आधार अधीनस्थों की सहमति होती है।”

जे. फ्रेडरिक: “किसी चाह या प्राथमिकता के औचित्य को तार्किक रूप से सिद्ध करने की क्षमता।”

रॉबर्ट ए. डहल: “औचित्यपूर्ण शक्ति या प्रभाव।”

जान ड्यूविन: “संगठित समूह स्थितियों में शक्ति का ऐसा प्रकटीकरण, जो औचित्य के साथ जुड़ा हो।”

लुईस एलन: “दिए गए कार्यों को संपन्न कराने के लिए प्रदान की गई शक्तियाँ और अधिकार।”

इन परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सत्ता का एक स्वतंत्र अस्तित्व है, जिसके मूल में शक्ति और प्रभाव निहित हैं। यह शक्ति मूलतः मानव कल्याण और न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदान की जाती है, किंतु व्यवहार में यह आदर्श हमेशा उस आदर्श उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती। जब सत्ता अपने उद्देश्य से भटक जाती है, तो उसके भीतर छिपी विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ और खोखलापन सतह पर आ जाता है। यही वह बिंदु है, जहाँ से सत्ता के विरुद्ध व्यंग्य का जन्म होता है। व्यंग्यकार का उद्देश्य सत्ता से टकराना या जन-आंदोलन खड़ा करना नहीं है, बल्कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को आईना दिखाना, उन्हें सही मार्ग की प्रेरणा देना और उनकी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करना है।

मैक्स वेबर ने सत्ता के तीन मूल प्रकार बताए हैं – परंपरागत, बौद्धिक और दैवीय (या करिश्माई)। समय के साथ इनकी कई उपशाखाएँ और स्वरूप सामने आए, जिन पर आज के संदर्भ में भी विचार आवश्यक है।

राजनीतिक सत्ता: यहाँ सत्ता का अर्थ राज्य, शासन-व्यवस्था और राजनीतिक संस्थाओं से है। इतिहास साक्षी है कि देश में चाहे राजशाही रही हो या आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था, राजनीतिक सत्ता एक परंपरा के रूप में स्वीकृत रही है। थॉमस हॉब्स (इंग्लैंड), एवं निकोलो मैकियावेली (इटली) जैसे विचारकों ने शक्ति को राज्यसत्ता का प्रमुख आधार माना जबकि कार्ल मार्क्स (जर्मनी) ने सत्ता को बदलते वर्ग-संबंधों पर निर्भर बताया और अंततः सत्ता-विहीन समाज की कल्पना प्रस्तुत की।

राजनीतिक सत्ता की चिरस्थायी विसंगतियों में सेंसरशिप, सूचनाओं पर नियंत्रण, दमन और प्रतिबंध शामिल हैं। आधुनिक युग में भी सत्ता का आधार कानूनी शक्ति है। प्रजातांत्रिक देशों में भी इसी शक्ति के बल पर शासकों को निरंकुश होते देखा गया है। शक्ति के साथ विसंगतियों का आना स्वाभाविक है। मध्ययुगीन राजाओं ने सत्ता को स्थायी बनाने के लिए स्वयं को ‘ईश्वर का प्रतिनिधि’ घोषित किया और यह प्रचारित किया कि उनके आदेशों की अवज्ञा, ईश्वर की अवज्ञा के समान है। आज भले ही यह संभव न हो, लेकिन सत्ता के चरित्र के कारण अनेक सत्ताधीश आज भी यह गुमान पाले रहते हैं कि वे सर्वोच्च हैं।

इन विसंगतियों को उजागर करने का कार्य व्यंग्यकार लंबे समय से करते आए हैं। अंग्रेज़ी शासन के दौर में बालमुकुंद गुप्त ने शिवशंभू के चिट्ठे जैसे तीखे व्यंग्य लिखकर औपनिवेशिक निरंकुशता और दमनकारी रवैये को तीखे अंदाज़ में बेनकाब किया। आधुनिक दौर में हरिशंकर परसाई की पगडंडियों का जमाना, सदाचार का ताबीज और राजा नहीं, प्रजा बोल रही है, तथा शरद जोशी की जादू की सरकार और वोट ले, दरिया में डाल जैसी रचनाएँ राजनीति की विडंबनाओं पर सटीक चोट करती हैं।

पितृसत्ता: यह परंपरागत सत्ता का स्वरूप है, जो सदियों से हमारे सामाजिक ढाँचे में गहराई से पैठी हुई है। परिवार, समाज और यहाँ तक कि भाषा में भी पुरुष वर्चस्व का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। घर के निर्णयों से लेकर विरासत के अधिकार तक, अधिकतर परिस्थितियों में तराज़ू पुरुषों के पक्ष में झुका रहता है। ‘लड़का घर का वारिस है’ और ‘लड़की पराया धन’ जैसी कहावतें पितृसत्ता की सांस्कृतिक स्वीकृति को दर्शाती हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने के बावजूद यह सत्ता अपने रूप बदलकर मौजूद रहती है – कभी खुले आदेशों में, तो कभी भावनात्मक दबाव में। व्यंग्यकारों ने इसे भी बार-बार निशाने पर लिया है, चाहे वह बेटी की शादी को ‘परिवार की प्रतिष्ठा’ का प्रश्न बना देने की प्रवृत्ति हो या फिर महिला की सफलता को ‘पति के सहयोग’ का अनिवार्य परिणाम मानने की मानसिकता हो। पितृसत्ता अक्सर अपनी कठोरतम दीवारें ‘परंपरा’ और ‘संस्कार’ के नाम पर खड़ी करती है। सुभाष चंदर का अथ: श्री बाबू पुराण और के.पी. सक्सेना का मिर्जा का स्वेटर जैसी रचनाएँ इस सत्ता की विडंबनाओं को तीखे व्यंग्य के साथ सामने लाती हैं।

सामाजिक / संगठनात्मक सत्ता: यह मूलतः बौद्धिक सत्ता है, लेकिन जब यह सत्ता समूहवाद, विचारधारात्मक झुकाव या व्यक्तिगत नेटवर्क की पिछलग्गू बन जाती है, तो विसंगतियों को जन्म देती है। किसी भी संस्था – चाहे वह राजनीतिक दल हो, धार्मिक मठ हो या साहित्यिक मंडली, का संचालन प्रायः कुछ चुनिंदा लोगों के हाथ में सिमट जाता है। पद, अधिकार और संसाधनों का केंद्रीकरण तथा जाति, वर्ग, लिंग, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर असमान बंटवारा, संगठन में गुटबाज़ी, पक्षपात और अवसरवाद को बढ़ावा देता है। असहमति जताने वालों को हाशिये पर धकेलना और ‘अनुशासन’ के नाम पर आलोचना को दबा देना इसकी आम प्रवृत्ति है। यह सत्ता अपने समर्थकों के विवेक को कुंद कर उन्हें भीड़ में बदलने का हुनर रखती है। व्यंग्यकार इस सत्ता के ‘अंदरखाने के सच’ उजागर करते हैं, जहाँ मंच पर मुस्कान और मंच के पीछे चालें साथ-साथ चलती हैं। हरिशंकर परसाई की विधायकों की विक्री और आवारा भीड़ के खतरे इस श्रेणी के प्रतिनिधि व्यंग्य हैं।

प्रशासनिक सत्ता: यह बौद्धिक सत्ता का ही रूप है, जो सीधे तौर पर आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करती है। कानून, नियम और नीतियों को लागू करने का अधिकार प्रशासन के पास होता है। आदर्श स्थिति में यह सत्ता जनकल्याण के लिए होनी चाहिए, किंतु व्यवहार में यह अक्सर लापरवाही, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही में उलझ जाती है। साधारण कार्य के लिए महीनों चक्कर लगवाना, नागरिक की परेशानी को ‘अभी फाइल आगे बढ़ेगी’ जैसे कोडवर्ड में बदल देना, और सुविधा शुल्क की मौन अपेक्षा रखना, इसके विकृत रूप हैं। व्यंग्यकार ऐसे प्रसंगों पर कटाक्ष करके जनता की झुंझलाहट को स्वर देते हैं और प्रशासन को उसकी जिम्मेदारी का बोध कराते हैं। भोलाराम का जीव, मैं नरक से बोल रहा हूँ, सदाचार का ताबीज (सभी हरिशंकर परसाई), जामुन का पेड़ (कृष्ण चंदर) एवं जीप पर सवार इल्लियाँ (शरद जोशी) प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़ी करने वाली महत्वपूर्ण व्यंग्य रचनाएँ हैं।

धार्मिक सत्ता: यह दैवीय सत्ता का ही एक रूप है, जिसका प्रभाव प्राचीन काल से लेकर आज तक समाज पर काफी गहरा रहा है। धार्मिक नियम और दिशा-निर्देश समाज में कानून की तरह माने जाते हैं। विसंगतियाँ तब उत्पन्न हुईं, जब मठाधीशों ने अपने श्रीमुख से निकले हर वचन को नियम का दर्जा दिलाने का दुराग्रह किया और आदेशपूर्ण रवैया अपनाया। आज भी कई बाबा और महात्मा ऐसे दावे करते मिल जाते हैं कि उनकी चरण-रज लेने से पुत्र-प्राप्ति होगी या उनके चरण धोकर पीने से मोक्ष मिल जाएगा। एक बाबा तो बाकायदा अपने भक्तों की “ठठरी बारने” की बात करते हैं, जबकि एक अन्य बाबा पच्चीस वर्ष से अधिक उम्र की अधिकांश लड़कियों को अपवित्र मानते हैं। उनके श्रीमुख से निकले ऐसे विचार, यहाँ जस के तस रखने पर, महिला समाज के प्रति असहिष्णुता का परिचय देंगे। पाँचवें पैगम्बर (भारतेंदु हरिश्चंद्र) तथा वैष्णव की फिसलन (हरिशंकर परसाई) को इस श्रेणी की श्रेष्ठ रचनाओं में रखा जा सकता है।

सांस्कृतिक सत्ता: यह सत्ता भाषा, संस्कृति, परंपरा और विचारों के माध्यम से लोगों के सोच और व्यवहार को प्रभावित करती है। इसकी जड़ें समाज के वर्चस्वी मूल्यों और मान्यताओं में होती हैं। किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। लोकाचार, परंपराएँ, उत्सव और भाषाई शुद्धता, ये सभी सांस्कृतिक सत्ता के उपकरण हैं। संतुलित रूप में यह सत्ता एकता और समरसता लाती है, लेकिन अतिरेक में यह रूढ़िवाद और कट्टरता का रूप ले लेती है। ऐसे में यह सत्ता तय करने लगती है कि कौन-सा विचार प्रतिष्ठित होगा और कौन हाशिए पर रहेगा। साहित्य, संगीत, रंगमंच और सिनेमा पर ‘संस्कृति के रक्षकों’ का हस्तक्षेप इसका उदाहरण है। ये तथाकथित रक्षक जनता के लिए यह तय करने का ठेका ले लेते हैं कि उन्हें क्या सुनना, देखना या पढ़ना चाहिए। इसी दबाव के प्रतिरोध में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श जैसी धाराएँ उभरीं। भाषाई कट्टरता का ताजा उदाहरण महाराष्ट्र और तमिलनाडु में देखने को मिल रहा है, एक राष्ट्र के रूप में हमारी सांस्कृतिक पहचान और बहुलता में एकता के सिद्धांत को कमजोर करता है। व्यंग्यकार ऐसे ‘संस्कृति-रक्षकों’ के पाखंड को उजागर करते रहे हैं। हरिशंकर परसाई की सुदामा के चावल, हम तो परभाकर हैं जी, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, ग्यान चतुर्वेदी की रामबाबू का बसंत और सूर्यबाला की भगवान ने कहा था जैसी रचनाओं में धर्म और कर्म की संस्कृति पर तीखे व्यंग्य मिलते हैं।

डिजिटल सत्ता: आज का दौर भूमंडलीकरण उत्तर-आधुनिक विमर्श और मीडिया की विस्मयकारी प्रगति का युग है। इस दौर में हमें नियंत्रित करने वाली एक अलग तरह की सत्ता जन्म ले चुकी है। यह सत्ता है डिजिटल सत्ता। इसका संचालनकर्ता अन्य सत्ताओं की तरह, हमारे सामने नहीं होता। वह अदृश्य रह कर हमें अपने इशारों पर चलने को विवश करता है। इसकी ताकत इतनी है कि हम अनजाने ही इसके हाथों के खिलौने बन गए हैं।

इस सत्ता में अपार विसंगतियाँ हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि हम उन विसंगतियों को खुद को अत्याधुनिक दिखाने की धुन में अपने ऊपर हावी होने दे रहे हैं। हम इनके दुष्परिणामों से गुजरते हुए भी उनका एहसास नहीं कर पा रहे हैं| यदा-कदा अखबारों में ये विसंगतियाँ सुर्खियाँ बनती हैं लेकिन हम उन्हें दूसरे की नादानी समझ कर नजरअंदाज कर देते हैं। कुल मिलाकर, हम अनंत डिजिटल विसंगतियों के बीच जी रहे हैं, लेकिन इनके घातक परिणामों को लगातार अनदेखा कर रहे हैं। ये विसंगतियां अब हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी हैं। उदाहरण के तौर पर

  • प्लास्टिक मनी ने हर घर को गैर-जरूरी वस्तुओं का भंगार बना दिया है।
  • पीएस फ़ोर व निनटेंडो जैसे गेमिंग उपकरणों ने बच्चों को पार्क और खेल मैदानों से दूर कर दिया है।
  • फायर फैयरी व ब्लैक आउट चैलेंज जैसे ऑनलाइन गेम्स बच्चों के भोले मन को दूषित कर उन्हें जानलेवा हरकतों के लिए उकसाते हैं।
  • अलेक्सा एवं गूगल नेस्ट हब जैसी डिवाइस जैसी डिवाइस हमें अनजाने में आलसी बना रही हैं। बिजली और टीवी के स्विच ऑन/ऑफ करना तक हमने इन्हें सौंप दिया है।
  • हम मोबाइल में दिन-रात डूबे रहते हैं, खुद को महाज्ञानी समझते हैं, पर अनजान लिंक्स पर क्लिक करके अपना बैंक अकाउंट खाली करवा बैठते हैं।
  • किताबों से दूर होते जा रहे हैं और व्हाट्सएप ज्ञान को ही सत्य मानने लगे हैं।
  • रील्स की मायावी दुनिया में खोकर, आज की सच्चाई भूल बैठे हैं।

कुछ व्यंग्यकारों ने इस दिशा में काम किया है, पर यह संख्या बहुत कम है। इस आलेख के लेखक ने सोशल मीडिया की विसंगतियों पर सर्वाधिक व्यंग्य लिखे हैं। उनका संग्रह “डियर! तुम बुद्धू हो” तो पूरी तरह इन्हीं विषयों पर केंद्रित है| फिर भी, यह मानना पड़ेगा कि इन विसंगतियों पर जितना गंभीर और प्रभावी लेखन होना चाहिए था, उतना हुआ नहीं है। इन विसंगतियों को पकडने के लिए अध्ययन और तकनीक का ज्ञान जरूरी है लेकिन आज के अधिकांश व्यंग्यकार अध्ययन करना नहीं चाहते इसलिए वे इन विसंगतियों पर असरकारी ढंग से कलम नहीं चला पा रहे हैं। व्यंग्य के इस परिदृश्य पर ज्ञान चतुर्वेदी ने “द वायर” में प्रकाशित एक आलेख में बडे मार्के की बात लिखी है – “आज का दौर व्यंग्य का है भी और नहीं भी है। आज के जटिल समय को व्याख्यायित करने, समझने और लिखने के लिए व्यंग्य सबसे सटीक हथियार होना था। आज की कविता और कहानी की भाषा और शैली में व्यंग्य खुलकर है परंतु आज के व्यंग्य से व्यंग्य गायब है या बहुत शिथिल हुआ है। यह कैसी उलटबांसी है कि जब व्यंग्य सबसे जरूरी है तब ही हमारा व्यंग्यकार खूब लिखते हुए भी व्यंग्य से उदासीन-सा बैठा है।”

इस निराशाजनक स्थिति के बावजूद कुछ व्यंग्यकारों ने हास्यमिश्रित लहजे में सोशल मीडिया तथा तकनीकी विसंगतियों पर लिखा है, उनमें से जो मुझे उल्लेखनीय लगे उनके शीर्षक हैं – “आलू कैसे छीलें” (रमेश सैनी), “अरे सोशल मीडिया के एक्सपर्टों, थोड़ा सा रहम करो!” (नीरज बधवार), “व्हाट्सएप के पढ़े लिखे” (आलोक पुराणिक), “मोबाइल रिपेयर सेंटर” (अनूप शुक्ल), “सोशल मीडिया, अनसोशल लोग” तथा “रील का सैलाब” (राकेश सोहम), “अलेक्सा तुम ही बतलाओ हम बतलाएं क्या” तथा “ऐसा भी क्या सेल्फियाना” (प्रभात गोस्वामी), “पी राधा और मैं” तथा “उफ्फ ये एप” (अरुण अर्णव खरे) आदि। इनके अलावा इन विसंगतियों पर गंभीर सवाल खड़े करने वाले व्यंग्यों में “गाय, सुअर और सोशल मीडिया” तथा “मेरी आवाज ही मेरी पहचान नहीं है” (शांतिलाल जैन), “पहले माइंड रीडिंग तो कर लेते जनाब” (प्रदीप उपाध्याय), “ब्लू व्हेल गेम और किसान” तथा “ऑनलाइन और ऑफलाइन के सरोकार” (अरुण अर्णव खरे) उल्लेखनीय हैं।

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संदर्भ: विभिन्न शिक्षा वेबसाइट्स एवं ब्लॉगस्पॉट (हिंदीएमएनएस आदि)

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

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