
- September 16, 2025
- आब-ओ-हवा
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'आज भी खरे हैं तालाब' अनुपम मिश्र के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं है, यह तो उनकी उपलब्धियों के महान कोष का एक छोटा-सा हिस्सा है। अनुपम मिश्र आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी विराट सोच है। इस संदर्भ में टीवी कार्यक्रम 'सत्यमेव जयते' हेतु प्रसिद्ध अभिनेता आमिर ख़ान द्वारा अनुपम मिश्र से की गयी बातचीत महत्वपूर्ण है। समाज के लिए उपयोगी यह बातचीत जनहित में यहां साभार जारी की जा रही है। कवि, लेखक सोनू यशराज के सौजन्य से प्रस्तुत है उसी बातचीत का यह अंश-
पानी की कहानी... अनुपम मिश्र से आमिर खान की बातचीत
आमिर ख़ान: मल्हार के इस देश में यह नौबत आ गयी कि पानी के लिए ख़ून बह रहा है। मुझे बताइए हम इस स्थिति में कैसे पहुँचे और क्यों?
अनुपम मिश्र: पहले मैं बताना चाहूँगा कि पानी जब इस धरती पर नहीं था, तब जि़न्दगी नहीं थी। पानी आने के बाद ही हमारे आने का क़िस्सा, ज़िन्दगी शुरू होती है। इसलिए यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि पानी चला गया तो हम भी चले जाएंगे। पानी के मामले में हम लोग ग़रीब बिल्कुल नहीं हैं। पानी हमको क़ुदरत ने इतना अच्छा दिया, हर साल दिया। एक तो यह है कि एक बार लॉटरी खुल जाये और फिर न खुले कई दिनों तक। लेकिन हर साल लॉटरी खोलती है क़ुदरत। पर हमारी जेब में उसको रखने की तमीज़ तो हमें आनी चाहिए। हमने अपनी जेब फाड़ ली है, तो पानी आता है और चला जाता है।
आमिर: ऐसा कहते हैं कि जब अँग्रेज़ हमारे देश में आये तो क़रीब-क़रीब हमारे पाँच लाख गाँव और कुछ हज़ार छोटे-बड़े शहर होंगे, इन सबमें तालाब हुआ करते थे, बड़ी-बड़ी झीलें हुआ करती थीं और उन सबमें ऊपर वाला हर साल पानी देता है। उसे हम लोग भर लेते थे। हर जगह का समाज उसको ठीक से रोकना जानता था। ज़िन्दगी उसके इर्द-गिर्द चलाते थे। अभी हमने वह सब खो दिया। और हमने सोचा कि पानी तो कहीं से भी आ जायेगा।
अनुपम: अगर हम अपने शहर दिल्ली की बात करें, कहते हैं एक समय में दिल्ली में 800 तालाब थे। आज गिनती के पाँच तालाब नहीं हैं दिल्ली में। हमें लगा कि पानी की कोई क़ीमत नहीं है, ज़मीन की क़ीमत है। और उस पर हमने दुकान बना दी, मकान बना दिये, कुछ स्टेडियम बना दिये, तालाब नहीं रहने दिये। अब दिल्ली में पानी उतना ही गिरता है, जितना पहले गिरता था, पर वह रुकता नहीं है। कहाँ जायेगा वह। बाढ़ आयेगी, पानी बहकर हमारे कमरों में आयेगा, हमारे दफ़्तरों में आयेगा। यह हालत आज हमारे सामने है।

आमिर: लेकिन जब इतने तालाब थे हमारे देश भर में तो फिर ये ऐसे कम कैसे हो गये? क्यों ऐसा हुआ?
अनुपम: जब अँग्रेज़ आये, उससे पहले ये दिक़्क़त नहीं थी। उनके आने से राज करने का तरीक़ा बदला। एक छोटा-सा उदाहरण बताता हूँ। जब अँग्रेज़ आये मैसूर राज्य था। उस समय 40,000 तालाब थे मैसूर राज्य में। एक अकेले राज्य में। इसको राज और समाज दोनों मिलकर बनाता था, रखवाली करता था। इसमें राजा अपनी तरफ़ से कुछ पैसा डालता था। जब अँग्रेज़ों के हाथ में राज आया तो उन्होंने कहा कि हम क्यों डालें? ये तालाब तो तुम्हारे हैं। हम नहीं डालेंगे इसमें पैसा। फिर उन्होंने कहा कि ये तालाब तुम्हारे हैं, लेकिन तुम इनसे सिंचाई लेते हो इसलिए हम सिंचाई पर टैक्स लगाएंगे। फिर उन्होंने कहा कि तालाब भी हमारे हो गये अब। इस तरह लोगों की मिल्कियत चली गयी, इज़्ज़त चली गयी और उनकी जेब काट ली गयी। तो लोगों ने तालाबों की रखवाली बन्द कर दी। लोगों का जो ममत्व था, अपनापन था वह ख़त्म होता चला गया। फिर टूटने लगे तो हम लोग धीरे-धीरे सरकार पर निर्भर होते रहे। अब 100 साल 200 साल में हम उसके नतीजे देख रहे हैं। अब हमें सूझता नहीं है कि हमें क्या करना है।
आमिर: अनुपम जी, मुझे बताइए कि ज़मीन के नीचे जो पानी है, वह क़ुदरत में आता कैसे है?
अनुपम: पानी तो सब ऊपर से आता है। वह कुछ लाख साल में नीचे जमा हुआ है। इस धरती को सचमुच मिट्टी की बहुत बड़ी गुल्लक बनाकर दी है ऊपर वाले ने, जिसे अँग्रेज़ी में पिगी बैंक कहते हैं। पानी की एक-एक बूँद अन्दर डालते जाओ। सूरज की गर्मी से वह सारा ऊपर नहीं उड़ जायेगा। नीचे ढक्कन लगाकर आपने उसे सुरक्षित रख लिया है। अब उसको जब ज़रूरत पड़े तो थोड़ा-सा निकाल लो, इस्तेमाल करने के लिए। अभी हम सोचते हैं कि इन्द्र ने जो चुटकी चलायी, हम तो एक चुटकी में पानी निकाल लें।
हमने अपनी धरती को छेदने का काम शुरू किया, छलनी बना दिया। जगह-जगह बोरिंग, ट्यूबवैल खोदकर। पहले तो कुआँ बनता था तो हाथ से पानी खींचना पड़ता था। थोड़े हाथ भी अच्छे होते थे। लेकिन फिर बिजली आ गयी। अब तो बटन दबाने में थकते नहीं हैं तो 100 बाल्टी पानी निकाल लिया। नीचे का अपना ख़ज़ाना हमने ख़ाली करना शुरू कर दिया। और अब हमारे शहरों में और गाँवों में भी पानी के स्तर की बहुत बुरी स्थिति है। आँकड़ों को छोड़ दीजिए। अँग्रेज़ी में शब्द चलता है- उसको ‘डार्क ज़ोन’ कहते हैं। किसी-किसी इलाक़े का पानी इतने नीचे चला गया कि अब उसे ऊपर लाने में आँसू बह जाएंगे लोगों के। और यदि इसको बचाने का कोई इनाम होता हो भारत सरकार का, या आप सबका, तो वह बिजली विभागों को दिया जाना चाहिए। चौबीस घण्टे की बिजली नहीं देते। यदि चौबीस घण्टे की बिजली होती तो हम बटन दबा-दबाकर पूरा पानी ख़त्म कर देते।
आमिर: पहले 200 फीट में पानी मिल जाता था। अब 300, 400, 500 फीट तक पहुँच गया है। इसमें क्या ख़तरे हैं?
अनुपम: शायद क़ुदरत ने हमें इतने नीचे तक जाने की इजाज़त नहीं दी थी। इसके नीचे मत जाना, क्योंकि इसके नीचे हमने कुछ और ज़हरीली चीज़ें भी रखी हैं। शायद हमारे लिए रखी हों- चेतावनी देने। अब हम जब उससे भी नीचे जा रहे हैं तो कहीं हमें फ्लोराइड मिल रहा है, कहीं आर्सनिक मिल रहा है पानी में। ये ज़हर है और ये ज़हर हमारे लोग पी रहे हैं। इसका बहुत बुरा असर हो रहा है। इसको हमारा कोई नया साइन्स, कोई टेक्नोलॉजी रोक नहीं पाएगी, इसका इलाज नहीं है।
आमिर: अच्छा शहरों में हम ये भी देख रहे हैं कि हर जगह सीमेंट लगा दिया है। इससे तो मिट्टी बची ही नहीं जिससे कि पानी जज़्ब हो और जमा हो। अब तो सब टाइल्स हो गया है।
अनुपम: सब टाइल्स हो गया है। इसके कारण पानी ज़मीन के नीचे जाना बन्द हो गया है। हरेक काम हम इस समय सोच-समझकर, प्लानिंग से ऐसा कर रहे हैं- पानी को हमसे दूर करते जा रहे हैं। रिश्ता हमारा टूटता जा रहा है। अब पानी हमें याद दिला रहा है कि सच्चाई तो पानी की क़ीमत की है। ज़मीन की क़ीमत ज़रूर रखो, लेकिन पानी की क़ीमत याद रखो। पानी अब कह रहा है- मैं जीतूँगा, अगर तुम सुधरे नहीं तो।
—अनुपम मिश्र कृत पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पर विस्तृत सूचनाप्रद लेख, सोनू यशराज की कलम से, नीचे दिये गये शीर्षक पर क्लिक कर पढ़ें—
शुक्रिया किताब, ‘आज भी खरे हैं तालाब’
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