
- September 23, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
कला वार्ता स्वरांगी साने की कलम से....
भाषा, साहित्य और कथक की त्रिवेणी: एक विवेचन
वे हिंदी साहित्य के छात्र नहीं हैं, हिंदी उनकी भाषा नहीं है तब भी वे कबीर को जानते हैं, सूर-तुलसी-मीरा को जानते हैं, मीर तक़ी मीर, मिर्ज़ा ग़ालिब, अमीर ख़ुसरो, उमर ख़य्याम… इतना ही नहीं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, निराला, नीरज, अटल बिहारी वाजपेयी को भी। साहित्य-संस्कृति किस क़दर एक-दूसरे से जुड़ी है, इसका नायाब उदाहरण भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली कथक में देखा जा सकता है। कथक में हिंदी का प्रसार इस सुंदर तरीक़े से होता है कि दूर दूसरे देश में रहने वाला भी कवियों और उनकी कविताओं को जानता है और सुदूर दक्षिण भारत में रहने वाला भी। संस्कृति के प्रसार में हिंदी का सहयोगी बनता कथक भारतीय संस्कृति के विस्तार को हिंदी के साथ या कथक के साथ हिंदी की हमजोली उर्दू और हिंदी की बोलियों जैसे अवधि, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली तक ले जाता है। कविता में एक शब्द आता है और उसका एक आयाम कवि रखता है, दूसरा आयाम श्रोता सुनता है लेकिन नृत्य उसे तीसरा आयाम देता है, जिसका अर्थ दर्शकों तक कई आयामों में खुलता है। इस तरह एक कविता जो केवल शब्दों में होती तो उतनी ही दिखती, शब्द जितने उसके अर्थ देते लेकिन जब त्रिआयामी होती है, कथन-श्रवण-दर्शन तो उसके कई अर्थ खुलते चले जाते हैं।
भारतीय संस्कृति का प्रसार जितना हिंदी के ज़रिये हुआ है, उतना ही हिंदी में निहित नृत्य के ज़रिये भी या कहें तो नृत्य और हिंदी दोनों के सुंदर मिलाप से सांस्कृतिक विरासत देश-विदेश की सीमाओं को पार करते हुए चहुँदिशा में प्रसारित हो सकी है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जब अपनी लंबी कविता तांडव में कहते हैं कि ‘नाचो, हे नाचो, नटवर!’ तो बिरला ही होगा, जो ओत-प्रोत होकर नाचने के लिए प्रेरित न हो उठता हो। उसका एक-एक शब्द स्फुरण का संचार करता है ‘आदि लास, अविगत, अनादि स्वन, अमर नृत्य-गति, ताल चिरन्तन, अंगभंगि, हुंकृति-झंकृति कर थिरक-थिरक हे विश्वम्भर!’ …और निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी कविता वर दे’ में भी तो आते हैं ये शब्द – ‘नव गति, नव लय, ताल-छंद नव, नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर नव स्वर दे!’ हम कह सकते हैं जहाँ एक ओर कविता को नयी गति, नयी लय, नये स्वर की चाहना रही है वहीं ब्रजभाषा के कवित्त-सवैये भी कथक नृत्य के भाव पक्ष के अपरिहार्य अंग बने हैं। कविता के शब्दों के साथ तबला, पखावज व नृत्य के बोल जब मिल जाते हैं, तो वे कवित्त हो जाते हैं जिसे लय के साथ पढ़ंत करते हुए प्रस्तुत किया जा सकता है। जिस कविता में अंतर्निहित लय और छंद हों, वह निश्चिय ही नृत्य से जुड़ी मानी जा सकती है। साहित्य उसमें ‘कवित्त’ से जुड़कर आता है। जैसे ‘धाकिटतक धुमकिटतक घिन्नड़ांग, कत्त धिकिट तान धान। राधा उर लगी लगन, कान्हा सो चली मिलन।’ अब इसमें कथक भी है और साहित्य भी। आप इसमें से दोनों को अलग नहीं कर सकते। किसी भी कवित्त को देख लीजिए, उसमें ताल और कविता इसी तरह गुँथी हुई नज़र आएगी। जैसे वे दोनों कभी अलग थे ही नहीं।
आचार्य नंदिकेश्वर कहते हैं- ‘जब मुँह से गाना गाया जाये, हाथों की मुद्राओं से उस गीत के शब्दों का अर्थ बतलाया जाये, आँखों से उसके भाव दिखाये जाएँ और पैरों से ताल के अनुसार ठेका दिया जाये, तब नृत्य होता है।’ क्या यही वजह रही है कि कथक में कभी कवित्त के रूप में, कभी ठुमरी-होरी-चैती के रूप में तो कभी तमाम भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में पदों और वंदनाओं के रूप में कविता ने अपनी जगह लगातार बनायी है। मीरा लिखती थी, मीरा नाचती थी… जयदेव के शब्द और जयदेव का नृत्य दोनों ही बहुश्रुत हैं। इतना कि जैसे ‘लिखना’ और ‘नाचना’ एक ही सिक्के के दो पहलू हों और जो नाच नहीं पाये उन्होंने भी लिखा, नृत्य पर लिखा.. लिखकर नृत्य के होने को घटित कर दिखलाया।
भक्ति काव्य में नृत्य
सूरदास नर्तक नहीं थे लेकिन जब वे कहते हैं ‘अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल’ तो उनके भाव को समझना जैसे नर्तक हो जाना है। नृत्य से जुड़ी कितनी बातें उनके इस पद में आती हैं जैसे- ‘महामोह के नूपुर बाजत, भरम भरयौ मन भयौ पखावज, चलत कुसंगति चाल॥ तृसना नाद करति घट अन्तर, नानाविध दै ताल।’ और तुलसीदास के भजन ‘ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियाँ’ को कोई कैसे बिसरा सकता है? नव रसों में भक्ति और वात्सल्य रस का प्रकटीकरण जब कथक नृत्य द्वारा मंच पर किया जाता है, तो इस भजन की याद अनायास हो उठती है, जिसमें आलंबन है राम। छोटे बालक का आलंबन विभाव, सौंदर्य, क्रीड़ा आदि उद्दीपन विभाव हैं जबकि बालक को स्नेह से गोद में लेना, आलिंगन, चुंबन आदि व्यभिचारी भाव हैं- ‘किलकि किलकि उठत धाय/ गिरत भूमि लटपटाय/ धाय मात गोद लेत / बोलत मुख मधुर मधुर, तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद…’
जबकि श्रीकृष्ण रति भक्ति रस का स्थायी भाव है। अपने आराध्य श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबकर सारा दर्द भूल जाती है और प्रेम बावली मीरा मंदिरों में स्वच्छंद भाव से नाच उठती है- ‘पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।’ मीरा कहती थीं- ‘पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे, लोग कहें मीरा भई बावरी, राणाजी मैं साँवरे के रंग राँची, सज शृंगार, बाँध पग घुँघरू, लोक लाज तजि नाची’… अपने प्रिय प्रभु गिरिधर नागर की चाह में बावरी होकर नाचने वाली मीरा हो जाना अपने आपमें साधना है। जब बात सुर की हो, तुलसी की हो, मीरा की हो और कबीर की न हो तो ऐसा कैसे संभव है? कबीर कहते हैं- ‘नैहरवा हमका न भावे.. केहि विध ससुर जाऊँ मोरी सजनी विषय रस नाच नचावे, बिन सतगुरु अपनो नहीं कोई अपनो नहीं कोई जो यह राह दिखावे’।

हिंदी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में वैष्णव, हिंदू, जैन, सिख आदि परंपराओं द्वारा धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर संबंधी पद जो भक्ति भाव से ओत-प्रोत होकर गाये जाते हैं भजन कहलाते हैं। हम इन्हें भक्ति काल के कवियों द्वारा लिखे भजन कहकर साहित्यिक क्षेत्र तक सीमित नहीं कर सकते क्योंकि भले ही यह इसलिए नहीं लिखे गये थे कि इन पर नृत्य हो… लेकिन नृत्य हुआ.. नृत्यमय यह हुए। नृत्य में आने पर ये अपनी संस्कृति की पताका फहराते देश-विदेश तक पहुँचे। भरत मुनि ने रसों को जिस क्रम में लगाया, उसमें सर्वप्रथम शृंगार को स्थान दिया गया और सबसे अंत में शांत रस को। कबीर के शब्दों में ‘बिन सतगुरु’ उस शांत रस तक पहुँच भी नहीं सकते हैं। माना कि इन पदों को नृत्य करने के आयाम को ध्यान में रखकर नहीं लिखा गया और इसलिए कई नर्तकों ने स्वयं ठुमरियों-कवित्त की रचनाएँ कीं, जिन्हें ख़ासकर नृत्य के त्रिआयामी रूप को ध्यान में रखकर लिखा गया जैसे कि बिंदादीन महाराज रचित –‘सब बन ठन आई श्यामा प्यारी’– वासकसज्जा अभिसारिका नायिका का वर्णन करती हुई ठुमरी। ठुमरी की उत्पत्ति लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से मानी जाती है। वे ख़ुद ‘अख़्तर पिया’ के नाम से ठुमरियों की रचना करते और गाते थे। नवाब वाजिद अली शाह द्वारा लिखी गयी पुस्तक बानी में 36 प्रकार के ‘रहस (बुंदेलखंड में प्रचलित लोक नाट्य कला)’ वर्णित हैं।
लोक रस का प्रवाह
जिन गीत शैलियों का प्रयोग कथक में किया जाता है, उनमें वंदना, नज़्म के साथ ठुमरी भी एक बोल प्रधान गायकी है। राग की शुद्धता का इसमें विशेष महत्व नहीं होता लेकिन शास्त्रीय संगीत की विशेषताएँ ध्रुपद की लयकारी, ख्याल की स्वरबद्धता और टप्पा अंग की तानों जैसी विशेषताएँ ठुमरी में होती हैं। ठुमरी की दो शैलियाँ मानी जाती हैं, पूर्वी अंग और पंजाबी अंग। ठुमरी में ब्रज, अवधी और भोजपुरी जैसी भाषाओं का प्रयोग होता है। कुछ बंदिशें देखिए, आपको खुद अंदाज़ा हो जाएगा कि जब कथक नृत्यांगना या नर्तक ही, इनका प्रयोग भाव-भंगिमाओं के साथ करते होंगे तो पहले कितनी बारीक़ी से उसे समझते भी होंगे ताकि दर्शकों को उसका रसास्वादन हो सके। आप कहेंगे वे कथक पहुँचा रहे हैं, पर देखिए ना, वे बड़ी ख़ूबसूरती से, सलीक़े और नज़ाक़त से और बहुत शांति से हमारी संस्कृति को हमारी अपनी हिंदी भाषा में हर उस दर्शक तक पहुँचा रहे हैं, जो वैसे तो हिंदी को उतना पढ़ता-गुनता नहीं होगा।
अब यह बंदिश देखिए, ‘आज मोरे घर आइल बलमा, करूँगी अदारंग सो रंगरलियाँ, अतर अरगजा सुगंध बसन पेहरूँ, फुलवन सेज बिछाऊँ चुन-चुन कलियाँ’… या ‘मुख मोर-मोर मुसकात जात, अति छबीली नार चली पत संगात, काहू की अँखियाँ रसीली मन भाई’, या ‘बिध सुंदर बा उखलाई, चली जात सब सखियाँ साथ’ या ‘पायल बाजन लागी रे अब, कैसे कर आऊँ तुम्हरे पास अब, सास-ननद मोरी जनम की बैरन, मैं तो तुम्हरी दास अब’ या ‘कोयलिया बोले अम्बुआ डाल पर, रुत बसंत को देत संदेसवा, नव कलियन में गुंजत भंवरा, उनके संग करत रंग रलियाँ, यही बसंत को देत संदेसवा’ या ‘पग लागन देरे मोरे महाराज कुंवरा, सदा रंगीले पीत, मुझे पावन दे, पग लागन गुरु के, अरिये निरगुनी कछु गुन न जाने, बेगुनी का गुन की सुध जाने’… हिंदी जब इतनी कोमलता से देशज भाषाओं से निकलकर पहुँचती है तो कितनी मीठी, कितनी अपनी-सी लगने लगती है। ये केवल हिंदी की किसी बोली के शब्द नहीं, देश की माटी के शब्द हैं इसलिए हर देखने-सुनने वाले को सराबोर कर देते हैं। जब वह हिंदी की गंगोत्री में नहा रहा होता है या कथक की यमुनोत्री में डुबकी लगा रहा होता है, लेकिन उसका अर्घ्य तो साहित्य को चढ़ता है, कला-संस्कृति और भारतीयता को लगता है।
कथक चूँकि शुरू से ही प्रयोगधर्मी रहा है। मंदिरों से निकलकर राजपूत राजाओं के महलों और मुग़ल नवाबों के दरबारों तक पहुँचते हुए इसने न केवल अपनी पोशाक में उस रंग को रँगा बल्कि उसकी प्रस्तुति और उसकी भाषा पर भी उसका प्रभाव दिखा। कभी यह तुलसी कृत ‘श्रीराम चंद्र कृपाल भज मन’ से प्रारंभ हुआ, कभी सूरदास के रामकली राग में बद्ध पद में बहुत सरस तरीक़े से आया कि ‘मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो’ तो कभी मीरा के साथ ‘असुंवन जल सींचि-सींचि’ कहने लगा, तो कभी निदा फ़ाज़ली की नज़्म ‘हवा चलाओ, काम बहुत है हाथ बँटाओ’ से भी सामने आया। अमीर ख़ुसरो के ‘छाप तिलक सब छीनी’ या वाजिद अली शाह के लिखे ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाये’ में हर कोई रँग गया। शब्दों के भावों को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए प्रस्तुतकर्ता के लिए हिंदी भाषा के तत्सम-तद्भव शब्दों को जानना बहुत महत्वपूर्ण रहता है तो दर्शकों में से भी कई भाषा की सुंदरता-मधुरता से मोहित होकर उन शब्दों के अर्थ खोजते गाहे-बगाहे हिंदी के क़रीब आ जाते हैं।
कविताएं और कथक
जैसा कि पहले कहा कथक नृत्य में प्रयोगधर्मिता को हमेशा से सराहा गया है। मेघदूत थिएटर में नृत्यांगना प्रतिभा सिंह ने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अमर कृति ‘राम की शक्ति पूजा’ पर आधारित नृत्य नाटिका प्रस्तुत की थी। कुमुदिनी ने वर्ष 1985 में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की रचना पर आधारित प्रस्तुति “कोट” (खूँटी पर टँगे लोग) दी थी। इस बारे में स्वयं कुमुदिनी का कहना है, जब सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने उनसे अपनी कविता कोट पर नृत्य प्रस्तुत करने को कहा तो वह बहुत पसोपेश में थी, क्योंकि उस कविता के शब्दों को नृत्य में परिवर्तित करना बहुत कठिन था। कुमुदिनी कहती हैं, “उस समय मुझे कवियों से बहुत ईर्ष्या भी हुई क्योंकि वे एक साधारण से कागज़ पर बड़ी से बड़ी या बारीक़ से बारीक़ बात को अभिव्यक्त कर सकते हैं जो कि नृत्य में कई बार कठिन होता है।”
‘कोट’ कविता में एक पुराना कोट है जो खूँटी के सहारे टँगा है। उसकी बाँहों पर धूल जम चुकी है, बटन टूट चुके हैं और लंबी सेवा देने के बाद भी मिले अकेलेपन से वह दुखी है। इस कविता को नृत्य में ढालने के लिए कुमुदिनी ने कोट के स्वभाव को ही प्रदर्शित करने वाला एक किरदार गढ़ा। इस प्रस्तुति की ख़ास बात थी कि पारंपरिक कथक प्रस्तुति की भाँति इसमें शब्दशः अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि उस कविता के भाव को प्रस्तुत करने का प्रयास नये तरीक़े से किया गया था। उमा शर्मा का योगदान इस मामले में अतुलनीय है। उन्होंने 70 के दशक में हिंदी के कवियों की कविताओं को कथक में बहुतायत से शामिल किया। उमा बताती हैं कि उन्होंने पारंपरिक ठुमरी के अलावा सूर, तुलसी, कालिदास आदि की रचनाओं को अपने नृत्यों में शामिल किया। इसके बाद गोपालदास नीरज की कविताओं पर आधारित ‘कारवाँ गुज़र गया’ की प्रस्तुति भी दी। इसमें गोपाल जी अपनी कविताओं का पाठ करते थे और उमा कथक के माध्यम से उन पर भावों की अभिव्यक्ति करती थीं। कथक, कविता और हिंदी ऐसे नज़र आती है जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती का त्रिवेणी संगम हो रहा हो। उमा ने उर्दू के भी कई शायरों को शामिल किया जैसे ग़ालिब, कैफ़ी आज़मी, फ़िराक़ गोरखपुरी, नज़ीर अकबराबादी, मखदूम आदि।
उनकी महत्वपूर्ण प्रस्तुतियों में ‘इंद्रसभा’ का नाम आता है, जिसमें उन्होंने वाजिद अली शाह के समय की नृत्य कला और संस्कृति जीवित करने का काम किया। नवाब वाजिद अली शाह, जैसा कि बताया अपने लिखे के लिए भी जाने जाते हैं और कथक के लिए भी। रानी ख़ानम ने सूफ़ी रचनाओं पर प्रस्तुतियों के अतिरिक्त जयदेव, ख़ुसरो, कालिदास की रचनाओं पर भी नृत्य का संयोजन किया है। इन प्रयोगों को करने में आने वाली कठिनाइयों के बारे में उन्होंने बताया, “मुझे याद है कि मैंने अमीर ख़ुसरो की रचनाओं को नृत्य के ज़रिये पेश किया था। वह प्रयोग अत्यंत कठिन था क्योंकि प्रत्येक पद के दो भाव निकलते थे। एक तो शृंगार प्रधान और दूसरा भक्तिप्रधान। उन संवेदनशील बंदिशों को स्वयं ठीक से समझे बिना पेश करना बड़ा ही मुश्किल काम था, सो मुझे प्रत्येक बंदिश की गहराई में जाकर उन्हें समझना पड़ा, तब कहीं मैं उन्हें ठीक ढंग से पेश कर पायी।”
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर 2010 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भी कार्यक्रम हुआ था, जहाँ रानी ने अपने कार्यक्रम की शुरूआत फ़ैज़ की नज़्म ‘आइए हाथ उठाएँ हम भी/हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं/हम जिन्हें सोज़-ए- मुहब्बत के सिवा/ कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं’ से की थी। इसके बाद ‘राज़े उल्फ़त छुप के देख लिया/दिल को बहुत कुछ जला के देख लिया’, ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब ना माँग’ और अंत में ‘मेरा दर्द-ए-नग़मा-ए-बे सदा’ जैसी रचनाओं की कथक के माध्यम से प्रस्तुति जैसा दुष्कर कार्य किया। इन रचनाओं पर कथक की तकनीकियों की बारीक़ियों और उनकी भाव-प्रवण प्रस्तुति से उन्होंने साबित कर दिया कि कथक का फ़लक कितना बड़ा है।
इस बड़े फ़लक के विस्तार में हर छोटा विद्यार्थी बहुत छोटे-छोटे पदों को सीखते हुए कहीं न कहीं हिंदी भी सीख रहा होता है क्योंकि शब्दों को जाने-समझे बिना, उनके अर्थों को पहचाने बिना, इस तरह की प्रस्तुति नहीं दी जा सकती। अनिल बर्वे के चर्चित नाटक ‘हमीदाबाई की कोठी’ में स्वरांगी साने रचित गीत ‘अपने हिस्से’ पर साराक्षी पुराणिक ने लाइव कथक प्रस्तुत किया। इसका पहली बार मंचन बाल गंधर्व रंगमंदिर, पुणे में हुआ, तदुपरांत दिनकर भवन, बेगूसराय बिहार में। मेरी कविता ‘नर्तकी’ पर जब युवा कथक नृत्यांगना उर्वी गोरे ने प्रस्तुति दी थी, तब आभा निवसरकर द्वारा किये गये पाठ के अलावा केवल भुवन सरवटे द्वारा प्रदत्त तानपुरे की सिम्फ़नी थी। कविता की दो पंक्तियों के बीच के रिक्त स्थान को किस तरह से भरना है, शब्द जहाँ ख़त्म हुआ वहाँ कविता ख़त्म नहीं होती.. मतलब वहाँ पूर्णविराम नहीं दिखना चाहिए.. नृत्य के माध्यम से अनवरतता आनी चाहिए और बीच के ख़ालीपन को मुद्राओं, हाव-भाव, भंगिमाओं या पोस्चर से पूरा करना बहुत ज़रूरी होता है। कथक उस कविता में भराव लाता है या हिंदी को सौष्ठव प्रदान करता है, यह जानना भी बहुत दिलचस्प है। जो इसे जानने की चाह रखने लगता है, वह नाच उठता है। नाचते हुए वह अपनी संस्कृति के पास होता है, अपनी भाषा, अपने परिवेश और अपनी माटी के बहुत करीब होता है।
(तस्वीर रानी ख़ानम की फ़ेसबुक वॉल से साभार)

स्वरांगी साने
प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। यूट्यूबर, कविता, कथा, अनुवाद, संचालन, स्तंभ लेखन, पत्रकारिता, अभिनय, नृत्य, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षा, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर वार्ता और काव्यपाठ। 2 कविता संग्रह, 6 किताबों का अनुवाद, 3 का संपादन, फ़िल्मों के हिंदी सबटाइटल्स, पेटेंट दस्तावेज़ों व भारत सरकार के वेब इंटरफ़ेस आदि स्टार्ट अप्स के लिए अनुवाद।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

इस लेख से एक छूटे हुए पहलू पर ध्यान जाता है। इस लेख में फ्लो बनते बनते बन जाता है और हिंदी को कविता और कथक के बीच में किस तरह जोड़ दिया गया है, पूरी बात समझना मुश्किल हो जाता है। कथक और कविता के रिश्ते के संबंध से अच्छी जानकारियां मिल जाती हैं… Keep it up
इस लेख से एक छूटे हुए पहलू पर ध्यान जाता है। इस लेख में फ्लो बनते बनते बन जाता है और हिंदी को कविता और कथक के बीच में किस तरह जोड़ दिया गया है, पूरी बात समझना मुश्किल हो जाता है। कथक और कविता के रिश्ते के संबंध से अच्छी जानकारियां मिल जाती हैं… Keep it up
बहुत सुन्दर