परवीन शाकिर, parveen shakir
गूंज बाक़ी... पिछली पीढ़ियों के यादगार पन्ने हर गुरुवार। परवीन शाकिर पिछली कुछ पीढ़ियों की महबूब शायर रही हैं। उनके अंतिम संस्कार के क्षणों के अहसास को शब्द दिये हैं उर्दू के मशहूर लेखक, स्तंभकार एवं टेलिविज़न होस्ट मुस्तनसिर हुसैन तारड़ ने। यह तहरीर क़लमकार की वेबसाइट पर और कुछ एक जगह और भी उर्दू में है। (लिप्यंतरण, अनुवाद, प्रस्तुति: ग़ज़ाला तबस्सुम)
संस्मरण मुस्तनसिर हुसैन तारड़ की कलम से....

परवीन शाकिर की मुर्दा उंगलियाँ

           परवीन शाकिर से मेरी दोस्ती या नज़दीकी नहीं थी। कभी किसी साहित्यिक महफ़िल या दावत में आमना-सामना हो जाता, तो वह माथे पर हाथ रखकर सलाम में पहल करतीं, क्या लिख रहे हैं, क्या पढ़ रहे हैं, और कभी-कभी साहित्य के संदर्भ में कोई एक-आध ख़त। ‘ख़ुशबू’ से उसकी शोहरत का आगाज़ हुआ, जिसे ‘अल-तहरीर’ के ख़ालिद सैफ़ुल्लाह ने अहमद नदीम कासमी के कहने पर प्रकाशित किया। और यह एक अजीब संयोग था कि इस प्रकाशन संस्थान ने अपने आगाज़ में जितनी भी किताबें नयी या पुरानी प्रकाशित कीं, वे सभी बेहद लोकप्रिय हुईं। मिर्ज़ा अदीब के ‘सहरा नावर्द के ख़तूत’, मुमताज़ मुफ़्ती की ‘लब्बैक़’, ‘मेरे दो यात्रा वृत्तांत’, ‘निकले तिरी तलाश में’ और ‘उंदलुस में अजनबी’, और परवीन शाकिर की ‘ख़ुशबू’।

इस्लामाबाद के क़ब्रिस्तान में परवीन को विदा करने वाले बहुत कम लोग थे, उसकी अज़ीज़दारी कराची में थी, और वहाँ से यहाँ आज ही के दिन पहुँचना मुश्किल था। कुछ साहित्यकार थे और उसके महकमे के कुछ लोग। आखिरी क्षणों में उसके एक भाई भी पहुँच गये। लेकिन इससे पहले यही समस्या थी कि उसे लहद में कौन उतारेगा क्योंकि कोई नामहरम [वह मर्द जिससे सत्री का पर्दा वाजिब (अनिवार्य) हो, वो शख़्स जिससे निकाह (विवाह) जायज़ हो, जिसकी तरफ़ देखना धर्मानुसार मना हो] ऐसा नहीं कर सकता। हम चार-पाँच लोग क़ब्र की मिट्टी के ढेर पर खड़े थे, और मेरे बराबर में इफ़्तिख़ार आरिफ़ अपने आप को मुश्किल से संभालते थे।

जनाज़ा तो हो चुका था, जो अहले-तशय्यु [मुसलमानों का एक फ़िर्क़ा] के अक़ीदे की नुमाइंदगी करता था। हमने कुछ देर इंतज़ार किया, और इस उलझन का शिकार रहे कि अगर उनका कोई नज़दीकी अज़ीज़ ब-वक़्त न पहुँचा, तो परवीन को लहद में कैसे उतारा जाएगा? मुझे पूरी तफ़्सील तो याद नहीं रही कि उसके भाई कब पहुँचे, लेकिन यह याद है कि किसी ने सफ़ेद कफ़न में लिपटी परवीन शाकिर को इफ़्तिख़ार आरिफ़ के बढ़े हुए हाथों में दे दिया। इफ़्तिख़ार उसे थामे हुए क़ब्र में उतरने को थे कि एकदम उनका रंग ज़र्द पड़ गया, हाथ काँपने लगे। शायद उन्हें अन्जाइना का दर्द शुरू हो गया था। उन्होंने एकदम मुझसे कहा, ‘तारड़, परवीन को संभाल लो।’ मैंने बाज़ू किये और परवीन के जिसद ख़ाकी को थाम लिया। और तब मैं ज़िंदगी के एक नाक़ाबिले बयान तजरुबे से दो-चार हुआ, जिसके बारे में अब भी सोचता हूँ, तो सन्नाटे में आ जाता हूँ।

परवीन शाकिर, parveen shakir

परवीन धान-पान सी लड़की थी, मौत के बावजूद वह बहुत भारी नहीं थी। मैं जान-बूझकर उस जानिब नहीं देखता था, जहाँ उसका चेहरा कफ़न में बंधा था। और फिर मैंने महसूस किया कि मेरे दाएँ हाथ की उंगलियाँ कफ़न में रूपोश परवीन की मुर्दा उंगलियों पर हैं। उन्हें छू रही हैं। उन्हें थाम रखा है। मैं उनकी बनावट महसूस कर रहा था। और उस लम्हे मुझे ख़्याल आया कि यह परवीन का लिखने वाला हाथ है। इन्हीं उँगलियों से उसने वह सब शेर लिखे, जो एक ज़माने के दिलपसंद हुए, एक दास्तान हुए। और फिर मुझे वह शेर याद आया, जो एक ख़ातून ने लिखकर मुझे रुसवा और शर्मिंदा कर दिया था, वह शेर भी तो इन्हीं उंगलियों ने लिखा था। और आज मैं इन्हें बेजान हालत में अपनी उंगलियों से थामे हुए हूँ।

वह लम्हा, वह कैफ़ियत आज भी मेरे बदन पर रसीद है। मैं आज भी परवीन की उंगलियों की मौत को महसूस करता हूँ। इस दौरान परवीन के भाई कराची से आ चुके थे, मुझसे लहद में उतरा न जाता था, किसी और शख़्स ने मेरी मदद की।

परवीन की जवान साल मौत ने पूरी साहित्यिक दुनिया को रंजीदा कर दिया। लोग उसके शेर पढ़ते, उसके लिए रोते रहे और उनमें परवीन क़ादिर आगा भी थीं, उनकी सबसे अज़ीज़ दोस्त। एक ‘गूढ़ी सहेली’ ने परवीन के एक और दोस्त मज़हर इस्लाम के सहयोग से ‘परवीन शाकिर ट्रस्ट’ स्थापित किया, जिसके तहत हर साल परवीन और उसकी शायरी के चर्चे होते, शायरी की नयी किताबों पर पुरस्कार दिये जाते, गायक और शायर उसे नज़राना-ए-अक़ीदत पेश करते।

अफ़सोस कि मैं उनमें से किसी महफ़िल में शरीक न हो सका, क्योंकि मैं शायर नहीं था। और फिर परवीन क़ादिर आगा और मज़हर इस्लाम ने फ़ैसला किया कि इस साल ‘परवीन शाकिर उर्दू लिटरेचर फ़ेस्टिवल’ का आयोजन किया जाये। मुझे और मसऊद अश’अर को फ़िक्शन की नुमाइंदगी करने के लिए बुलावा आ गया। मैं कैसे न जाता? परवीन की मुर्दा उंगलियाँ मुझे बुला रही थीं।

6 comments on “परवीन शाकिर की मुर्दा उंगलियाँ

  1. वह लम्हा वह कैफ़ियत आज भी मेरे बदन पर रसीद है –सारा मंज़र जैसे अपनी आँखों से साँस रोके देखा , बार-बार ध्यान परवीन शाकिर के खूबसूरत हाथों पर जाता रहा।

    इतनी खूबसूरत शख्सियत की मौत… ग़ज़ाला तब्बसुम ने बहुत भावप्रवण अनुवाद किया है।

  2. इसमें कुछ ऐसा नहीं है, जिसे पढना और जानना ज़रूरी हो. परवीन का जब एक्सीडेंट हुआ, वो सुब्ह तेज़ बारिश हो रही थी, और वो दफ्तर के लिए देर नहीं कर सकती थीं… किसे ख़बर थी वो आज क्या फिर कभी दफ्तर नहीं पहुंच पाएंगी….
    -डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

  3. चलने का हौसला नहीं, रुकना मुहाल कर दिया
    इस इश्क के सफर ने तो हमको निढाल कर दिया
    – परवीन शाकिर

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