
- February 3, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
कहानी के बदलते स्वरूप
आज ए.आई. मॉडल, डिजिटल प्रभाव, ऑनलाइन पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया आदि कहानी लेखन और प्रसार को प्रभावित कर रही हैं। लघुकथा, फ्लैश फ़िक्शन जैसे छोटे प्रारूप लोकप्रिय हो रहे हैं। अनुवाद सुविधाओं तथा वैश्विक पर्यटन से हिंदी से इतर भाषाओं और संस्कृतियों के साहित्यिक प्रभाव और भाषाई आदान-प्रदान से कहानी का कैनवास बढ़ा है। विषय और शिल्प की विविधता के कारण, ‘अच्छी कहानी’ के पैमाने बदल गये हैं और अक्सर विवादास्पद रहते हैं। एक विहंगम दृष्टि डालें तो हिंदी कहानी के साहित्यिक मूल्यों और कहानी के शिल्प में समय के साथ निरंतर बदलाव होता ही रहा है।
प्रेमचंद युग आदर्शोन्मुख था। तब कहानी में यथार्थवाद, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना, शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाना प्रमुख मूल्य थे। कहानियाँ सामाजिक यथार्थ को दिखाते हुए भी आदर्शवादी समाधान सुझाती थीं। “कफ़न”, “पूस की रात” जैसी कथाओं का केंद्र यही वास्तविकता थी।
फिर प्रयोगवाद या नयी कहानी का युग रहा। 1950-60 के दशक में कहानी कला में क्रांतिकारी बदलाव आया। व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व, अकेलेपन, अस्तित्वगत संकट, यौनिक और मनोवैज्ञानिक जटिलताएँ कहानी के केंद्र में आयीं। सामाजिक संदर्भ रहा, पर व्यक्ति की भावनात्मक और मानसिक दुनिया का विश्लेषण प्रमुख हो गया। राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर, भीष्म साहनी जैसे महान लेखकों ने ‘यथार्थवाद’ का अर्थ बदला, बाहरी हक़ीक़त से ज़्यादा व्यक्ति की आंतरिक हक़ीक़त महत्वपूर्ण हो गयी।
नयी कहानी के आगे, अकहानी, सचेतन कहानी, समकालीन कहानी ने सामूहिकता से वैयक्तिकता एवं विखंडन को लक्ष्य बनाकर 1960-70 के दशक में स्थापित साहित्यिक मूल्यों, कथा शिल्प और यथार्थ की परंपरागत अवधारणा बदली। जीवन की अतार्किकता, विसंगति, निरर्थकता और संप्रेषण की कठिनाई को अभिव्यक्ति मिली। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती आदि ने कहानी में शिल्पगत प्रयोग गढ़े।
1980 के बाद समकालीन कहानी का दौर विविधता और बहुलतावाद का रहा है। कथा मूल्यों का कोई एक केंद्र नहीं रहा। व्यक्ति की पहचान, उसकी टूटन, अलगाव, शहरी जीवन की जटिलताएँ, स्त्री विमर्श, दलित चेतना, आदिवासी अनुभव, लैंगिक अल्पसंख्यकों की आवाज़ें, पारिस्थितिकी चिंताएँ, सांप्रदायिकता, बाज़ारवाद का प्रभाव आदि मुद्दे कहानियों के विषय बने। नयी कहानियों में ‘ग्लोबल लोकल’ का द्वंद्व भी दिखायी दे रहा है।
समकालीन कहानी लेखन में नये कहानीकार बिना बहुत गहन अध्ययन किये एक दूसरे से प्रभावित होकर इसी परिपाटी को बढ़ाते मिलते हैं। आज बदलते कथा मूल्य, विषय वस्तु का विस्तार, सीमित सामाजिक राजनीतिक विषयों से लेकर मानवीय अस्तित्व के हर पहलू पर लेखकों का ध्यान गया है। कहानीकारों के दायरे बढ़े हैं।
पात्रों की दुनिया का विस्तार हुआ है। ग्रामीण, निम्न मध्यवर्गीय पात्रों के साथ-साथ शहरी मध्यवर्ग, स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ कथा नेत्री बनायी गयीं, दलित, आदिवासी, लैंगिक अल्पसंख्यक, ट्रांसजेंडर भी कहानियों में केंद्रीय पात्र बने।
नैतिकता का स्वरूप बदला है। स्पष्ट सही-ग़लत या नैतिक उपदेश देने की प्रवृत्ति कमज़ोर हुई है। जीवन की विडंबनाएँ, नैतिक द्वंद्व, धूसर क्षेत्र और सापेक्षता को अधिक स्थान मिला। सुखांत या दुखांत लेखकीय निर्णय नहीं बचा, पाठक के विवेक पर कथा अंत छोड़ने के प्रयोग किये गये।
कथ्य पर शिल्प की प्रधानता, भाषा, शैली, संरचना, प्रतीकों और बिंबों के प्रयोग पर अधिक सचेत प्रयोग हुए। कहानी कहने के नये तरीक़े अपनाये गये। कहानीकार की भूमिका समाज सुधारक से अधिक एक संवेदनशील पर्यवेक्षक, विश्लेषक या प्रश्नकर्ता की भूमिका की हुई है। व्यावसायिकता और बाज़ार का प्रभाव स्पष्ट दिख रहा है। प्रकाशन जगत और पाठकीय रुचि के दबाव का असर कहानी में दिखायी दे रहा है। विभिन्न क्षेत्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचानों की कहानियाँ मुखर हो रही हैं।
क्या कहानी का उद्देश्य मनोरंजन है? सामाजिक बदलाव है, या कलात्मक अभिव्यक्ति है? यह प्रश्न बना हुआ है। जिनके उत्तर में कहानीकार पूरी गंभीरता से अपने रचनाकर्म में लगे हुए हैं।
हिंदी कहानी के साहित्यिक मूल्य गतिशील हैं और लगातार विकसित हो रहे हैं। “उसने कहा था” के युग के प्रेम, सामाजिक सरोकारों से लेकर आज की व्यक्तिकेंद्रित, बहुवचनीय और प्रयोगधर्मी कहानियों तक, यह यात्रा हिंदी साहित्य की जीवंतता और समय के साथ संवाद के अपने कैनवास को भव्य तथा समावेशी बनाने की क्षमता को दर्शाती है। कहानी मूलतः क्रिएटिव रचनाकर्म है। इसमें अभिव्यक्ति की ताक़त अंतर्निहित है। यह निरंतर सशक्त विस्तारित होती विधा है, जिसका भविष्य उज्ज्वल है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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कहानी को लेकर आपने बहुत तथ्यात्मक तरीके से बातों को समझाया है। वास्तव में कहानी अपने समय की हलचल का जीवंत दस्तावेज़ है। ये वो तार या रस्सी है जिस पर समय के पंछी बैठते हैं। इनकी छाया देर तक और दूर तक आने वाली नस्लों के लिए बीता समय पढ़ने का काम करती है। ठीक वैसे ही जैसे कोई ज्योतिष शास्त्री आने वाली घड़ी पढ़ने का उपक्रम करता है।
प्रबोध कुमार गोविल जी ने बहुत सही लिखा है।
किन्तु
विषय के अनुसार बहुत छोटा लेख है।