
- October 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
लोकरंग की चाशनी में एस.एन. त्रिपाठी की अमर धुन
राजस्थान की माटी से निकले वीर योद्धा दुर्गादास राठौड़ पर इसी नाम से बनी फ़िल्म “वीर दुर्गादास” साल 1960 में आयी थी। दुर्गादास राठौड़ का नाम औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले बहादुर सैनिक के रूप में बहुत सम्मान से लिया जाता है। फ़िल्म में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता पी. जयराज और निरूपा रॉय केंद्रीय भूमिकाओं में थे और रामचंद्र ठाकुर ने इसे निर्देशित किया था। यह फ़िल्म तो भले ही कम चली लेकिन भरत व्यास की कलम से निकले और एस.एन.त्रिपाठी के लोकरंग से पगे एक-दो गानों की मधुरता आज भी संगीत रसिकों के कानों में रस घोल देती है। आज भी इस गीत के ढेरमढेर कवर वर्जन यूट्यूब पर मिलते हैं और अनेक युवा व वरिष्ठ कलाकार इस गाने पर थिरकते नज़र आते हैं। लेकिन आश्चर्य यह कि सभी कवर वर्जन एस.एन. त्रिपाठी की बनायी मूल धुन के ही इर्द-गिर्द बनाये गये हैं।
ख़ैर हम मूल गीत पर आते हैं, जो है- “थाने काजलियो बनाल्यू, म्हारे नैना में रमाल्यूं, राज पलका में बंद कर राखूं ली”।
लता मंगेशकर और मुकेश के गाये इस गीत को चाहे जितनी बार भी सुनें, उसकी मिठास कम नहीं होती। इस मारवाड़ी लोक गीत में नायिका कहती है कि तुमको मैं अपनी आंखों में काजल बनाकर रखूंगी। पुरानी फ़िल्मी युक्ति की तर्ज पर यह गीत सीधे नायक और नायिका पर नहीं फित्रल्माया गया है बल्कि पर्दे पर हम एक कॉमेडी कलाकार और नर्तकी को यह गीत गाते और नृत्य करते देखते हैं। फ़िल्म चोरी-चोरी की याद ताज़ा हो जाती है जिसमें कठपुतली नृत्य “जहां मैं जाती हूं वहीं चले आते हो” पर राज-नर्गिस भावों को अभिव्यक्त करते हैं। गीत के बोल ठेठ मारवाड़ी में होते हुए भी लुभाते हैं- “म्हारे नैणासों दूर दूर कैयां जाओला जी, ढोला कैया जाओला जी” याने मेरी आंखों से दूर तुम कैसे जाओगे।
स्वर साम्राज्ञी के निर्दोष उच्चार और गायन के लड़ियाव को तो बस महसूसा ही जा सकता है। पर मुकेश के नासाग्र कंठ से “गोरी चुंदड़ी लहर लहरावेली” या गोरी “पलकां मां नींद कईयां आवेली” सुनना बहुत अच्छा लगता है। यह गाना ऊपर-ऊपर से रोमांटिक लगे लेकिन फ़िल्म में यह दुर्गादास को रणभूमि के लिए जाते समय विदा करने का गीत है। राजपूतानी रनिवास के बाहर हो रहे नृत्य गीत का आलंबन लेते हुए आंखों ही आंखों में पति दुर्गादास को आश्वस्त कर रही है कि दुर्गादास उसकी नज़रों से कभी ओझल नहीं हो सकता। उसने काजल बनाकर उसमें पति की छवि अंकित कर ली है…

यूं फ़िल्म में कुछ और गाने भी हैं जिनमें लोक संगीत का इस्तेमाल हुआ है। लेकिन अमरता का वरदान केवल इसी गाने की क़िस्मत में आया है। संगीतकार श्रीनाथ त्रिपाठी की बात करें तो उनके संगीत निर्देशन से सजी फ़िल्म “रानी रूपमती” का ज़िक्र किये बिना नहीं रह सकते। वो वृंदावनी सारंग राग में “आजा, आजा भंवर, सुनी डगर” में लता का शास्त्रीय तानकारी के साथ लगा दमदार स्वर और मुकेश-लता का युगल गीत “आ लौटके आजा मेरे मीत” तो आज भी ख़ूब गाया और सुना जाता है। त्रिपाठीजी की शास्त्रीय संगीत पर अद्भुत पकड़ की मिसाल फ़िल्म के भैरवी में स्वरबद्ध प्रसिद्ध बंदिश से मिलती है। बोल हैं- “बाट तकत नई चुनरी रंग डारी, तोरे बेदर्दी बनवारी” और इसे रफ़ी के साथ मशहूर ख्याल गायक पं कृष्णराव चोणकर ने गाया है। फ़िल्म संगीत सम्राट तानसेन के राग सोहनी में निबद्ध “झूमती चली हवा” की मोहिनी आज भी रसिकों के दिलों पर छायी हुई है। लेकिन त्रिपाठीजी को अधिकतर दोयम दर्जे की ऐतिहासिक और धार्मिक फ़िल्में ही मिलीं इसलिए मधुर संगीत देने के बावजूद वे लोकप्रियता की दौड़ में पिछड़ गये।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
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