
- October 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
ज़ालिम दौर में मासूम शाइरी की आवाज़
शाइरी किसी की ख़ुशामद नहीं करती, उंगली उठाती है। ग़लत को ग़लत और सही को सही कहने की ताक़त शाइरी में ही तो होती है। इसीलिए एक शाइर हर उस बात को कहने से गुरेज़ नहीं करता जो सच है। शाइरी ही क्या, कोई भी सिन्फ़ हो, वह अपने आप को उस जगह खड़ा रखती है, जहां आम इंसान मौजूद रहता है। इसीलिए कहा जाता है कि साहित्य हमेशा आईना दिखाता है।
शाइरी किसी एजाज़ की चाहत नहीं रखती। एक शाइर कभी नहीं चाहता कि वह किसी का गुणगान करे। वह हमेशा आम इंसान की तकलीफ़ों को सामने लाने की कोशिश करता है, फिर इसके बाद कोई उसे सही माने या नहीं माने। उसकी बात को तवज्जो दे या न दे। लेकिन शाइर अपनी बात पूरी बुलंदी से कहता है। उसकी यही ताक़त ही उसे मक़बूलियत दिलाती है। इस राह में शाइर को कई बार अपनों की उलाहना भी सहना पड़ती है। सच कहने वाले शाइर को झूठों की टोली परेशान तो करती ही है, उस पर उंगलियां भी उठाती है। मगर सच्चा शाइर अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं करता। यहां तक कि तराज़ू-बाट हाथ में लेकर चलने वाले ऐसे शेरों को ख़ारिज तक कर दिया करते हैं, जिनमें शाइर के जज़्बात शामिल होते हैं। बावजूद इसके शाइर किसी की परवाह न करते हुए वही बात करता है, जो उसके दिल से निकलती है। साहिर कहते भी हैं-
मुझको इसका रंज नहीं है लोग मुझे फनकार न मानें
फ़िक्रो-सुख़न के ताजिर मेरे शेरों को अशआर न मानें
सच कहने वाले की यही उपेक्षा इस समाज के पतन का कारण है। एक शाइर जो हक़ीक़त बयां करता है, वह सभी को खलता है। उसकी बात को तवज्जो नहीं दी जाती। उसे अलग-अलग कर दिया जाता है। उसकी हर बात को बेवजह बेकार क़रार दिया जाता है। उसके मानीखेज़ अल्फ़ाज़ बेमानी साबित किये जाते हैं। तभी तो ग़ालिब को भी कहना पड़ा-
न सताइश की तमन्ना, न सिले की परवाह
मेरे अशआर में मानी नहीं, न सही
वैसे भी एक रचनाकार को, फ़नकार को किसी से कुछ पाने की चाहत नहीं होती है। वह अपनी बात कहकर संतुष्ट हो जाता है। हर बार उस बात को कहने की कोशिश करता है जो समाज के बीच में जाना ज़रूरी है। जिससे समाज का भला हो सकता है। रचनाकार कभी भी अपने लिए कुछ नहीं सोचता। वह उस बड़े वर्ग के लिए सोचता है जिसकी सलामती इंसानियत का तकाज़ा है।
गीत चतुर्वेदी द्वारा अनूदित पुस्तक ‘अ टाइम फॉर न्यू ड्रीम्स’ में नाइजीरिया के कवि बेन ओकरी की यही चिंता ज़ाहिर होती है। वे कहते हैं-
‘कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्मा की गहनतम ध्वनि को सुनें।’
अपने भीतर की इस ध्वनि को सुनने वाले अब बहुत कम हो रहे हैं। एक बहुत बड़ा वर्ग प्रशस्ति गान में लगा है। शोहरत, दौलत और इज़्ज़त के लिए क़लम के सौदे किये जा रहे हैं। ऐसे वक़्त में उन लफ़्ज़ों का बचना ज़रूरी है जिनमें ईमान है, सदाक़त है। जिनमें आम आदमी का दर्द है। जिनके भीतर मासूम चेहरों की मुस्कानें मौजूद हैं। ऐसे लफ्ज़ इस दुनिया में, हर दौर में बचे रहे हैं। अब भी बचे रहेंगे।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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