talat mahmood, तलत महमूद
पाक्षिक ब्लॉग मिथलेश राय की कलम से....

मखमली आवाज़ से जादू करने आया फ़नकार: तलत महमूद

               शहर में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो गीत-संगीत का आयोजन करते रहते थे। अपने प्रचार प्रसार के लिए वे मुकेश, रफ़ी, लता, मन्ना डे की याद में वार्षिक आयोजन भी। आज भी शहर के मुख्य चौक के किनारे बनी चाय की टपरी पर एक कार्यकम की योजना बन रही है। कुछ गायक, तबला मास्टर, पेटी, गिटार बजाने वाले साथी जुटे हैं। बीच-बीच में गाने का मुखड़ा, कोई तान, कोई न कोई छेड़ रहा है, आह-वाह भी चालू है।

हालांकि चौक पर जितना प्रकाश है, उससे भी कम प्रकाश टपरी के आस-पास है। फिर भी संगीत प्रेमी और चर्चा प्रेमी शाम को इस टपरी में मिल जाते हैं। कभी-कभी मेरा भी यहां जाना होता था, वह भी केवल गुलशेर भाईजान के कारण। उन्होंने ही मेरा परिचय इस टोली से करवाया था, गुलशेर भाई की इस महफ़िल में बड़ी क़द्र थी। उनके पहुंचते ही पेटी मास्टर ने “इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा” गाने की धुन बजा दी। गुलशेर भाई ने तुरंत धुन पकड़ ली और बोले वाह भाई, क्या बात है दिल खुश कर दिया। मेरे लिए गुलशेर भाई की वाह में अक्सर कुछ छुपा होता था, मैंने बात को छेड़ने के लिए कहा, इसमें क्या ख़ास है! इसने सुनकर सीखकर बजा दिया… गुलशेर भाई बोले, पंडत इसमें बहुत ख़ास बात है। यह कोई आम गाने की धुन नहीं है क्योंकि इसे सलिल दा ने बनाया था।
अच्छा! अब तक पेटी मास्टर और सभी लोग गुलशेर भाई की तरफ़ कुछ जानने को मुख़ातिब हो चुके थे, सभी के पास चाय पहुंच गयी थी।

गुलशेर भाई ने आगे बोलना शुरू किया, असल में सलिल भाई ने इस गाने की धुन बनायी और गाया तलत महमूद और लता मंगेशकर ने। सलिल दा मोज़ार्ट और शॉपन का संगीत सुनकर बड़े हुए थे। उनकी धुनें इनसे प्रभावित रहीं। इस गाने के मुखड़े की धुन भी उन्होंने मोज़ार्ट की एक कंपोज़िशन से ली थी, हालांकि वे इसे लोक धुन के रंग में प्रस्तुत करते थे। इस गाने में संवाद भी हैं।

talat mahmood, तलत महमूद

यह सब सुनकर पेटी मास्टर ने सवाल किया, “मोज़ार्ट और शॉपन क्या होता है?”

गुलशेर भाई, “ये नाम हैं भाई विदेशी संगीतकारों के।” इस बात पर ठहाके लगने लगे पर गुलशेर भाई किसी पर रोब जमाने के लिए यह सब क़िस्से नहीं कहते थे। अतः वे बोले, अरे भाई इसमें हंसने जैसा क्या, मै भी कभी नहीं जानता था, फिर लोगों का सत्संग मिला जानता गया, पेटी मास्टर और जो लोग नहीं जानते, जान जाएंगे।

असल में तलत महमूद केवल गायक नहीं थे अभिनेता भी थे। यह बात हम लोगों के लिए नयी बात थी, पर गुलशेर भाई कह रहे हैं तो बात ग़लत तो नहीं होगी फिर भी मैंने शक जताते हुए पूछ ही लिया, “कौन सी फ़िल्म में काम किया है तलत महमूद ने?”

गुलशेर भाई बोले, “भाई यकीन करो उन्होंने भी कई फ़िल्मों में काम किया है। यह कोई अनोखी बात थोड़ी है, पुराने ज़माने में अभिनेता बनने की पहली शर्त गायक होना ही थी। पुराने सारे अच्छे गायक अभिनेता भी थे। वैसे तो तलत महमूद मशहूर अपने ग़ज़ल गायन के लिए हुए, यह भी उस ज़माने में कोई आसान काम नहीं था, उनके सामने रफ़ी, मुकेश, मन्ना डे, हेमन्त कुमार, बड़े गायक थे। इनकी आवाज़ की खोज या यूं कहें कि इनकी गायक के रूप में असल पहचान अनिल बिस्वास के कारण ही बनी, उनसे मिलने के पहले तलत तपन सिन्हा के नाम से गाते थे, लेकिन बिस्वास ही ऐसे संगीतकार हुए जिन्हें तलत की आवाज़ में अजीब सी खनक लगी, जो उन्हें उस दौर के सभी गायकों से अलग बनाती थी। इसी के चलते वे स्थाई और मक़बूल हुए।

“आपने उनकी कौन सी फ़िल्म देखी है?” (अबकी बार पेटी मास्टर ने गुलशेर भाई से सवाल किया)

“मैंने एक, दो फ़िल्म ही देखीं। वह भी उनके गाने के कारण। मैं उनका गाया फ़िल्म बिरादरी का गाना “तस्वीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती” और भोजपुरी गाना “लाले लाले होठवां पर चमके ललाइया” शहर के लगभग हर छोटे मोटे जलसे में गाया करता था और “हकीक़त” का वो गाना “हो के मजबूर उसने हमें बुलाया होगा”, “ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल” और फुटपाथ का गाना, “शामे-ग़म की क़सम”… उनकी थरथराती मखमली आवाज़ का जादू हम सबके दिल को मोह चुका था।

हालांकि तलत का अभिनेता बनने का सफ़र बहुत लंबा नहीं था, फिर भी उनमें एक अच्छे अभिनेता होने के सारे गुण थे। सोने की चिड़िया, दिल-ए-नादान, एक गांव की कहानी उनकी कामयाब फ़िल्में थींद। मैंने उनकी फ़िल्म एक गांव की कहानी देखी है। हालांकि मैं गया तो था कि गाने अच्छे सुनने को मिलेंगे, लेकिन इस फ़िल्म की कहानी और अदाकारी ने ज़्यादा प्रभावित किया। यह कहानी शैलजानंदन मुखर्जी की थी, जो स्वयं लेखक व निर्देशक थे। इसे दुलाल गुहा ने रीमेक किया था। उन दिनों फ़िल्मों की कहानी समाज से आती थी इसलिए वे बहुत अपनी-सी लगती थी। बहुत-से प्रश्न होते तथा उनके बारे में कुछ सुझाव भी। ठीक उसी तरह यह फ़िल्म भी सामाजिक कहानी है। चंदन गांव में एक डॉक्टर (तलत महमूद) आता है जो एलोपैथ का है। जबकि होमियोपैथ का कंपाउंडर (आई एस जौहर) अपनी बेटी जया (माला सिन्हा) के साथ उसी गांव में रहता है, जो एलोपैथी का विरोधी है। फ़िल्म के शुरू होते ही रतन (अभि भट्टाचार्य) ताड़ी पीने जाते हुए दिखाया जाता है। वह वैसे एक बहुत नेक आदमी है, उसकी पत्नी (निरूपा रॉय) भी बहुत भली है लेकिन रतन की मां (ललिता पवार) पोता न होने से अपनी बहू से चिढ़ती है। और रतन का दूसरा विवाह कंपाउंडर की लड़की जया (माला सिन्हा) से करना चाहती है। इधर गांव का सरपंच भी अपने पागल लड़के की शादी जया से करना चाहता है। कुल मिलाकर फ़िल्म की कहानी केवल हीरो हीरोइन के आसपास ही नहीं घूमती है, उसमें कई बातें मुख्य कहानी को छूती हैं। जैसे डॉक्टर द्वारा मछुआरे के लड़के का इलाज बिना भेदभाव के करना, अंग्रेज़ी और देशी दवा का वाद-विवाद, निसंतान दंपति की समस्या, सरपंच का तिकड़म, इधर रतन का सीधा सच्चा व्यवहार एवं जया और डॉक्टर का प्रेम।

तलत महमूद जितना अच्छा गायक था, उतना ही अच्छा अभिनेता भी था। उसमें एक अभिनेता के सारे गुण थे लेकिन उसका इस दुनिया में आना अपनी मखमली जादुई आवाज़ के लिए हुआ था। “भईलीं आवारा सजनी पूछ ल पवनवा से, “लागी नाहीं छुटे रामा चाहे जिया जाये”… सब कलाकार जा चुके हैं। मै अकेला बैठा हूं और गुलशेर भाईजान गाने में मगन हैं।

मिथलेश रॉय, mithlesh roy

मिथलेश रॉय

पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!