
- November 7, 2025
- आब-ओ-हवा
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जॉर्ज ऑरवेल ने एनिमल फ़ार्म का लेखन नवंबर 1943 में शुरू किया था और फरवरी 1944 में संपन्न। दूसरा विश्वयुद्ध रुकते ही 17 अगस्त 1945 में यह पहली बार प्रकाशित हुआ क्योंकि राजनीति पर व्यंग्य के चलते विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश और अमेरिकी प्रकाशनों ने इसे छापने का जोखम नहीं लिया था। कल्ट क्लासिक्स में शुमार व्यंग्य उपन्यास का पाठ क्यों अनिवार्य व अब भी प्रासंगिक है, ख़ुलासा करता लेख...
पुस्तक चर्चा डॉ. मुकेश असीमित की कलम से....
बराबरी के सपने से 'ज़्यादा बराबरी' वाली हकीकत–एनिमल फार्म
हाल के राजनीतिक घटनाक्रम —हमारे देश से लेकर पड़ोसी मुल्कों तक— ने मन में पुराना सवाल फिर जगा दिया: सत्ता बदलती है या बस चेहरों की अदला-बदली होती है? इसी उधेड़बुन में एनिमल फ़ार्म (Animal Farm) दुबारा हाथ में उठा लिया। जॉर्ज ऑरवेल का यह राजनीतिक व्यंग्य सिर्फ़ एक खेत की कहानी नहीं, सत्ता की आदतों का एक्स-रे है, जहाँ आदर्श दीवार पर लिखे जाते हैं और रात के सन्नाटे में उनके शब्द बदल दिये जाते हैं। हर दौर का “स्क्वीलर” भाषा को पॉलिश करता है, हर “नेपोलियन” नियमों में अल्पविराम जोड़ता-घटाता है, और हम सब कभी-कभी बॉक्सर बनकर “मैं और मेहनत करूँगा” दोहराते रहते हैं।
ऑरवेल का दूसरा उपन्यास ‘1984’ भी मुझे “राजनीतिक अब्सर्ड” का समकालीन ग्रंथ लगता है- निगरानी, नैरेटिव और निष्ठुर तर्कों का ऐसा जाल, जो स्वतंत्रता को ‘सुरक्षा’ के नाम पर बाँध देता है। दोनों किताबें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं; फ़र्क बस इतना है कि खलिहान की दीवारें अब स्क्रीन बन गयी हैं।
आज मैं एनिमल फ़ार्म पर लिख रहा हूँ- बराबरी के सपने से “ज़्यादा बराबरी” वाली हक़ीक़त तक की यात्रा पर। किसी दिन 1984 पर भी बात करूँगा कि कैसे भाषा, भय और निगरानी मिलकर नागरिक को ‘डेटा’ में बदल देते हैं। फिलहाल, आइए खलिहान की उस दीवार पर लिखे वाक्य को पढ़ें, और देखें, कहीं उसके अल्फ़ाज़ हमारे समय में भी तो चुपचाप नहीं बदल रहे।

जॉर्ज ऑरवेल की एनिमल फ़ार्म आपने आधी-छूटी अलमारी से निकालकर पूरी कर ली तो समझिए आपने सिर्फ़ एक “पशुओं की कहानी” नहीं, सत्ता की रसायनशाला पढ़ी है। किताब शुरू होती है एक भोले, उम्मीदों से भरे सपने से: शोषण-मुक्त समाज, मेहनत का सीधा फल, सभी के लिए रोटी और इज़्ज़त। ओल्ड मेजर की आवाज़ उस सपने की मशाल है, जो हर बार किसी भी देश-समाज में क्रांति का पहला नारा बनती है— “सब बराबर हैं।” लेकिन जैसे-जैसे पन्ने पलटते हैं, यह सपना धीरे-धीरे उस वाक्य में सिमट जाता है जिसे पढ़ते ही रीढ़ सिहर जाती है: “सभी जानवर बराबर हैं, पर कुछ जानवर दूसरों से ज़्यादा बराबर हैं।”
यहीं से किताब हमारे आज में प्रवेश करती है। पड़ोस के देशों में लगातार सत्ता-पलट, “राष्ट्र-हित” में आपात निर्देश और हर असहमति को किसी अदृश्य साज़िश से जोड़ देना—क्या ये सब आपको स्क्वीलर की चांदी-सी ज़ुबान और नेपोलियन की ख़ामोश-पर-घातक चालों की याद नहीं दिलाते? ऑरवेल बताते हैं कि सत्ता केवल डंडे से नहीं चलती; वह शब्दों, आँकड़ों और “कथानक-प्रबंधन” से चलती है। खलिहान की दीवार पर लिखे कमांडमेंट्स का एक-एक शब्द बदलना- “बिस्तर नहीं” से “चादर के साथ बिस्तर नहीं”, “शराब नहीं” से “अत्यधिक शराब नहीं” —ठीक वैसा ही है जैसे नियम-क़ायदे “व्याख्याओं” की परतों में अपना मूल अर्थ खो देते हैं। हम भी रोज़ देखते हैं: प्रेस कॉन्फ़्रेंस की शीशे जैसी भाषाएँ, डेटा-चार्ट का जादू, ‘नेशनल सिक्योरिटी’ या ‘स्थिरता’ के नाम पर सारे असुविधाजनक सवालों को बेंच पर बिठा देना— यह सब स्क्वीलर की कक्षा ही तो है।
किताब का सबसे मार्मिक चरित्र बॉक्सर है— “मैं और मेहनत करूँगा” और “नेता हमेशा सही है” जैसी दो पंक्तियाँ उसकी पूरी जीवनी बन जाती हैं। यह वही मेहनतकश वर्ग है, जो हर समय मशीन की तरह जुटा रहता है और वही सबसे पहले क़ुर्बान भी होता है। आज की राजनीति में भी “बॉक्सर” अनगिनत चेहरे पहनकर हमारे आसपास काम करता दिखता है —डिलीवरी बॉय से लेकर माइग्रेंट मज़दूर तक— जो न नारों की सजावट जानते हैं, न कैमरे की भाषा; बस सिस्टम पर भरोसा करके पिसते जाते हैं। और जब उनका उपयोग ख़त्म होता है, तो एक गाड़ी आती है.. जिस पर लिखा क्या है, पढ़ने वाला बेंजामिन भी बहुत कम बचता है।
एनिमल फ़ार्म की असली चाबुक प्रचार की तकनीकें हैं: बाहरी दुश्मन गढ़ो (स्नोबॉल), अंदरूनी असफलताओं का दोष उसी पर डालो, स्मृति को तोड़-मरोड़कर इतिहास नया लिखो, और हर वक़्त जनता के मन में एक आदिम भय क़ायम रखो— “क्या आप मिस्टर जोन्स को वापस बुलाना चाहते हैं?” यह सवाल एक भारी हथौड़े की तरह पड़ता है कि बहस की हर कील चित हो जाती है। आज जब हम लोकतंत्रों में भी “स्थिरता बनाम असहमति” का नक़ली द्वंद्व रात-दिन सुनते हैं, तो लगता है ऑरवेल ने हमारे समय की हक़ीक़त दर्शाती प्रीसर्कुलेशन कॉपी बहुत पहले लिख दी थी।
किताब का अंतिम दृश्य —सूअरों और इंसानों का साथ बैठकर ताश खेलना, हँसना और एक-दूसरे से अभेद हो जाना— सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य है। क्रांति के शुरूआती आदर्श वहीं लौट आते हैं जहाँ से यात्रा शुरू हुई थी; बोर्ड पर नाम फिर “मैनर फ़ार्म” लिख दिया जाता है। सत्ता का यह संस्कार बहुत पुराना है: दो-चार चेहरे बदलो, भाषा में रंग-रोग़न चढ़ाओ, और जनता को यक़ीन दिलाओ कि यह “नयी सुबह” है। असल में यह “पुरानी दोपहर” का थोड़ा धुला हुआ संस्करण होता है। हमारे इधर-उधर —कभी संसद के भीतर “सुधार” के नाम पर नियमों का लचीलापन, कभी विरोध पर त्वरित अनुशासन कभी “डिजिटल क्रांति” के पर्दे के पीछे निगरानी का तंत्र— सब उसी खलिहान की दीवार पर रात के अँधेरे में हुए संपादन जैसे हैं।
तो क्या ऑरवेल निराशावादी हैं? नहीं। वे चेतावनी देते हैं: यदि नागरिक सजग न रहें, शिक्षा और सूचना का लोकतंत्रीकरण न हो, संस्थाएँ जवाबदेह न बनें, तो इतिहास ख़ुद को दोहराता है, बस किरदारों की खाल बदलती है। एनिमल फ़ार्म पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि लोकतंत्र कोई “डिफ़ॉल्ट सेटिंग” नहीं, रोज़ की जाने वाली मेंटेनेंस है। बराबरी केवल एक नारा नहीं; याद रखने, जाँचने, और सवाल पूछने की नैतिक आदत है। यही कारण है कि किताब स्कूलों की पाठ्य-सारिणी भर नहीं, न्यूज़रूम, संसद, अदालत, और WhatsApp यूनिवर्सिटी सबके लिए अनिवार्य पाठ है।

यह किताब आपको एक असहज दर्पण थमाती है, जिसमें आप नेपोलियन, स्क्वीलर, बॉक्सर और बेंजामिन चारों को अपने-अपने समाज में जीते-जागते देख लेते हैं। अगर पढ़ते हुए आपको आज की ख़बरें, पड़ोसी मुल्कों की उथल-पुथल, और अपने यहाँ की “नीति-परिवर्तित” दीवारें याद आयीं, तो समझिए एनिमल फ़ार्म अभी भी ज़िंदा है। और जब तक यह ज़िंदा है, उम्मीद भी ज़िंदा है क्योंकि चेतावनी ही लोकतंत्र की पहली सुरक्षा है।
(कार्टून : मितेश@द फ़ोकस अनलिमिटेड)

डॉ. मुकेश असीमित
हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।
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बेहतरीन समीक्षा।