
- November 8, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
डॉ. बबीता गुप्ता की कलम से....
साहित्य, समाज, सिनेमा और किन्नर
परिवार से उपेक्षित, समाज से परित्यक्त मुख्यधारा से विलग हाशिये पर रखा मंगलोत्सव, उत्सवों, तीज-त्योहारों पर ताली बजाकर मनोरंजन के साथ आशीर्वाद लुटाने वाला तीसरा वर्ग जिसे किन्नर, कीव, थर्ड जेण्डर, हिजड़ा, छक्का आदि नामों से जानते हैं, जो स्त्री-पुरुष से बनी सृष्टि का एक अतिरिक्त ईश्वरीय प्रदत्त तीसरा लिंग उभयलिंगी, जो न पुरुष और न स्त्री की श्रेणी में आते हैं। अपनी नैसर्गिक अपूर्णता के कारण समाज की नज़रों में हेय व उपेक्षित जीवन गुज़ारते बुनियादी सुविधाओं को प्राप्त करने संघर्ष करते हैं। क़ुदरत की मार से जैविक दोष के कारण अपने ही रक्त संबंधियों से दूर उपेक्षित जीवन गुज़ारने को मजबूर होते हैं।
पूर्वनिर्धारित भ्रामक मान्यताओं व प्रतिष्ठा के कारण अपनों के द्वारा परित्याग किया जाता है। समाज के दबाव के चलते चाहते हुए भी परिवार वाले स्वीकार नहीं करते। रोटी, कपड़ा और मकान परिवार मुहैया करा देता है पर संवेदनहीनता से उनकी आज़ादी व भावनाओं का गला घोंट देता है। सामाजिक पूर्वाग्रही मानसिकता से हिकारत भरी दृष्टि से इन्हें देखा जाता हैं। सदियों से चली आ रही स्त्री-पुरुष की सृष्टि में अतिरिक्त उभयलिंगी मनुष्य, जिसे हिजड़ा और अब वृहनलला, किननी नाम से जानते हैं, जिनकी भूमिका रामायण, महाभारत काल से लेकर मुगल़ काल तक किन्नर जाति के रूप में बलशाली, वीरता की रही। निःसंतान दंपत्ति को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देने वाले स्वयं निर्मूल वंशबेल हैं। विसंगतिपूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त किन्नरों के भारत में 500 धाम हैं। समाज से परित्यक्त इस वर्ग का कभी महाभारत काल से लेकर मुग़ल काल तक विशिष्ट स्थान रहा। सात घरानों में बंटा किन्नर समुदाय जिसका हर घराने का मुखिया जिसे नायक कहते हैं, गुरू का चयन करता हैं और उन्हीं से हिजड़े शादी कर पति मानते हैं, जिन्हें गिरिया कहते हैं, ये करवा चौथ भी रखते हैं। इनकी आराध्य देवी वहुचरा माता [बूचरा] हैं, जिनकी तीन संतानें नीलिमा, मानसा और दमभा हैं।
वर्तमान में दुर्भाग्यपूर्ण यंत्रणा सहते किन्नरों की समाज में सन् 1871 तक स्वीकृति थी। हाशिये पर रखे समाज में इस वर्ग को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। लेकिन अंग्रेज़ी शासन ने इन पर आपराधिक कृत्य एक्ट लागू कर अपराधों की श्रेणी में रख दिया। ग़ैर ज़मानती अपराध घोषित करने वाली धारा 377 की तलवार लटका दी। उपेक्षित समाज से तिरस्कृत जीवन जीते किन्नर निर्दोष को किस बात की सज़ा? अपमान का जीवन जीते व भरे-पूरे परिवार होते हुए अस्तित्वहीन किन्नरों के ख़ाली हाथों को भारत सरकार ने नवंबर, 2009 में इनके लिंग निर्धारण से अलग पहचान कर देश की मुख्यधारा से जोड़कर एक पहचान दी। लोकतंत्र के महोत्सव का पर्व मतदान में मतदाता के रूप में निर्वाचन सूची में ख़ाका खींच दिया। इसके पीछे जीवन संघर्षों का खांचा खींचती लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी किन्नर हैं। इन्हीं की जद्दोजहद के परिणामस्वरूप अप्रैल, 2015 को उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति ए.के. सीमरी ने किन्नरों के हक़ में तीसरे लिंग का मान्यता प्रदान करते हुए ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। ।साथ ही, बच्चा गोद लेने का अधिकार, चिकित्सा सुविधा का सुअवसर, हितों का अधिकार भी प्रदान किया।

किन्नर समुदाय का कठिन संघर्ष
अत्यंत दयनीय स्थिति में जीविकोपार्जन कर रही इस विशेष वर्ग के लिए दिल्ली नगरपालिका ने रु. 1000/- प्रतिमाह पेंशन देने की व्यवस्था आरंभ करने के साथ आधी अधूरी गर्त चढ़ी योजनाओं को क्रियान्वित करने की पेशकश की। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी सार्वजनिक सुविधाओं व सेवाओं से वंचित ये उपेक्षा और अवहेलना की पात्र हैं। नारकीय परिस्थिति की भयावहता व तिरस्कृत तिरोहित किन्नर समुदाय को लेकर साहित्य का सशक्त माध्यम बन जाने से एक नयी बहस छिड़ गई। स्त्री-पुरुष से बनी सृष्टि के केंद्र से उपेक्षित अपने अस्तित्व व अस्मिता के संघर्ष से उपजी टीस से अधिकारों के लिए क़ानून का दरवाज़ा खटखटाया। आज़ादी मिलने पर जरायमपेशा जतियों से हटाये गये, दुर्भाग्यपूर्ण मानसिक यंत्रणा से गुज़रते किन्नर समुदाय के संघर्ष की सराहना करते हुए, उनके प्रति कठोर अमानवीय व्यवहार की निंदा करते हुए, उनके अधिकारों के प्रति सराहनीय क़दम उठाया और संवैधानिक मान्यता प्रदान की।
जीवन की विषमताओं-विसंगतियों की ओर मुख्यधारा में अपनी पहचान करने में असमर्थ किन्नर समुदाय ने अधिकारों के लिए सश्क्त आंदोलनकारी अभियान चलाकर, कठिन संघर्ष राजनीति में पेश किया। विधायक व महापौर पद पर शबनम मौसी, कमला जान, कमला किन्नर, मधु किन्नर हैं। देश की पहली शिक्षाविद् किन्नर प्राचार्य मानोबी बंदोउपाध्याय, पहली किन्नर वकील तमिलनाडु की सत्या श्री शर्मिला ने साबित कर दिया कि अपने अंदर छिपी प्रतिभा से वो अपनी अपूर्णता को पूर्णता में ढालकर स्वाभिमान के साथ समाज के बराबर क़दम से क़दम मिलाकर चल सकती हैं। जनमानस में इस भाव का संचार किया कि ईश्वर प्रदत्त अपूर्णता को निराशा के गर्त में धकेलकर, ईश्वर के दिये स्वरूप को स्वीकारते हुए और जीवन भर अपूर्णता का रोना न रोकर अपने हुनर से तबक़े को न केवल लड़ने की हिम्मत दी जा सकती है बल्कि सामाजिक तिरस्कार को तवज्जो न देकर, अपनी तक़दीर का हिस्सा बनाकर इस सभ्य संकीर्ण समाज के सामने तस्वीर का दूसरा रुख़ रखा जा सकता है। अपनी सक्रियता से आदर प्राप्त इस तीसरे वर्ग ने खोखले हितैषियों की पूर्वाग्रही सोच को दिखा दिया कि ज़रूरी तो नहीं जो अपूर्ण है, वो अपूर्ण ही रहेगा और जो संपूर्ण हैं, वो पूर्ण ही हों।
लेखन में उल्लेख
भूत-भविष्य-वर्तमान को रेखांकित करता साहित्य समाज का दर्पण होता है। स्कारात्मक-नकारात्मक आलोचनाओं का सशक्त माध्यम होने के कारण पाठकों के समक्ष देशकाल में घटित घटनाओं को परोसकर चिंतन-मनन करने को मजबूर करता है। सभ्य समाज को किन्नरों के संबंध में बात करना तक गवारा नहीं है, ऐसे में सामाजिक संपर्क से वंचित ख़ुशी के मौक़ों पर बख़्शिश देकर पल्ला झाड़ लेने वाले समाज के इनके प्रति उपेक्षित व्यवहार पर साहित्य वर्ग ने लेखन कर्म करके सराहनीय व सशक्त पहल की।
पाण्डेय बेचैन शर्मा ‘उग्र’ की कहानियों में लिंग निरपेक्ष समाज से बहिष्कृत लौंडों के रूप में चित्रित किन्नरों की पीड़ा, नारकीय जीवन, जिजीविषा से संघर्ष, लोगों की उनके प्रति उपेक्षा व उनकी अपनी महत्वाकांक्षाओं का यथार्थ चित्रण किया गया। चुनौतियों से भरे जीवन में लिंग निरपेक्षता की दशा-दुर्दशा के बारे में चुप्पी तोड़ता नीरजा का उपन्यास ‘यमदीप’, प्रदीप शर्मा का उपन्यास ‘तीसरी ताली’, महेश भीष्म का ‘किन्नर कथा’, जिसमें किन्नर लड़की तारा के संघर्ष की कहानी है। जो बचपन से अपने दर्द को पीती है, दूसरों की हंसी में। अपने आप से जूझती ईश्वर से प्रश्न करती है कि हम आशीष लुटाकर दूसरों को खुशियाँ देते हैं तो हमारे साथ ऐसा ऐसा क्यूँ? चित्रा मुदगल का उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा’ में अधूरेपन से जूझते रूढ़िवादी समाज के षड्यंत्र में पारिवारिक सुरक्षा तलाशते विनोद की मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक स्थिति के वातावरण और संवेदना से उद्धेलित प्रश्नों को उबारा है।
निर्मला भुराड़िया की रचना ‘ग़ुलाम मंडी’ में ग़ुलामी के देश से उपजे सघनतम संवेदनात्मक स्वरों व आसपास की समस्याओं को समेटने का प्रयास किया गया है। बिंदा महाराज के कहानी संग्रह में मुदान के गाँव, सांझा हिंजड़ा, संकल्प, कौन तार से बीनी चदरिया, रटियावान की चेली आदि हैं। इनमें उल्लेख हैं कि यह समुदाय सदियों से जकड़ी ओछी मानसिकता, अंधविश्वास से ग्रसित भ्रांतियों व मानसिकता के कारण समाज में सहजता से स्वीकृति न मिल पाने के कारण अवसादग्रस्त हो जाता है। अपनत्व के बदले मिलते धोखे के कारण कई आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाते हैं। कादंबरी मेहरा द्वारा सृजित कहानी ‘हिजड़ा’ में नायिका सौतेली माँ के दुर्व्यवहार और जीजा द्वारा दुष्कर्म को अपनी पढ़ाई पूरी होने तक झेलती है और आत्मनिर्भर बन स्वाभिमान की ज़िंदगी जीना चाहती है, पर समाज की अस्वीकृति से वो मजबूरी में हिजड़ा बन जाती है।
महेंद्र भीष्म ने ‘लक्ष्मीनारायण की आत्मकथा’ में बेबाकी से जीवन की सच्चाई प्रस्तुत की है। ‘मैं हिजड़ा, मैं लक्ष्मी’ पात्र में परित्यक्त समाज से जीवन संघर्ष कर परंपरागत जीवनशैली से हटकर शिक्षा ग्रहण कर अपनी बिरादरी में एक उदाहरण पेश करके प्रेरणास्रोत बन जाती है और उत्थान की दिशा में आंदोलनकारी भूमिका दृष्टिगोचर है। सुधीर पचौरी ने इस समुदाय की समस्याओं पर कहा है, इनका वर्जित लिंगी होने का अकेलापन एक रहा है और वही इनकी ज़िंदगी का निरर्थक तत्व है। समाज की सहज स्वीकृति से कब हिस्सा बनेंगे?
लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी स्त्रीयुक्त वेशधारी किन्नर शिक्षित, विदुषी के रूप में इन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान के साथ संगीत व नृत्यशास्त्र का भी अध्ययन किया। एक सशक्त आंदोलनकारी के रूप में ख्याति प्राप्त लक्ष्मीनारायण को वर्ष 2016 में उज्जैन के महाकुंभ सिंहस्थ में महामंडलेश्वर की उपाधि मिली। इनके द्वारा रचित ‘मैं हिजड़ा नहीं’ हिन्दी साहित्य की बहुचर्चित रचना है।
साहित्यकारों के सरहनीय व साहसिक लेखन कर्म में प्रदीप सौरभ, अनुसूया, नीरजा माधव, शैलेंद्र सिंह जैसे और भी साहित्यकार हैं, जिन्होंने मानव सभ्यता के विकास के अनेक पड़ाव परिवर्तित सामाजिक संस्कृति परिवेश के हाशिये पर खड़े किन्नर वर्ग के प्रति हिकारत की भावना को नकारने पर मजबूर किया। सामाजिक तिरस्कार को झेलते समुदाय के लिए सामाजिक सहयोग की पहल कर उनकी आकांक्षाओं को समझने की पैरवी की है। इन साहित्यकारों का मत है कि नैराश्य का जीवन जीते किन्नरों के रास्ते के अवरोधों को हटाया जाये और पूर्वाग्रही सोच से परे जाकर स्थापित करना चाहिए कि सिर्फ़ एक ही धर्म मानवीयता है।

परदे पर पीड़ा
चुनौतियों से भरा जीवन जीते, लैंगिक निरपेक्षता पर अन्तःकरण का बाहरी सामंजस्य न होने पर मानसिक वेदना सहते किन्नर समुदाय को फ़िल्म का हिस्सा बनाया गया। फ़िल्मों में हास्य का विषय बनी किन्नरों की भूमिका समय के साथ मानसिकता बदलने से अलग रंगों में दिखायी देती रही। श्याम बेनेगल की वेलकम टू सज्जनपुर, महेश भट्ट की सड़क, तनुजा चन्द्रा की संघर्ष, महेश भट्ट की तमन्ना, कल्पना लाजमी की दरमियान, आशुतोष की शबनम मौसी आदि। सिराज उलहन की चाँदनी फिल्म में नायिका टाईमूर से कहती है कि मैं मर्द भी नहीं हूँ, औरत भी नहीं हूँ। कोई मुझे हिजड़ा कहता है तो ओई मुझे छक्का कहता है और अब ये तुम पर है कि तुम मुझे किस नाम से पुकारते हो। तमन्ना फ़िल्म में निजी जीवन के सुख-दुख, नितांत अकेलापा, संवेदना की अटूट गाथा है, तो तीसरी ताली में किन्नरों की व्यथा का मार्मिक चित्रण। बढ़ती उम्र के साथ मानसिक अंतर्द्वंद्व से गुज़रने, शारीरिक बदलावों की असमंजस के कारण अपनों से दूरी बनाने, जीवन से मुक्त होने की छटपटाहट विनीत पात्र के माध्यम से दर्शायी गयी है।
छोटे स्तर पर कुछ फ़िल्मकार वृत्तचित्रों से लेकर संवाद आधारित सिनेमा भी इस विषय पर बनाते रहे हैं। पिछले दिनों इस समुदाय के अधिकारों पर आधारित एक वेब सीरीज़ भी चर्चा में रही, जिसमें श्रीगौरी सावंत के संघर्षों की कहानी कही गयी है। श्रीगौरी किन्नर समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक एक्टिविस्ट रही हैं, एक संस्था चलाती हैं, एचआईवी पीड़ितों की मदद करती हैं, महाराष्ट्र में चुनाव आयोग सद्भावना दूत हैं और मातृत्व के लिए भी चर्चित रही हैं। श्रीगौरी की भूमिका मुख्यधारा की अभिनेत्री सुष्मिता सेन ने निभायी, जिससे इस समुदाय के संघर्षों, पीड़ाओं को एक बार फिर सुर्ख़ियां मिलीं।
आजीवन संघर्षरत और सामाजिक विसंगतियों से गुज़रते हुए किन्नर समुदाय के जीवन को, उनके आत्मसंघर्ष को समझना होगा। ईश्वर प्रदत्त काया वालों को भी शेष मनुष्यों के समान ही अधिकार हैं। सुविधाएं और सेवाएं प्राप्त करने के तमाम अधिकार। उनके साथ समाज का दोग़लापन, घोर अन्याय कोई नयी बात नहीं है। मानसिक पीड़ा और यातनाओं से विमुक्त करने के संबंध में बदलाव की तीव्र उत्कंठा उनके मन में जागती नज़र आती है… शिक्षा को हथियार बनाकर अपने अवदान से उत्थान की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं। असमानता को मिटाने की जंग जीतने के अंतहीन सफ़र पर चल पड़ा किन्नर समुदाय अर्जित उपलब्धियों से अपने समुदाय के लिए प्रेरणा के, उत्थान के मार्ग प्रशस्त करने के साथ ही सभ्य समाज को अपने प्रति बदलने का अभियान चला रहा है।
अपने अंदर की क्षमता के बल पर ग़ुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने को अग्रसर किन्नर समुदाय के प्रति 15 अप्रैल, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन्हें तीसरे लिंग का दर्जा प्राप्त होने पर भी समाज का इनके प्रति रवैया संवेदनहीन है। रूढ़ियों के प्रति प्रतिकार न होने से समाज इनके प्रति निष्ठुर रहा है। परिवार की प्रतिष्ठा की ख़ातिर मातृत्व का गला घुट जाता है। स्नेह की छत्रछाया तले व्यतीत जीवन इनसे जन्म से ही छिन जाता है। लोरियों की जगह तालियों की थाप सुनकर पलता बचपन, आशीर्वाद के बदले लांछित बातों के बीच जीवन गुज़ारते किन्नर बुनियादी सुविधाओं के भी मोहताज हैं। आवश्यकता है, उन्हें समाज का अंग बनाने की, संवेदना जताने की। इनके उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण विमर्श होना चाहिए।

बबीता गुप्ता
एम.ए.(समाजशास्त्र), पी-एच.डी. (महिला कल्याणकारी योजनाओं पर), लघुकथा लेखन कौशल (सर्टिफिकेट कोर्स एवं डिप्लोमा) के बाद स्वतंत्र लेखन। स्त्री विमर्श की कथाओं, लघुकथाओं, बाल कथाओं के अलग-अलग संग्रह प्रकाशित। जीवनी और नाटक आदि विधाओं में भी लेखन। शोधपरक एवं वैचारिक लेखों के संग्रह भी प्रकाशित।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

महत्वपूर्ण आलेख बबिता जी। बहुत बधाई।