
- December 8, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'.. इस बार कमलेश्वर लिखित एक बेस्टसेलर कृति की चर्चा- संपादक)
धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद' की कलम से....
शुक्रिया 'कितने पाकिस्तान'
आख़िर वो कौन सी किताब है, जिसे नहीं पढ़कर ज़िंदगी में कुछ कमी रहती या जिसने आपको बनाया है। ये सवाल जितना दिलचस्प है, उससे ज़्यादा पेचीदा है। क्या कोई भी एक किताब या कोई रचना ऐसी हो सकती है? अगर हो सकती तो वो क्या कारण है कि हम पिछले चार सौ सालों से रामचरित मानस का पाठ करते आ रहे हैं, लेकिन कोई दूसरा राम जैसा आदर्श राजा या भरत जैसा आदर्श भाई पैदा नहीं कर पाये! ये समाज की नाकामी है या सिस्टम की या फिर रचना की, ये एक अलग मसला है। फ़िलहाल हमें उस किताब की खोज करना है, जिसने सबसे ज़्यादा प्रभाव छोड़ा।
यह पड़ताल करने के लिए मैं अपनी ज़िंदगी को तीन भागों में बांट रहा हूँ। पहला तो वो, जब साहित्य की कोई समझ नहीं थी। दूसरा वो, जब साहित्य के प्रति रुचि जागी। और तीसरा वो, जब साहित्य के प्रति थोड़ी-सी समझ आयी।
बचपन में साहित्य की कोई समझ नहीं थी। भले मैं साहित्य नहीं पढ़ता था, लेकिन छोटी कक्षाओं के पाठयक्रम में भी ऐसी रचनाएं थीं, जो आज तक नहीं भूला।
‘माँ खादी की चादर दे दे मैं गाँधी बन जाऊँ’
‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’
‘चारु चंद्र की चंचल किरनें खेल रहीं थीं जल थल में’
‘मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक’
ये ऐसी कविताएं हैं, जो मेरे बाल मन पर ऐसी अंकित हुईं कि कभी भूल न सका। जब हम इसकी पड़ताल करते हैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि बच्चों के मन पर देश प्रेम और प्रकृति प्रेम की रचनाओं का गहरा असर होता है। लेकिन आज ये बड़े अफ़सोस की बात है कि बच्चों के पाठयक्रम से ऐसी रचनाएं नदारद हैं। समझ नहीं आता कि ये हमारे सिस्टम की चूक है या कोई गहरी साज़िश?

जब आगे की कक्षाओं में पहुँचा तो ‘पंचतंत्र’ और ‘विक्रम बेताल’ की कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। इन कहानियों में कितनी गहराई है ये तो बाद में समझ पाया, लेकिन नोट करने वाली बात ये है कि फ़ैंटेसी के माध्यम से अगर कुछ अच्छा लिखा जाये, तो वो भी बाल मन पर गहरा असर डालता है। इसी दौर में चंद्रकांता, मृगनयनी जैसे टीवी धारावाहिक भी बड़े लोकप्रिय हुए। आख़िर ये भी तो साहित्य ही है। आजकल जो भी छोटे पर्दे पर चल रहा है, उसमें न रिश्तों की मर्यादा बची है, और न कोई संदेश।
‘बुनियाद’, ‘उड़ान’ और ‘मैला आँचल’ जैसे साफ़-सुथरे धारावाहिक अपनी अमिट छाप छोड़ रहे थे। रामायण धारावाहिक तो एक अभूतपूर्व घटना कही जाएगी, जिसने हर क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ा। अगर ये सीरियल नहीं होता तो आज टीवी घर-घर नहीं होती, उसकी इस अप्रोच तक पहुँचने के लिए काफ़ी वक़्त लगता।
इसी दौरान प्रेमचंद की ‘कफ़न’, ‘काकी’, ‘पंच परमेश्वर’,और ‘ईदगाह’ जैसी कालजयी कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। ये कहानियाँ तो फ़िल्म ‘शोले’ की तरह हैं, जिन्हें बार-बार पढ़ने को मन करता है। ऐसी ही सुदर्शन की एक कहानी है ‘हार की जीत’, और गुलेरी की ‘उसने कहा था’। मैं इन कहानियों को कभी नहीं भूल सकता।
आगे जब किताबों के प्रति थोड़ा रुजहान बढ़ा तो कॉमिक्स भी पढ़े, और ग़ैर-साहित्यिक उपन्यास भी। लेकिन उनका मुझे ठीक से कुछ याद नहीं कि जब पढ़ा था, तो क्या पढ़ा था। उम्र की जिज्ञासाओं के कारण जो किताबें छुपकर पढ़ी जाती हैं, वो भी पढ़ीं। मेरे यहाँ ‘दैनिक भास्कर’, ‘नवभारत’, ‘देशबंधु’, ‘स्वतंत्र मत’, ‘नईदुनिया’, ‘एक्सप्रेस’, जैसे सारे अख़बार आते थे। और इन अख़बारों में भी हफ़्ते में दो दिन साहित्य के लिए अलग से एक पूरा पेज रहता था। अखबारों की संपादकीय भी ऐसी होती थी कि लगता था कि अंधेरे में कोई दीया जल रहा है। आजकल तो ख़बर भी ऐसी हो गयी हैं कि पता ही नहीं चलता कि ये ख़रीदी गयी है या गढ़ी गयी है।
धीरे-धीरे जब साहित्य के प्रति थोड़ी समझ पैदा हुई तो सबसे पहले प्रेमचंद को ही पढ़ा। उनकी लगभग सारी कहानियाँ और उपन्यास। ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘रंगभूमि’ और ‘कर्मभूमि’ इनमें ये तय कर पाना कठिन है कि ऊपर किसे रखा जाये। आचार्य रजनीश ओशो हमारे क्षेत्र में ही पले-बढ़े, इसलिए भी उनके प्रति झुकाव रहा तो उनके तर्क से दो-चार हुआ। उनकी ‘सम्भोग से समाधि तक’ भी पढ़ी, लेकिन उसने कोई ख़ास प्रभाव नहीं छोड़ा।
निराला, भवानी, महादेवी, बच्चन की कविताओं के साथ-साथ दुष्यंत, ग़ालिब, मीर, बशीर बद्र, फै़ज़, फ़िराक़, और निदा फ़ाज़ली की शायरी पढ़ी। इनमें मुझे बशीर बद्र बिल्कुल अपने-से जान पड़े। उन्हें पढ़कर लगा कि उनकी अभिव्यक्ति बिल्कुल मेरे ही दिल की बात है। इसी बीच धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ा। ये तो वाक़ई अद्भुत उपन्यास है। पूरी कहानी दिमाग़ में छायी रही कई दिनों तक। लेकिन जब कमलेश्वर का उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ पढ़ा, तो पिछला बुख़ार कुछ कम हुआ। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद लगा कि मुझे जिस किताब की तलाश थी, वो मुझे मिल गयी है।
जाने कितनी ही बार सोचता रहा इस उपन्यास को रचने से पहले कमलेश्वर जी ने हज़ारों साल का इतिहास खंगाला होगा। दुनिया भर के धर्मग्रंथों को निचोड़ डाला होगा। विभाजन की त्रासदी पर मैंने ‘तमस’ भी पढ़ा और ‘पाकिस्तान मेल’ भी, और एतिहासिक पृष्ठभूमि पर आचार्य चतुरसेन का उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधु’ भी पढ़ा, लेकिन इसकी शैली अलग है, इसका कथ्य अलग है। सिर्फ़ इतिहास के विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि हर जागरूक पाठक के लिए ये ज़रूरी किताब है।
यहाँ मैं ‘कितने पाकिस्तान’ की समीक्षा नहीं करूँगा, क्योंकि इस विषय में विस्तार ही विस्तार है और यह फ़िलहाल विषय है भी नहीं। हमारी पड़ताल उस किताब के बारे में थी, जिसे नहीं पढ़कर ज़िंदगी में कुछ कमी रहती।
अब सवाल ये है कि इतना सब पढ़ने के बाद क्या कमी रहती। इस उपन्यास से ही समझा कि वो चाहे हमारे मिथक हों, धार्मिक प्रतीक हों या फिर वास्तविक इतिहास, ये सब सबक़ लेने के लिए हैं, न कि रटने-रटाने के लिए। वो चाहे कोई व्यक्ति हो, समाज हो या देश हो, अगर अपने इतिहास को याद नहीं रखेगा, उसकी पड़ताल नहीं करेगा तो अपनी ग़लतियां दोहराता जाएगा। आज हम लोग जिस अंधे राष्ट्रवाद की गहरी खाई की तरफ़ बढ़ रहे हैं, ऐसे में तो इसकी ज़रूरत और बढ़ जाती है।
(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव – संपादक)

धर्मेंद्र तिजोरीवाले 'आज़ाद'
निजी व्यवसाय के समानांतर स्वतंत्र लेखन करने वाले धर्मेंद्र आज़ाद समकालीन कवियों एवं ग़ज़लगो शायरों में शुमार हैं। ग़ज़ल, कविता, कथा जैसी विधाओं में आपके रचना संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'ज्ञानपुंज' पत्रिका का संपादन भी कर चुके हैं और अनेक पत्र पत्रिकाओं व पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं। संपर्क-94254 69326
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बहुत गहरा अध्ययन रहा है आपका साहित्य का ।साहित्य आपने पढ़ा ही नहीं जिया भी है।
कितने पाकिस्तान सच में खुद को साक्षी भाव से देखने का मौका देती है । आपके विचार तंतुओं को उद्वेलित करती है । कमलेश्वर जिस तरह दो समय को साथ लेकर चलते हैं अपने चेतन अवचेतन के साथ लगातार विवेचना करते हैं ये चकित करता है ।
जैसा कि आजकल कोशिश की जा रही है इतिहास के एक वक्फे को जड़ से खत्म कर देने की ..ये कितना बचकाना मालूम होता है ।
जैसे किसी ने कहा भी है कि , जो क़ौम अपना इतिहास याद नहीं रखती वो लगातार पतन की ओर अग्रसर होती है ।
किताब हमे सतत् ये याद दिलाती है ।
आज़ाद जी को शुभकामनाएं ..