
- December 10, 2025
- आब-ओ-हवा
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विरोध, प्रतिरोध, प्रतिकार... ऐसे शब्द साहित्य और समाज में अक्सर सुनायी दे रहे हैं लेकिन इनकी ध्वनि क्या कोई आकार ले पाती है? ये आवाज़ें बेअसर क्यों हैं और कैसे असरदार हो सकती हैं? ऐसे अनेक बिंदुओं को खोजता यह चिंतन...
संजीव जैन की कलम से....
नफ़रत का मनोविज्ञान
नफ़रत, भय और हिंसा क्यों फैलती है और उनका विरोध क्यों अक्सर विफल हो जाता है? इस विषय पर बहुत कम विचार किया गया है। मानवीय सरोकारों से जुड़े लोग, संगठन, संस्थाएं नफ़रत, भय और हिंसा जैसी मनोवृत्तियों और घटनाओं के ख़िलाफ़ हमेशा से विरोध प्रदर्शन, साहित्य लेखन और संगोष्ठियां करते रहे हैं। परंतु शायद ही कभी यह सोचा गया हो कि उनके प्रयास असफल या विफल क्यों होते रहे हैं? उनके तमाम मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्धता के बावजूद नफ़रत, भय और हिंसा लगातार फैलती रहती है और हमेशा सफल हो जाया करती है।
इसके कारण बहुत गहरे और मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल हैं। इन पर विचार किये बिना मानवीय सरोकारों वाले प्रयास सही उद्देश्य से होते हुए भी असफल होते रहे हैं और होते रहेंगे। चलिए इसके ़मूल कारणों पर विचार करते हैं।
मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलाजिकल कारण
1. नकारात्मक (नफ़रत, भय, हिंसा) भावनाएँ “विरोध” पर आधारित नहीं होतीं वे “अनुभूति” पर आधारित होती हैं इसलिए टिकती हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय तथ्य है।
नफ़रत, हिंसा और भय- इनका स्वभाव प्रतिक्रिया-आधारित नहीं, अनुभूति-आधारित होता है। वे सीधे मस्तिष्क के एमिग्डाला (Amygdala) और लिम्बिक सिस्टम से जुड़ते हैं, जो “सुरक्षा” और “ख़तरे की पहचान” के लिए ज़िम्मेदार है। मस्तिष्क का यह भाग एमिग्डाला तथ्यों या नैतिकताओं को नहीं समझता। वह सिर्फ़ संकेत (signals) पढ़ता है— कौन हमें सुरक्षित महसूस कराता है, कौन असुरक्षित? नफ़रत, भय और हिंसा के पीछे की वैचारिकी मस्तिष्क को एक सुरक्षा का अहसास करा देती है। कुछ लोग अपने समूह या वर्ग को यह अनुभूत करवा देते हैं कि उनकी सुरक्षा दूसरे वर्ग या समूह से नफ़रत करने में ही है, या भय का आतंक का वातावरण ही उन्हें कुछ विशिष्ट सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है। यह बात मस्तिष्क का एमिग्डाला सकारात्मक रूप से स्वीकार करके नफ़रत और भय के प्रसार को स्वीकार कर लेता है।
नफ़रत इसलिए तेज़ी से फैलती है क्योंकि वह “ख़तरे का सरल संकेत” देती है। इंसानी दिमाग़ सरल संकेतों को जटिल तर्कों की तुलना में जल्दी स्वीकार करता है इसलिए नफ़रत, भय और हिंसा जैसी मनोवृत्तियां मनुष्य के अंदर सकारात्मक सुरक्षा का भाव पैदा करती हैं।
इसका अर्थ: नफ़रत को स्वीकार करने के लिए दिमाग़ को कोई तर्क नहीं चाहिए। पर नफ़रत के विरोध के लिए बहुत भारी तर्क चाहिए— जो सामान्य मन स्वीकार नहीं करता। इसलिए नफ़रत भय और हिंसा का विरोध जो कि मानवीय हित में होते हुए भी ऊपरी सतह यानि बुद्धि के स्तर पर रह जाता है, वह अनुभूति का हिस्सा नहीं बन पाता है। वह मस्तिष्क और दिमाग़ में घर नहीं करता है और समाज के आचरण में नहीं उतर पाता। चूंकि नफ़रत का विरोध भी एक तरह से नफ़रत ही है। नफ़रत करने वाले से नफ़रत। मस्तिष्क इस तर्क को नहीं समझ पाता है।
2. दूसरी बात नफ़रत का प्रसार “विरोध” से नहीं, “अनुरूपता” से होता है समाजशास्त्र में इसे Social Conformity Bias कहते हैं।
नफ़रत फैलाने वाले लोग प्रायः विरोधी स्वर नहीं उठाते, वे ख़ुद को एक सकारात्मक पहचान के रूप में पेश करते हैं: “हम सही हैं” “हम सुरक्षित हैं” “हमारी बात सरल है” जबकि नफ़रत का विरोध करने वाले अनजाने में ख़ुद को कठोर, उग्र, आक्रामक दिखा देते हैं, क्योंकि वे “ना” कह रहे होते हैं।
मानव मस्तिष्क स्वभावतः “ना” को अवचेतन में ख़तरे जैसा महसूस करता है। इसलिए विरोध करने वाला सही हो सकता है, पर उसके स्वर कौन मस्तिष्क “अस्वीकृत” कर देता है। यह बात हमें समझनी चाहिए और अपनी रणनीति और तरीक़े बदलना चाहिए अन्यथा हमारे प्रयास व्यर्थ होते रहेंगे।
3. विरोध खुद नफ़रत को ऊर्जा देता है— (Psychology of Polarization) जब किसी विचार का विरोध होता है, तो उसका भावनात्मक मूल्य बढ़ जाता है। इसे Polarization Reinforcement कहते हैं: विरोध = पहचान को मज़बूत करता है, पहचान = समूह मानसिकता को ऊर्जा देता है, समूह मानसिकता = नफ़रत को स्थायी रूप देती है, नतीजा: विरोध जितना बढ़ता है, नफ़रत का प्रभाव उतना फैलता है। नकारात्मक मूल्य सकारात्मकता के आवरण में टिक जाते हैं। और विरोध जैसे सकारात्मक मूल्य निगेटिव भावना के कारण बिखर जाते हैं।
4. नफ़रत का प्रसार “धीमी संवहन” (Low-Noise Diffusion) से होता है- नफ़रत आमतौर पर, शोर नहीं करती, अपने को किसी विचारधारा की तरह प्रचारित नहीं करती, वह सामाजिक तानों-बानों में धीरे-धीरे घुलती है।
इसे समाजशास्त्र में कहते हैं: Silent Diffusion of Norms क्योंकि नफ़रत कोई वैचारिक बहस नहीं है, वह एक भावनात्मक आलिंगन है। और मनुष्य की भावनाएँ तर्कों की तुलना में बहुत तेज़ी से संक्रमण करती हैं। तर्क एक हथियार है जो एक-दो बार चलकर रुक जाता है। भावना एक लहर है जो दूर तक जाती है। तर्क न्यायालय में काम आ सकते हैं, मस्तिष्क के एमिग्डाला के सामने बेकार की चीज़ हैं। और एमिग्डाला ही हमें गति और प्रेरणा देता है। नफ़रत, भय, हिंसा सीधे एमिग्डाला को अटैक करके अपनी जगह बना लेते हैं।
5. विरोध क्यों असफल होता है— (Neuroscience of Threat Perception) जब आप किसी के विश्वास का विरोध करते हैं, तो उसका Prefrontal Cortex (तर्क भाग) नहीं, बल्कि Amygdala (भावनात्मक भाग) सक्रिय हो जाता है। Amygdala की प्रतिक्रिया होती है: ख़तरा → बचाव, बचाव →ज़िद, ज़िद →टकराव। इसलिए विरोध करने वाले की “सही बात” भी दूसरे के लिए “व्यक्तिगत ख़तरा” महसूस हो सकती है। वह ख़ुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है और मस्तिष्क कहता है कि यहां से हटो। व्यक्ति उस विरोध की बात से ख़ुद को हटा लेता है। उसकी तात्कालिक बुद्धि प्रशंसा कर देती है, ताली बजा देती है और आगे बढ़ जाती है अपनी सुरक्षात्मक तंत्र के साथ।
6. नकारात्मक मूल्य सकारात्मकता के साथ क्यों स्वीकार कर लिये जाते हैं? इसे कहते हैं: Positive Framing Bias यदि आप किसी भी नकारात्मक मूल्य को सुरक्षा, पहचान, गरिमा, समुदाय से जोड़ दें, तो दिमाग़ उसे तुरंत सकारात्मक मान लेता है।
यही कारण है— “नफ़रत, भय, हिंसा फ्रेमिंग में सकारात्मक बन जाती है।” और उस वर्ग का मस्तिष्क उसे संभाल लेता है। सुरक्षा, पहचान, गरिमा, समुदाय का हित ये सब मस्तिष्क के एमिग्डाला को गहरे तक प्रभावित करते हैं। वह इनके प्रति अवचेतन स्तर पर क्रियाशील हो जाता है। बुद्धिजीवी मनुष्य भी अपने अवचेतन से संचालित होते हैं इसलिए वे नफ़रत जैसी मनोवृत्तियों के प्रभाव में काम करने लगते हैं।
- नफ़रत फैलती है क्योंकि वह तर्क नहीं, सुरक्षा का संकेत देती है।
- विरोध असफल होता है क्योंकि वह दिमाग में ख़तरे का संकेत बन जाता है।
- नफ़रत-विरोध नफ़रत का प्रतिरूप बन जाता है, इसलिए वह नफ़रत को और बड़ा करता है।
- नफ़रत का असली इलाज विरोध नहीं, उस फ्रेम को बदलना है जिसमें वह स्वीकार की जाती है।
नफ़रत, हिंसा और भय व्यक्तिगत न्यूरोलोजिकल प्रतिक्रियाओं से शुरू होते हैं, पर वे सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, और औपचारिक संस्थागत परतों के साथ मिलकर टिकते और फैलते हैं। विरोध अक्सर विफल इसलिए होता है क्योंकि वह भावनात्मक संदर्भ को चुनौती देता है और मानव मस्तिष्क भावनात्मक संकेतों पर तर्क से पहले प्रतिक्रिया करता है। इस समस्या का समाधान केवल तर्क से नहीं हो सकता — इसे भावनात्मक, सांस्कृतिक और संस्थागत स्तर पर पुनर्निर्माण करना होगा: फ्रेम बदलना, संपर्क बढ़ाना, असमानता घटाना, और सूचना पारिस्थितिकी को पुनःआयोजित करना।
व्यावहारिक कारण
नफ़रत, हिंसा और भय क्यों फैलते हैं? नफ़रत इसलिए फैलती है क्योंकि वह सरल होती है। प्यार, समझ और धैर्य कठिन काम हैं। नफ़रत आसान है — बस किसी बात से खीझ हुई और मन ने लेबल लगा दिया: “ये लोग ऐसे ही होते हैं।” “यह आदमी बुरा है।” “इनसे बचकर रहो।”
- दिमाग़ आसान रास्ता चुनता है। किसी चीज़ को “बुरा” कह देना, उसे समझने से सरल होता है इसलिए नफ़रत जल्दी पक जाती है।
- नफ़रत इसलिए टिकती है क्योंकि वह चुपचाप बैठ जाती है नफ़रत हमेशा शोर से नहीं आती। ज़्यादातर वह धीरे-धीरे, मन के अंदर, बिना बोले घर कर लेती है। किसी का अंदाज़ पसंद नहीं आया। किसी ने ध्यान नहीं दिया। कोई बात बुरी लग गयी। मन कहता है: “ठीक है, मैं इसे याद रखूंगा।”
- यही जगह है जहाँ नफ़रत जड़ पकड़ती है। लोग जान ही नहीं पाते कि वे कब बदलने लगे।
- नफ़रत इसलिए पल्लवित होती है क्योंकि लोग विरोध को पसंद नहीं करते। अगर आप किसी को कहें— “तुम ग़लत हो”, “तुम्हारी सोच ठीक नहीं”, “ऐसा मत करो” तो वह आपकी बात नहीं सुनता, बल्कि आपके विरोध को सुनता है।
- मनुष्य विरोध से बंद हो जाता है, खुलता नहीं। इसलिए नफ़रत का विरोध करके उसे हटाया नहीं जा सकता। विरोध नफ़रत को और मज़बूत बना देता है।
- नफ़रत फैलाने वाले लोग ख़ुद को ‘सही’ दिखाते हैं वे कभी यह नहीं कहते कि “मैं नफ़रत फैला रहा हूँ।” वे कहते हैं: “मैं सिर्फ़ सच बोल रहा हूँ।” “मैं समाज की रक्षा कर रहा हूँ।” “मैं ईमानदारी से बात कर रहा हूँ।” जब नफ़रत ख़ुद को सकारात्मक ढंग से पेश करती है, तो लोग उसे जल्दी मान लेते हैं। नफ़रत सच की तरह बोलने लगती है।
नफ़रत न फैले – व्यावहारिक तरीक़े
- बात को व्यक्ति से अलग रखिए। जब कोई ग़लती करे, उसे व्यक्ति पर मत चढ़ाइए। ग़लती ख़राब हो सकती है, पर इंसान हमेशा उससे बड़ा होता है। नफ़रत वहीं जन्म लेती है जहाँ लोग ग़लती और इंसान को मिलाकर एक बना देते हैं।
- अपनी प्रतिक्रिया को 10 सेकंड रोकिए। नफ़रत त्वरित प्रतिक्रिया में जन्म लेती है। अगर किसी बात ने ग़ुस्सा दिलाया, 10 सेकंड रुक जाओ। 10 सेकंड दिमाग़ को उस भावनात्मक आग से बाहर निकाल देते हैं। यह साधारण तरीक़ा बहुत प्रभावी है।
- “क्यों” पूछने की आदत डालिए, “कौन” नहीं। नफ़रत हमेशा “कौन” पर अटकती है: कौन दोषी है? कौन ग़लत है? समाधान हमेशा “क्यों” में मिलता है: वह ऐसा क्यों कर रहा है? उसे ऐसा क्यों लगा? मैंने ऐसा क्यों माना? “क्यों” सोच समझ पैदा करता है, “कौन” सोच पर दीवारें खड़ी करता है।
- अपनी पीड़ा या असहमति को आरोप बनाकर मत कहें। उदाहरण: “तुम हमेशा बुरी बात करते हो।” “तुम्हारी बात से मुझे बुरा लगा”… पहले वाक्य में लड़ाई है। दूसरे में संवाद है। इंसान दूसरे को चोट पहुँचाने वाला संदेश स्वीकार नहीं करता, पर दुख बताने वाला संदेश सुन लेता है।
- नफ़रत बोलने वालों को “जवाब” मत दीजिए — पर उनके पास “जगह” भी मत बनाइए। नफ़रत को हवा जवाब देने से मिलती है। पर चुपचाप सहने से भी वह फैलती है।
- सही तरीका है: साफ़, शांत, बिना ग़ुस्से के सीमा बताना। उदाहरण: “मैं इस तरह की बातें ठीक नहीं मानता, इसलिए इस विषय पर मैं शामिल नहीं होऊँगा।” ना लड़ाई, ना सहमति — बस दूरी।
- समाज में नफ़रत कम करने का सबसे सरल तरीक़ा: किसी पर लेबल मत लगाइए। लेबल सबसे तेज़ ज़हर हैं: “ये लोग ऐसे होते हैं।” “इनसे भलाई की उम्मीद मत रखना।” “ये कभी नहीं सुधरेंगे”… लेबल लगते ही इंसान इंसान नहीं रहता— एक “श्रेणी” बन जाता है। और नफ़रत को श्रेणियाँ ही चाहिए होती हैं।
- घर में और रोज़मर्रा में प्रेम को ‘तरीक़े’ के रूप में उपयोग कीजिए, भावना के रूप में नहीं। प्रेम भावना है — पर व्यवहार में उसे एक तरीक़ा बनाना ज़्यादा असरदार होता है।
- बात सरल रखिए। सामने वाले को सम्मान दीजिए। निर्णयों में पारदर्शिता रखिए। किसी को छोटा महसूस मत कराइए। प्रेम भावना बाद में आये तो ठीक है, पर अगर वह सिर्फ़ एक व्यवहारिक “नरमी” ही हो, तो भी समाज स्वस्थ हो जाता है।
- सबसे व्यावहारिक वाक्य- नफ़रत तब मरती है जब सामने वाला उसे ख़ुराक न दे, और विरोध करने वाला उसे ईंधन न दे।
- नफ़रत एक आग है— जवाब देने से भड़कती है और अनदेखा करने से फैलती है।
- इसे ख़त्म करने का तरीक़ा है: शांत, स्पष्ट, और सीमाबद्ध व्यवहार— जो न लड़ता है, न झुकता है।
विकल्प न कि विरोध
नफ़रत–समरसता, भय–अभय, हिंसा–अहिंसा केवल शब्दों के विलोम नहीं हैं, बल्कि व्यवहार-प्रणालियाँ हैं। इनका सही उपयोग तभी होता है जब हम उन्हें “भावना” या “आदर्श” की तरह नहीं, बल्कि व्यावहारिक तरीक़े (practices) की तरह अपनाते हैं।
नफ़रत का विकल्प: समरसता (Harmony)
समरसता का अर्थ है — संबंधों में संतुलन, दूरी में भी सम्मान और असहमति में भी शांति। यह प्रेम से अलग है। प्रेम ज़रूरी नहीं; समरसता ज़रूरी है। समरसता को व्यवहार में लाने के तरीक़े:
- मतभेद को आदमी से अलग रखिए, कहिए: “मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ।” यह मत कहिए: “आप ग़लत आदमी हैं।” यही समरसता है।
- टकराव को संवाद में बदल दीजिए- किसी पर बोलने के बजाय, किसी के साथ बोलिए। “तुम ऐसा क्यों करते हो?” → टकराव “हम इसको कैसे समझें?” → समरसता
- छोटे-छोटे सम्मान जोड़िए- धन्यवाद कहना, सुनते समय मोबाइल दूर रखना, सामने वाले की बात में रुचि दिखाना, ये बहुत साधारण चीज़ें हैं, पर यही समरसता की असली तकनीकें हैं।
- संबंधों में दूरी को भी स्वीकारें- हर रिश्ता पास होना ज़रूरी नहीं। जिससे मतभेद हो, उससे दूरी भी समरसता है— जब तक सम्मान बाक़ी है।
- “अंतिम तर्क” मत दीजिए- नफ़रत अंतिम तर्कों में जन्म लेती है: “तुम समझते ही नहीं”, “तुम हमेशा ऐसा करते हो” समरसता छोटी, नरम भाषा से बनती है।
भय का विकल्प: अभय (Fearlessness)
अभय का अर्थ यह नहीं कि मन में डर न हो; अभय का अर्थ है — डर को जगह न देना कि वह हमें ग़लत व्यवहार करवाये। अभय को व्यवहार में लाने के तरीक़े:
- छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियाँ निभाएँ- यदि आप रोज़ाना छोटे निर्णय बिना डर के लेते हैं, तो बड़े निर्णय अपने-आप आसान हो जाते हैं। अभय अभ्यास से आता है, भावना से नहीं।
- डर को बोलकर बाहर निकालें- शरीर में दबा डर हिंसा बनता है; मुँह से निकाला डर अभय बनता है। कहें: “मुझे अभी यह डर लग रहा है।” यही अभय की शुरूआत है।
- निर्णय में तत्परता- जिसे आप टालते हैं, उसी में भय बढ़ता है। आज का निर्णय आज कर दीजिए, भय घटेगा।
- सामने वाले को समझ में आने वाली भाषा में अपनी बात कहें- अभय का मतलब कठोरता नहीं; स्पष्टता है। स्पष्ट भाषा + शांत स्वर = अभय
- मन में भलाई के लिए जगह रखें, जीतने के लिए नहीं- भय का मूल स्रोत है — हारने का भय। अभय का मूल संसाधन है — सही होने की सत्यनिष्ठा। जब लक्ष्य जीत नहीं, बल्कि भलाई होती है, तो अभय अपने-आप आ जाता है।
हिंसा का विकल्प: अहिंसा (Non-violence)
अहिंसा का अर्थ “कमज़ोरी” नहीं है। अहिंसा = ज़िम्मेदार प्रतिक्रिया। हिंसा = आवेगी प्रतिक्रिया। अहिंसा को व्यवहार में लाने के तरीक़े:
- प्रतिक्रिया देने से पहले 5 सेकंड रुकें। हिंसा तुरंत जन्म लेती है। अहिंसा उस विराम का नाम है जिसमें हम ख़ुद से कहते हैं: “मैं इससे बेहतर प्रतिक्रिया दे सकता हूँ।”
- ग़ुस्से का केंद्र बदल दें- ग़ुस्सा “व्यक्ति” पर न डालें। उसे “स्थिति” पर डालें। उदाहरण: “तुम ग़लत हो।” → हिंसा। “स्थिति कठिन है, चलो कुछ करें।” → अहिंसा
- सीमाएँ बनाइए- अहिंसा का मतलब सब सहना नहीं है। अहिंसा का अर्थ है — दूसरे को बिना तोड़े अपनी सीमा बताना। “मैं इस तरह की बात स्वीकार नहीं करूंगा।” यह अहिंसा है।
- निर्देश दें, आरोप नहीं- अहिंसा बात को “निर्देश” में बदल देती है: “ऐसा मत करो।” नहीं। “मुझे यह चाहिए कि हम इस तरह बात करें।” हाँ
- दूसरे को गरिमा देकर बोलिए- जहाँ गरिमा है, वहाँ हिंसा अंदर घुस ही नहीं सकती।
समरसता = संबंधों में संतुलन।
अभय = डर को नियंत्रित रखकर निर्णय लेना।
अहिंसा = प्रतिक्रिया में जिम्मेदारी और गरिमा रखना।
ये तीनों “भावनाएँ” नहीं हैं, ये दैनिक अभ्यास हैं। अगर इन्हें रोज़मर्रा की छोटी-छोटी परिस्थितियों में अपनाया जाये, तो समाज में नफ़रत, भय और हिंसा स्वतः कम हो जाते हैं क्योंकि विकल्प ज़्यादा शक्तिशाली होते हैं, बजाय विरोध के।
हमें ताक़तवर विकल्प देने की कोशिश करना चाहिए, जो मनुष्य के मस्तिष्क को प्रभावित कर सके और उसके अवचेतन मन में जगह बना सके। उसे असुरक्षा के ख़तरे को महसूस न होने दें। उसकी और उसके समूह की पहचान को खंडित न करे। वर्ग और व्यक्ति की गरिमा को बनाये रखें उसे ठेस न पहुंचने दें।
सबसे महत्वपूर्ण सूत्र आर्थिक और सामाजिक नुक़सान के प्रति जागरूक बने रहें। किसी भी व्यक्ति को सबसे प्राथमिक तौर पर इनके नुक़सान का ख़तरा प्रभावित करता है। इस लेख का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि हम कुछ और सोचें बजाय एक ही ढर्रे पर चलते रहने के, तो शायद कुछ सकारात्मक रूपांतरण की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।

संजीव कुमार जैन
लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय महाविद्यालय, गुलाबगंज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।
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मनन योग्य रचना
उत्तम
जरूरी, महत्वपूर्ण और सामयिक रचना! धन्यवाद!