
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 6
नया ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....
कुमार गंधर्व और विष्णु चिंचालकर
1976 की एक शाम? रवींद्र भवन के मुक्ताकाश मंच को घेरे चंदोवे के नीचे सुनने वालों की बड़ी सभा बैठी थी। सामने मंच के काले विंग्ज़ और पर्दे पर सजावट को देख सब हैरत में थे। ऐसी मनोहारी सजावट तो कभी देखी नहीं थी और सजावट के उपादान थे- बाँस के सूपे, डलिया, झाड़ू!
वे अपने साथ कई कई स्मृतियाँ घेर लाये थे। फटकने, चालने, बुहारने की ध्वनियाँ!
एक सादा सी माँगलिकता उपस्थित हो गयी थी मंच पर। सब आनंदित थे।
जिसने यह साज-सज्जा की थी, वे विष्णु काकू (चिंचालकर जी) मेरा हाथ पकड़े सामने की पंक्ति में रखी कुर्सी पर बैठ गये। उन्होंने सुबह ही कह दिया था कि वे शाम को मुझे चित्र बनाकर दिखाएँगे। विष्णु काकू जब भी आते, मैं उनसे चित्र बनाने के लिए कहती। पर वे अक्सर अपने झोले में से कोई सूखी टहनी या पत्थर का टुकड़ा निकालते और कहते- ‘देखो, सियार कैसे गर्दन उठाकर हूँक रहा है!’
फिर अचानक वे फ़र्श पर बैठ जाते और एक धब्बे की ओर इशारा करके कहते- ‘ये बच्चा देखो, माँ से किस चीज़ की ज़िद कर रहा है, ‘वे झोले से हरा स्केच पेन निकालते और धब्बे के इर्द-गिर्द रेखा खींचते तो वह चित्र जो अब तक मुझसे ओझल था, सचमुच उजागर हो जाता! विष्णु काकू को हर जगह चित्र दिखते थे। लेकिन उस शाम पण्डाल में वे बाक़ायदा स्केच बुक और कलम ले कर बैठे थे।
कुमार (कुमार गंधर्व) जी ने गाना आरंभ किया। स्वरों को उन्होंने जैसे पहले, हौले-हौले से जगाया। पुचकारा। मुँह धुलाया, जागृत किया। और तब वे यानी स्वर, खेलने लगे उनके उस प्रांगण में।

मेरे आगे सब कुछ दो बार घट रहा था- पहले वहाँ, सामने मंच पर और फिर यहाँ, बगल में बैठे विष्णु काकू की स्केच बुक में।
कुमार जी की आँखें बंद थीं। हाथ कभी स्वरों को नीचे किसी गहवर से खींचकर लाते, तो कभी उछाल देते कंदुक सा, हवा में। शब्द वह ओझल हो जाता आकाश में। सुनने वाले सब स्तब्ध। विष्णु काकू का हाथ भी जहां का तहाँ ठिठका हुआ। मंच पर कुमार जी का चेहरा हल्का-सा दाईं ओर को झुका हुआ। एक हाथ कान को छूता सीधा हवा में उठा हुआ, स्वर के अवतरण को थामने के लिए और दूसरा इत्मीनान से उनकी गोद में बैठा हुआ। अगले ही पल कुमार जी की वह छबि उतर आयी थी पन्ने पर, कलम की स्पष्ट गिनी-चुनी रेखाओं में। मेरी हैरत का ठिकाना नहीं था- एक भी रेखांकन में न कुमार जी की आँखें बनी थी, न नाक, न मुँह। सिर्फ़ उनका चौड़ा माथा और ठुड्डी थे। हैरत ये कि कुमार जी अचूक रूप से पूरे के पूरे उपस्थित थे वहाँ। किसी कैमरे ने कुमार जी कि उन विशिष्ट मुद्राओं को आज तक वैसे नहीं पकड़ा, जैसे उस रोज़ विष्णु काकू ने मिनटों में काग़ज़ पर उतार दिया था। (वे चित्र सभी को बहुत पसंद आये थे और कुमार जी पर केंद्रित पूर्वग्रह के अंक में भी छपे थे।)
उस शाम की अमिट छबि है मन पर।
वो कुमार जी को सुनने का पहला मौक़ा था, यह पक्के तौर पर नहीं कह सकती, पर उनके गायन से मेरा एक पाताली नाता उसी रोज़ बना।
उन्होंने राग कल्याण सुनाया था और फिर कबीर के कुछ पद सुनाये थे। मिश्र खमाज के लाघवपूर्ण विन्यास में कुमार जी की आवाज़ वलयाकार घूमती संपूर्ण जीवन का फेरा लगा आयी-
“कौन ठगवा नगरिया लूटल हो”
इस पर तो पूरी सभा ही लुट गयी थी। ख़्याल आता है कुमार जी का गायन समाप्त हो गया, उद्घोषक ने समाप्ति की घोषणा भी कर दी, लेकिन लोग सभा से जैसे जाना ही नहीं चाह रहे थे। कोई आधे-एक घंटे तक सब आपस में या कुमार जी से बात करते वहीं बने रहे। आने वाले कई दिनों तक हमारे घर में कुमार जी की गायी पंक्तियाँ रह-रहकर सुनायी देती रहीं। तब मैं कोई नौ बरस की थी, आज सोचती हूँ तो निश्चित ही लगता है मुझे क्या खाक़ समझ आ सकता था? पर उस रोज़ यह यक़ीन था कि कुमार जी के गायन की एक-एक बारीक़ी, उसकी अनंत गहराई समझ में आयी थी। बाद के दिनों में अलबत्ता यह ज़ुर्रत जाती रही।
और अब, इतने वर्षों बाद, समझने-ना समझने के परे यह सुख आद्योपांत डुबोये रहता है कि उन्हें सुन रही हूँ। यह अपूर्व सौभाग्य है।

शम्पा शाह
कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

यह एक नायाब याद है। आबो हवा के fb पोस्ट पर जैसा विवेक भाई ने लिखा वाकई यह लेख हमें एक ट्रांस में ले जाता है, हम उस महफ़िल में पहुंच जाते हैं और दिल की तहों में एक सुकून बहने लगता है. एक ही खयाल आता है बस यह बज़्म कभी ख़त्म न हो
बहुत ही अपना सा लगा पढ़ के । ये छोटे छोटे अनुभव ज़िंदगी को विशाल बना देते है ।
चिंचालकर गुरुजी को वह दिखता था जैसे बच्चे को दिखता है और हम समझ नही पाते. बच्चों को लकडी की काठी मे शिवाजी का घोडा नजर आता है और हम को उस का ब्रैंड और कीमत.
प्रिय शम्पा, तुम ने हर बार की तरह बडी सहज और आत्मीय भाषा मे गुरुजी की याद साझा की. अच्छा लगा.
‘ सादा सी माँगलिकता ‘
यह शब्द-कुल शम्पा जी ही रच सकते हैं। मुक्ताकाश में प्रवेश से ही पढने वाले को होने लगता है कि वह लेखक के बचपन से हो कर अपने बचपन में तदुपरान्त मुक्ताकाश में विष्णु काकु संग सज गया है।
कभी कुमार जी कभी स्वरों का स्केच, एक, चित्त पर भी बिन आवज़ उभरता रहता है।
वह दिन, इंक में, ऐसा ही आ सकता था।
‘स्वरों को उन्होंने जैसे पहले, हौले-हौले से जगाया। पुचकारा। मुँह धुलाया, जागृत किया। और तब वे यानी स्वर, खेलने लगे उनके उस प्रांगण में।’
ऐसा पावन वर्णन, सुर का, मैंने पहली ही दफ़ा यहाँ जाना… दरसा।
और भी लिखें ~ आभार
‘ सादा सी माँगलिकता ‘
यह शब्द-कुल शम्पा जी ही रच सकते हैं। मुक्ताकाश में प्रवेश से ही पढने वाले को होने लगता है कि वह लेखक के बचपन से हो कर अपने बचपन में तदुपरान्त मुक्ताकाश में विष्णु काकु संग सज गया है।
कभी कुमार जी कभी स्वरों का स्केच, एक, चित्त पर भी बिन आवज़ उभरता रहता है।
वह दिन, इंक में, ऐसा ही आ सकता था।
‘स्वरों को उन्होंने जैसे पहले, हौले-हौले से जगाया। पुचकारा। मुँह धुलाया, जागृत किया। और तब वे यानी स्वर, खेलने लगे उनके उस प्रांगण में।’
ऐसा पावन वर्णन, सुर का, मैंने पहली ही दफ़ा यहाँ जाना… दरसा।
और भी लिखें ~ आभार
Shampa’s words capture the essence effortlessly. I recollect her story telling skill back in 1985 with gas affected children. Simply celestial.