आशीष दशोत्तर, ashish dashottar
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

छूटती चीज़ों को संभालती शाइरी

           वक़्त बहुत तेज़ी से बदल रहा है। जिस तेज़ी से वक़्त बदल रहा है उसी तेज़ी से इंसान में भी तब्दीली आ रही है। दुनियावी ज़रूरतों में भी कई सारी तब्दीलियां आ रही हैं। इल्मो-अदब इन सबसे से कहीं अछूता रह सकता है भला!

शाइरी ने हर वक़्त के सांचे में ख़ुद को ढाला और वक़्त को अपने सांचे में ढालने से भी नहीं चूकी। उसने अपने वक़्त के साथ चहलक़दमी की। क़दम से क़दम मिलाकर शाइरी भी आगे बढ़ती रही। यही वज्ह है कि आज के दौर की शाइरी उन तमाम तब्दीलियों को अपने कहन में शामिल कर रही है जो आम इंसान के इर्द-गिर्द मौजूद हैं। ये तब्दीलियां जज़्बात की भी हैं, दुनियावी ज़रूरतों की भी और हमारे रिश्तों की भी। शाइर ज्ञानप्रकाश विवेक इसी बदलाव को कुछ इस तरह बयां करते हैं-

हमारे हाथ में ये लैपटॉप तुमने क्या दिया
हमारे हाथ से किताब कॉपियां चली गईं

हमारी ख़्वाहिशों ने एक हाथ में अगर कुछ दिया है तो दूसरे हाथ से कुछ ले भी लिया है। शाइरी को चिंता उस दूसरे हाथ से छूटती जा रही चीज़ों की ही है। जो छूट चुका है वह लौटकर नहीं आना है। आने वाली नस्लें कभी-कभार इनका ज़िक्र कर लें तो ठीक वरना छूट चुकी चीज़ों को शायद ही कोई याद करे। मगर शाइर उन छूट चुकी चीज़ों को अपने लफ़्ज़ों में पिरोने से पीछे नहीं हटा है। वह उस दौर की हर बात को ताज़ा करता है जिससे खिलते फूलों की महक आती है। उदयप्रताप सिंह कहते हैं-

मोबाइलों के दौर के आशिक़ को क्या पता
रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकाल के

मुसद्दस हाली - अल्ताफ़ हुसैन "हाली"

आज की ज़रूरतों ने इंसान को बहुत कुछ दे दिया, लेकिन फिर भी वह अकेला ही है। ज़रूरतों के बीच वह ख़ुद को तन्हा पाता है। इसे प्रगति कहें या पिछड़ापन? शाइरी की नयी ज़ुबान और कहन की नयी शैली की तरफ़ ग़ौर करें तो इस चिंता को भी शाइरी में जगह मिलती नज़र आती है। नज़्म सुभाष के यहां यही चिंता महसूस की जा सकती है:

आदमी तन्हा यहां क्यों जबकि हरदम साथ-साथ
वाट्सऐप है फ़ेसबुक है और इंटरनेट है

पूरी दुनिया में अपनी मुट्ठी में क़ैद करने के बाद भी इंसान के पास कुछ नहीं बचा है। वह बहुत कुछ पाने की चाह में सब कुछ खोता जा रहा है। ज़रा-सी रोशनी को क़ाबू करने के चक्कर में उजालों के तहख़ानों को छोड़ता जा रहा है। रईस फ़रोग़ कहते हैं-

वैसे तो मैं ग्लोब को पढ़ता हूं रात-दिन
सच ये है इक फ्लैट है जिसका मकीं हूं मैं

अब ज़माना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है। बहुत गति के साथ इंसान की ज़िन्दगी बदल रही है। इस बदलाव की आपाधापी में उसके हाथ से जो कुछ छूट रहा है, उसे शाइरी संभाल रही है। शाइरी के हाथों में वे नायाब मोती हैं, जिन्हें इंसान ने नक़ली कांच के टुकड़ों को पकड़ने की चाहत में छोड़ दिया है। शाइरी के आंचल में वे सुख हैं, जिन्हें इंसान सुविधाओं के सोफ़े पर बैठकर बिसरा चुका है। शाइरी के पहलू में वे हसीन लम्हे हैं जिनसे इंसान की ज़िन्दगी महकती रही है। शाइरी को यक़ीन है कि एक दिन इंसान उसके क़रीब आकर अपनी गुम हुई चीज़ों को ज़रूर टटोलेगा।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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