
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग मिथलेश राय की कलम से....
हिन्दी सिनेमा की पहली जुबली गर्ल - मुमताज़ शांति
उन दिनों हमारी कॉलोनी ऐसी नहीं थी। इतना नीरस व अकेला जीवन नहीं था। तब लोग बड़े मिलनसार थे हालांकि कोई एकरूपता नहीं थी। कोई उत्तर प्रदेश, कोई महाराष्ट्र, दक्षिण भारत के लोग रहते थे। धर्म भी सबके एक थे, पर आपस में बोलचाल न हो ऐसा हो नहीं सकता था, मनमुटाव भी होते पर अगले दिन अब सामान्य हो जाता, हां एक बात ज़रूरी थी कि फ़िल्मी अभिनेता, अभिनेत्री को लेकर पूरी कॉलोनी कई समूह में बंटी थी। कुछ लोग 1940 के पहले के अभिनेता, अभिनेत्री के प्रशंसक तो कुछ लोग 1950 से 1980 के युवा पीढ़ी के।
ये फैन्स क्लब केवल कॉलोनी में नहीं थे, घर में थे, एक ही परिवार में फ़िल्मों के बोर में सबकी पसंद अलग-अलग थी। सारे फैन्स क्लबों के अपने-अपने दावे थे, इन्हीं में था परमेश्वरी दीदी का एक दल, जिनकी पसंद बड़ी अलबेली थी। उनके पास अनेक गायक, हीरो, हीरोइन, गाने के क़िस्से होते पर सारे क़िस्से 1940 के पहले के होते, परमेश्वरी दीदी सरकारी अस्पताल में नर्स थीं। बहुत-से लोग इंजेक्शन लगवाने, दवा लेने आते रहते, आज भी कुछ नयी उम्र के लड़के उनको घेरकर बैठे हैं और वह गा रही, “आज हिमाला की चोटी से फिर ने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है”… उनका जोश देखते ही बनता है। लग रहा है बंदूक़ पकड़ा दें तो अभी युद्ध मैदान में चली जाएंगी, कुछ लड़के, लड़कियां मुंह दबाकर हंस रहे हैं। कुछ उनके गाने की प्रशंसा कर रहे हैं। उसी बीच रश्मि पूछ बैठी- ये कौन-सी फ़िल्म का गाना है? परमेश्वरी दीदी ने तपाक से कहा, “यह हमारे ज़माने का गाना है। फ़िल्म थी ‘क़िस्मत’, अशोक कुमार और मुमताज़ शांति की…”
मुमताज शांति! ये कौन थी? मुमताज की बहन थी क्या? सोनाली ने हंसते हुए पूछा।
परमेश्वरी दीदी ने थोड़े सख़्त लहजे में कहा, “अरे! ये तो बाद की हीरोइन है, मुमताज़ शांति हमारे ज़माने की ऐसी हीरोइन थी, जिसकी फ़िल्में थिएटरों में दो-तीन साल तक लगी रहती थीं। ये नहीं कि आज फ़िल्म आयी कल उतर गयी। मुमताज़ शांति पहली जुबली हीरोइन थी, वैसे उसने पंजाबी फ़िल्मों से अपनी शुरूआत की। बाद में वह हिन्दी सिनेमा में आयी और हिन्दी का एक मक़बूल सितारा बन गयी। कई फ़िल्मों में काम किया, उसकी मैंने कुल तीन फ़िल्में देखीं। उसने ‘किस्मत’, ‘बसंत’, उल्हास के साथ और ‘घर की इज़्ज़त’ में दिलीप कुमार के साथ काम किया। बसंत वही फ़िल्म है, जिससे मधुबाला ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत की।

‘किस्मत’ मुमताज़ शांति की कमाल की फ़िल्म है। कभी तुम लोग देखना यह फ़िल्म। कलकत्ता के सिनेमाघर में तीन साल तक लगी रही थी, इसका रिकॉर्ड बहुत बाद में फ़िल्म “शोले” ने तोड़ा।” जो गाना आप गा रही थीं वो किस फ़िल्म का था, अनुपमा ने पूछा, तो हल्के से मुस्कुराते हुए बोलीं, “इसी फ़िल्म का था”, “कहानी आप को याद है?” अबकी बार मैंने पूछा? वह बोलीं, “हां क्यों नहीं, इस फ़िल्म की कहानी ने प्रभावित किया था। सीधी होते हुए भी कहानी कई दिलचस्प मोड़ लेती है, जो सभी को अच्छे लगे। फ़िल्म का हीरो शेखर (अशोक कुमार) जेल से छूट रहा है। शहर का नामी चोर है, उसके सामान के साथ जेलर उसे उसका लॉकेट भी देता है। कहानी आगे बढ़ती है। शेखर एक बूढ़े की सोने की घड़ी चुरा लेता है तथा बाद में उसकी मदद करता है। वह बूढ़ा किसी थिएटर का मालिक है जो शराब की आदत के कारण जान गंवा देता है। उसकी दो बेटियां हैं, जो कठिन जीवन जी रही हैं। बड़ी बेटी रानी (मुमताज़ शांति) का एक पैर ख़राब है सो वह नाच नहीं सकती। शेखर की उससे मुलाक़ात होती है और वह उसके पैर के इलाज के लिए चोरी करता है। रानी ठीक हो जाती है। फ़िल्म में सुखांत बहुत अच्छा लगा। फ़िल्म के अंत में शेखर की पहचान लॉकेट और उसके हाथ में मदन लिखे होने से पता लग जाता है कि वही थिएटर मालिक का खोया हुआ लड़का है।
यूं तो मुमताज़ शांति के अभिनय का कोई जोड़ नहीं था, पर विभाजन के बाद वह पाकिस्तान चली गयी और उसने बाद के वर्षों में फ़िल्मों में काम करना भी छोड़ दिया था, लेकिन मुमताज़ शांति नाम की यह जुबली गर्ल फ़िल्म के इतिहास में सदा अपने जीवंत अभिनय के लिए जानी पहचानी जाती रहेगी..”

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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