
- December 22, 2025
- आब-ओ-हवा
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(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'.. इस बार एक रूसी उपन्यास जो मनुष्य के मूलभूत प्रश्नों पर विमर्श करती है- संपादक)
शशि खरे की कलम से....
विज्ञान बनाम नैतिकता की बहस 'जलथलिया'
अलेक्सांद्र बेल्यायेव को रूस का जूल्स वर्न कहा गया है। फ्रेंच लेखक जूल्स वर्न ने चन्द्रमा पर मानव यात्रा और पनडुब्बी की कल्पना की थी एवं अलेक्सांद्र बेल्यायेव ने अंग प्रत्यारोपण जैसी जटिल चिकित्सा पद्धति की कल्पना की थी, जो कि दशकों बाद वास्तविक जीवन में संभव हुई।
अलेक्सांद्र बेल्यायेव के उपन्यास ‘जलथलिया’ का मूल नाम रशियन में ‘चेलोवेक अम्फ़िबिया’ (Chelovek Amfibiya) है, जिसका हिंदी में अनुवाद भीष्म साहनी ने किया था और सोवियत संघ के रादुगा प्रकाशन ने प्रकाशित किया।
जलथलिया प्रथमदृष्ट्या एक विज्ञान कथा है, किन्तु इसके खलनायक पेट्रिक जुरीता, असहाय निरुपाय-से बाक़ी पात्र और मुख्य पात्र इकथियांदर की दुनियादारी से अनभिज्ञ बच्चे जैसी मासूमियत; पूरे उपन्यास में इतने गहरे रंगों में है कि यह मनुष्य की स्वार्थलिप्सा, क्रूरता और हृदयहीनता का चरम भी रेखांकित करता है।
कथा में साल्वातोर एक अत्यंत तीव्र बुद्धि का वैज्ञानिक डॉक्टर है, जो अपनी बुद्धि अनुसार सभी प्राणियों के शरीर में शल्य क्रिया द्वारा कुछ जोड़ता है, बदलाव करते हुए प्रयोग करता है। उसने अनेक प्रयोग किये हैं जिन्हें अपने महल जैसे अजायबघर में सबकी नज़रों से छुपा रखा है। छुपाने का एक मुख्य कारण इसमें धर्म की रोक टोक का डर है।

बाल्तासोर की पत्नी बच्चे को जन्म देते हुए रास्ते में मर गयी थी। बच्चे को उसका चाचा क्रिस्टो साल्वातोर के पास ले जाता है। साल्वातोर ने बताया कि बच्चा मर गया जबकि उसने शल्यक्रिया से उस बच्चे के गले में मछली के गलफड़े लगा दिये थे। यही जलथलिया बना, जो जल में मछली की तरह रह सकता था।
दुनिया से छुपाकर पाला गया बालक दुनिया की बातें नहीं जानता था किंतु युवा जलथलिया प्रकृति के नियमों से अछूता नहीं रहा। एक दिन किनारे पर विश्राम करते हुए गोत्ताएरे नाम की ख़ूबसूरत युवती पर उसकी नज़र जाती है। अब सागर के जीवन के अकेलेपन से उसे ऊब होती है। उसे इंसान का साथ चाहिए लेकिन पैसा, दौलत, व्यापार क्या होता है, वह नहीं जानता। वह एक मछली की भाँति ही अनभिज्ञ है।
क्रिस्टो रेड इंडियन जासूसी की नीयत से साल्वातोर का विश्वास जीतकर उसके यहां नौकरी कर लेता है। तब उसे पता चलता है कि रबर के हरे दस्ताने, बड़े पंजे पहने हुए और मोटा चश्मा लगाये, मछली जैसा जैकेट पहने वह डॉल्फ़िन की सवारी करने वाला जलदैत्य नहीं है, एक ख़ूबसूरत भोला युवक है।
क्रिस्टो उसे चोरी से इंसानी बस्ती में ले जाता है। जलथलिया पहली बार धुएं, गंदी हवा, गंदगी, कचरे, भीड़ और शोर का अनुभव करता है।
अंत में शिकायत, छापे के दौरान सब गिरफ़्तार होते हैं। जलथलिया के लिए जेल में एक तकलीफ़देह हौज की व्यवस्था की जाती है। साल्वातोर बयान देता है- “इंसान यदि पानी के नीचे रह पाये तो महासागर की गहराइयों पर भी अपना अधिकार क़ायम कर लेगा। सागर का प्रसार 36 करोड़ 10 लाख 50 हज़ार वर्ग किलोमीटर है। इंसान महासागर में रह सकता है। साथ ही ख़ुराक और कच्चे माल की अक्षय निधि मिल जाएगी।
महासागर के ऊर्जा स्रोतों को लीजिए। महासागर का जल 79 अरब अश्व शक्ति के बराबर सौर ऊर्जा को ग्रहण कर लेता है। इससे अगर अन्य रूपों में गर्माहट न बंटे तो सागर उबल रहे होते। इंसान ऊर्जा का यह अक्षय भंडार किसी काम में नहीं लाता।”
जलथलिया के रूप में हम इंसान का आदिम रूप महसूस कर सकते हैं जब यह सामाजिक व्यवस्था नहीं थी, धर्म के पचड़े नहीं थे, बाज़ार नहीं था, सबसे बड़ा घातक विष पैसा नहीं था। जलथलिया इकथियांदर ने सागर के तल में अपनी गुफा में दुनिया की दृष्टि में बेशक़ीमती मोतियों का ढेर लगा रखा था।
जैसे जल जीवों को उनकी क़ीमत से कुछ लेना देना नहीं, वैसे ही हम क्यों नहीं? इंसान भी अपनी ज़रूरत से अधिक क्यों जोड़ता है? हम इन अन्य प्राणियों की तरह निस्पृह क्यों नहीं है प्रकृति के ख़ज़ाने से मोतियों से, क़ीमती धातुओं से।
साल्वातोर के अजायबघर में लगभग सभी प्राणियों का जोड़ा है, जिसमें उसने शल्यक्रिया के द्वारा कुछ कारस्तानी की है। किसी को तीसरी आंँख लगायी, तो छिपकली के दो पैर और लगा दिये वग़ैरह। जिनको भी अति तीक्ष्ण बुद्धि मिली है, ऐसे वैज्ञानिकों ने अधिक लालच के वशीभूत ही सभी आविष्कार किये हैं। क्या आवश्यकता थी पिस्टल, बंदूक़, बारूद, बम एटम बम की और कितनी ज़रूरत है एआई की? जबकि स्टीफन हॉकिंग ने भविष्य में धरती पर जीवन समाप्त होने के जो पाँच कारण गिनाये हैं, उनमें से यह भी एक होगा।
धर्म का जन्म हुआ था स्वार्थ, लालच, हिंसा, क्रूरता जैसे दुर्गुणों से बचाने के लिए, अच्छाइयों को धारण करने के लिए, बस यहीं रुक जाते! क्या आवश्यकता थी उनके नियमों को कट्टरता की सीप में रखने की। क्यों आराम, सुविधा के नाम पर बनायी गयी व्यवस्थाएँ बेड़ियाँ बन गयीं?
यह जलथलिया उस मानव का प्रतीक है, जो विकास के कुछ काल बाद का था- स्वार्थ और तृष्णा से दूर। जितने आवश्यक हों उतने संसाधनों में मान जाने वाला। जैसे-जैसे विकास हुआ सुविधाएं बढ़ीं, उसी अनुपात में इंसान ने अपनी ज़रूरतें बढ़ायीं और बढ़ाता गया।

सन् 1927-28 में प्रकाशित इस उपन्यास का अंत उदासी और हताशा के रूप में करते हुए लेखक ने विवेकहीन विकास का नतीजा सामने रख दिया है।
दुष्ट जुरीता गोत्ताएरे के पिता को मजबूर कर विवाह तो कर लेता है लेकिन वह बाद में अपने प्रेमी के साथ निकलकर मज़दूरी करते हुए सामान्य जीवन जीना चुनती है और इकथियांदर जो ज़मीन पर नहीं रह सकता वह मानव की बस्ती से बहुत दूर शांत मूँगा द्वीप सागर में रहने को विवश हुआ। उसका असली पिता बाल्तासोर लहरों की पछाड़ों में अपना रुदन मिलाता रह जाता है।
लेखक का सागर विज्ञान का गहरा अनुभव और ज्ञान अचंभित करता है। यह रोमांच और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर है।
यह उपन्यास विज्ञान के नैतिक पहलुओं पर प्रश्न उठाता है। जुरीता पूंजीवादी शोषक और जलथलिया असहाय शोषितों का एक स्पष्ट रूपक है। अलेक्सांद्र बेल्यायेव थोड़े में सही, ग़रीबी की स्थितियों के पीड़ामय विवश रूप को प्रकट करने में सफल रहे हैं।
उपन्यासकार ने विज्ञान और नैतिकता को आमने-सामने खड़े करते हुए स्पष्ट शब्दों में मानव को सावधान किया है कि विज्ञान का दुरुपयोग न हो। वैज्ञानिक साल्वातोर कहता है- “हमारी सामाजिक पद्धति को देखते हुए मुझे इस बात का डर था कि शायद मेरी खोजों से फ़ायदे के बजाय नुक़सान ज़्यादा हो जुरीता (व्यापारी) से इकथियांदर को नौसेना के उच्चाधिकारी छीन लेते और जंगी जहाज़ों को डुबोने के लिए प्रशिक्षित करते, एक ऐसे देश में जहाँ धन-लोलुपता और संघर्ष बड़ी-बड़ी खोजों को एक बुराई में बदल देते हैं और केवल मानव यंत्रणा को बढ़ाते हैं, मैं इकथियांदर को सार्वजनिक संपत्ति नहीं बना सकता।”
कौन-सी दिशा और दशा में मानव विकास की संपूर्णता को पाएगा- इस किताब के माध्यम से इस प्रश्न के उत्तर की खोज आरंभ की जा सकती है। दिल को छूने वाली और दिमाग़ को विज्ञान की सीमा रेखा पर चिंतन करने को विवश करने वाली जलथलिया जो भी पढ़ेगा, वह इस किताब के लिए आभार का भाव महसूस करेगा, ऐसा विश्वास होता है।
(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव – संपादक)

शशि खरे
ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।
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