
इंद्रधनुष-6 : यतींद्रनाथ राही
यतींद्रनाथ राही (जन्म: 31.12.1926) उम्र की एक सदी पर पहुंचते हुए साहित्य की विभिन्न धाराओं और विविधवर्णी गतियों के साक्षी रहे हैं। ग़ज़ल, दोहा, खंड काव्य, बाल काव्य, मुक्त छंद जैसी अनेक विधाओं में रमने के बाद पिछले कुछ वर्षों से गीत/नवगीत को समर्पित हैं। शताब्दी वर्ष में प्रवेश करते हुए वह तन, मन एवं कलम से पूर्णत: ऊर्जस्वित हैं। कीर्तिशेष कवि/संपादक कमलकांत सक्सेना के संपादन में ‘साहित्य सागर’ ने राही जी पर केंद्रित एक विशेषांक लगभग डेढ़-दो दशक पहले प्रकाशित किया था। निराला पर आधारित खंड काव्य ‘महाप्राण’ को अपनी श्रेष्ठतम कृति मानने वाले राही जी नवगीत के चर्चित कवियों में शुमार हैं। आब-ओ-हवा की यह प्रस्तुति, राही जी रचित वे गीति रचनाएं, जो सद्य: प्रकाशित संग्रह ‘पांव थके सांकल खटकी है’ में संकलित हैं, जिसका लोकार्पण 31 दिसंबर 2025 को भोपाल में तय है।

यतींद्रनाथ राही के नवगीत
1
अंधी भीड़, भ्रमित पथदृष्टा
कहां जा रहे हैं ये लेकर?
काकाजी ने कल हौवे की
दे डाली हमको क्या धमकी
धार तेज़ हो गयी और ही
तबसे इनके भी दमखम की
उड़े उड़े फिरते मंचों पर
सौ सौ बल खाते हैं तेवर
धरे जेब में एटम फिरते
अगर फटो तो फिर क्या होगा
खेल नहीं यह राजनीति है
वही जान पाया जो भोगा
क्या जाने कल का ही सूरज
आये नया सवेरा लेकर
विजय सत्य की ही होती है
भटका दें कितना ही चालें
सूरज नहीं छुपा करता है
कितनी ही हम धूल उछालें
मन के भरम मिटा लो जी भर
सोचो! जाओगे क्या देकर
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2
यादों में घुल-घुलकर आये
बीते सांझ सकारे
मुडगेरी के काग संदेशे
चुग्गा भरे चिरैया
घुटरुन चलत रेनु तन मंडित
आंगन छुटकू भैया
हर मौसम बाहों में भरने
आया हाथ पसारे
मंदिर मंदिर पूजा अर्चन
घर घर राम रसायन
जो भी हवा द्वार पर आयी
मिले खुले वातायन
सावन झूला रूप दीवाली
होली के हुरियारे
संबंधों के रेशम धागे
माटी की ममता के बंधन
माथे का सिंदूरी टीका
रण में बंधा हाथ का कंगन
मर्यादाओं के गौरव थे
आशीषों के मंगल धारे
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3
धूप दहकी भी नहीं थी
और दिन ढलने लगे
बहुत कहने को धरा है
बहुत गाने को मगर
कुछ कुटिल तेवर हवा के
कुछ अबोले पीर स्वर
शब्द भी तो अब छड़ी को
टेककर चलने लगे
बात अपनी ही कहो या
फिर जगत के दर्द की
भूख की हो प्यास की हो
या कि फिर अपवर्ग की
आस्थाओं पर टिके
विश्वास भी छलने लगे
भीड़ में टोपी उछालो
या किसी के सिर मुकुट
देखते चुपचाप यों ही
रह सको तो रहो घुट
लोग तो बाज़ार का रुख़
देखकर ढलने लगे
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4
खोटे महाज्ञान के पन्ने
पढ़े जा रहे उपदेशों में
ठोक रही माथा प्रतिमाएं
विश्वासों के अवशेषों में
छलनाओं के घटाटोप में
भटके हैं पग उजियारों के
उमड़ी भीड़ पताकाओं में
रथारूढ़ जो विज्ञानी हैं
स्वयंसिद्ध हैं ब्रह्मलीन हैं
शब्द शब्द अवढरदानी हैं
होंगे कल इनके भी मंदिर
नाम मिटेंगे अंधियारों के
कहां चली है राष्ट्र चेतना
कहां भक्ति की पावन गंगा
पंथ नहीं कोई कहता है
होता रहे आदमी नंगा
क्या ऐसे ही दिन लौटेंगे
सर्वहितैषी सुविचारों के?
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5
बैठे राम झरोखा, सोचें
कब होगा उद्धार सिया का!
सिंहासन पर चरणपादुका
काग़ज़ पर सत्यापन अपने
धरमराज जी बांट रहे हैं
रामराज के पावन सपने
कहीं भटकनें कंचन मृग की
कहीं फहरती सुयश पताका
मुक्त, बानरों की मस्ती है
हनूमान के हैं जयकारे
रोज़ एक रावण मरता है
सौ सौ भरते हैं फुंकारे
युद्ध सतत है चलना ही है
रहे ज्वलित यह ज्योति शलाका
अविश्वास गृह युद्ध किन्तु
यह आपाधापी औ अपवंचन
विश्वप्रमुख बनने के पथ पर
शर्मसार होने के लक्षण
राम राज तो ले आओगे
क्या होगा उद्धार सिया का?
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6
होंगे कैसे पार कुहासे?
तन तो शतक पकड़कर बैठा
मन पगला उलझा बचपन में
बीन रहा है शंख सीपियां
तट पर बिखरे सिकता कण में
मां की गोद पिता के कन्धे
दादी मां के दूध बताशे
बंधे हाथ धागों के बंधन
परस प्यार माथे के चंदन
रिश्तों के रस भरे कटोरे
उछल उछल मधुकलश बटोरे
घाट घाट अब है गंगाजल
पर हम तो प्यासे के प्यासे
परस किये पाहन तरते थे
हम जगते तो युग जगते थे
मर्यादाएं रामचरित की
कर्मक्षेत्र गीता पढ़ते थे
बैठे आज टटोल रहे हैं
पड़ी झुर्रियां उखड़े गांसे
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7
गुंजित करो गीत के नवस्वर
युग के नूतन विहान में
एक गीत ही तो जीवन है
गा लेने के हित आये हैं
सृजन लोक मधुमय करने को
जीवन के क्षण पाये हैं
रहें न पिटते बने मजीरे
हम घुंघरू से घुलें प्राण में
आपाधापी तू तू मैं मैं
थामो, इन बिगड़ैल स्वरों को
कुछ तो नब्ज़ समय की समझो
कुछ तो वाणी में रस घोलो
हुए धन्य बन चरणपादुका!
उठो, विराजो शिरस्त्राण में
सांसों के सरगम अमोल हैं
वंशीस्वर हैं मुरलीधर के
वाणी के माथे के चंदन
सत्य शिवम धाता सुंदर के
रहें न सोये अंधकार में
जाग्रत हों वे स्वाभिमान में
