
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
ग़ज़ल गायकी में ख़ैयाम साहब का ख़ास दस्तख़त
गाने के शब्दों के बीच में एक विशिष्ट ठहराव देने की ख़ैयाम साहब की ख़ासियत उन्हें बॉलीवुड के आला मूसिक़ारों में एक अलग दर्जा अता करती है। मोहम्मद ज़हूर ख़ैयाम हाशमी ने हिंदी फ़िल्मों में शंकर-जयकिशन या लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की तरह ज़्यादा काम नहीं किया। लेकिन जितनी भी फ़िल्में उन्होंने कीं, उनका संगीत आज भी याद किया और सराहा जाता है। बल्कि बहुत सारी औसत दर्जे की फ़िल्में तो अपने सुमधुर संगीत और गायकी में प्रयोग के कारण चर्चा में रही हैं।
बतौर संगीतकार ख़ैयाम साहब को प्रसिद्धि जिस फ़िल्म से मिली, वो रही 1953 साल की दिलीप कुमार की फ़िल्म फ़ुटपाथ। इसमें तलत महमूद की गायी ग़ज़ल “शाम-ए-ग़म की क़सम, आज ग़मगीं हैं हम” सुनकर आज भी संगीतप्रेमी ख़ैयाम साहब को सजदा करते हैं। शायरी की उनकी समझ और सादगी भरी धुन एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहां भौतिकवादी सोच से परे जज़्बात और रूमानियत की बात कही और समझी जाती है- तिस पर तलत की थरथराहट भरी कातरता उफ़- “चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं, मार डाले न गर ये जुदाई कहीं”। मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों में व्यक्त तन्हाई ख़ैयाम साहब की तर्ज़ में जैसे पूरे मंज़र पर बिखर जाती है और सुनने वाले को भी अपनी गिरफ़्त में ले लेती है। राग पहाड़ी पर आधारित यह ग़ज़ल टंच सोना है।
फ़िल्म “थोड़ी-सी बेवफ़ाई” के शीर्षक गीत को सुनें तो हर पंक्ति के बाद बजने वाला संगीत का टुकड़ा कैसे कथानक का मूड सैट कर देता है, इसका अहसास हमें होता है। इस गाने की धीमी रफ़्तार धुन सुनकर पहले तो किशोर कुमार स्वयं आश्चर्य में पड़ गये थे कि लोरी जैसे इस गाने को क्या ही लोग सुनेंगे। मगर वक़्त ने किशोर कुमार के इस संदेह को झूठा साबित कर ही दिया। फ़िल्म “शगुन” में उनकी अर्धांगिनी जगजीत कौर की आवाज़ में “तुम अपना रंजो-ग़म” भला कोई कैसे भूल सकता है। अल्प चर्चित अभिनेत्री निवेदिता पर फ़िल्माया यह गीत पाश्चात्य संगीत शैली को ख़ालिस हिंदुस्तानी संगीत में ढालने की कला की भी बानगी देता है जिसमें मुख्यतः पियानो के साथ तबले का इस्तेमाल हुआ है।

ऐसे ही याद करें तो एकदम से लताजी का “ऐ दिले-नादान” याद आता है।सितार, संतूर, वायलिन आदि की धुन… फिर लता का स्वर… फिर “आरज़ू क्या है..” में एक लंबा साज़ का पीस… मगर गायन को दुलारता हुआ, पूर्णत्व देता हुआ और आसपास के रूमानी वातावरण यानी एंबियेंस को स्थापित करता हुआ। लेकिन रज़िया सुल्तान के ही गानों में ख़ैय्याम साहब ने ऐसे प्रथम प्रयोग किये हों, ऐसा नहीं है। याद करें इंद्राणी मुखर्जी पर फ़िल्माया आख़री ख़त का गाना “बहारो-मेरा जीवन भी संवारो-बहारो….” वस्तुतः कैफ़ी साहब का शेर यूं था- “बहारो, मेरा जीवन भी संवारो/कोई आये कहीं से यूं पुकारो…” पर इस पंक्ति में बहारो शब्द को स्थाई भाव की तरह पकड़ना और उसको पुकारने का लड़ियाव बरतना तो ख़ैय्याम साहब के ही बस की बात थी।
साहिरजी की “कभी-कभी” तो नज़्म ही थी। अतः नज़्म के मूड की तरह एक ख़याल मुसलसल चलते रहने की ज़रूरत थी। इसमें भी जिस तरह से सांगीतिक अंतराल ख़ैयाम साहब निकालते हैं, उसका कोई सानी नहीं। मुकेश और लता जब बारी”बारी से “सुहागरात है, घूंघट उठा रहा हूं मैं” गाते हैं, तो दोनों के गायन के बीच में शहनाई की मीठी आर्त तान क्या कुछ नहीं कह जाती। ऐसे ही बाज़ार के गानों- “दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया..” में और “फिर छिड़ी रात बात फूलों की” में भी शायरी का कमाल था इसलिए इनमें भी संगीत के साज़ों की मुखरता इंटरल्यूड में अलग से जान पड़ती है।
और पहले की बात करूं तो साहिर के “वो सुबह कभी तो आएगी” के बीच की आशा भोसले की तड़प भरी हमिंग गवाह है कि गायक के स्वरों के साथ वे साज़ के स्वरों की भाषा को भी ऊपर का स्थान और मान देने में लगे थे। तो शुरू में हमिंग के साथ कोशिश की और बाद में उसी हमिंग को साज़ों के इंटरल्यूड पीसेज़ में तब्दील कर दिया। गोकि हमिंग का असर केवल एक ख़ास अवसर पर ही रहता। अचरज ये होता है कि उत्तम शायरी के साथ इस तरह का नवल प्रयोग करने वाले ख़ैय्याम फ़िल्म “उमराव जान” की कालजयी ग़ज़लों में ऐसा भूल कर भी नहीं करते। शायद इसलिए कि उनके द्वारा प्रदत्त सांगीतिक ठहराव का ‘मुजरा नृत्य’ की लयात्मकता से तादात्म्य नहीं बनता। मगर जनाब, कहते हैं न कि कलाकार अपने हस्ताक्षर अपनी कृति पर किसी न किसी रूप में करता ही है। तो उमराव जान अदा यानी रेखा जब अपने ही प्रेमी की शादी के अवसर पर सुनाती है… “जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने”.. तो अदा तख़ल्लुस लगाने वाली शायरा के दर्द को बयां करने के लिए साज़ जैसे उठ खड़े होते हैं। लाइन बनती है- “ऐ अदाsss” और इसके बाद दिल को चीरने वाला सांगीतिक अंतराल…. जिसके बाद आशाजी गाती हैं- “ऐ अदा और सुनाएं भी तो क्या हाल अपना…” यूं उसके हाल को सारंगी के तार बयां कर देते हैं… शब्दों से भी पहले।
बरसों पहले, दशकों पहले महान अदाकारा मीनाकुमारी, जो एक आला शायरा भी थीं, ने ये इच्छा ज़ाहिर की थीं कि वे अपनी ग़ज़लें ख़ुद कुछ गुनगुनाना चाहती हैं तो ख़ैय्याम ने ख़ुद उनकी ग़ज़लों को स्वरबद्ध किया। फिर अपनी पत्नी जगजीत कौर के साथ मीनाजी को इसरार कर रिकार्डिंग स्टूडियो में लेकर आये… और इस तरह जलती”-बुझती-सी रोशनी के तले, सिमटा सिमटा सा इक मकां तनहा… राह पूछा करेगा सदियों तक, छोड़ जाएंगे ये जहां तनहा” यानी “चांद तन्हा है, आसमां तन्हा” जैसी दिल को छू लेने वाली मीनाकुमारी की शायरी उनकी उतनी ही पुरकश आवाज़ में संगीत-प्रेमियों तक पहुंच सकी।
ख़ैयाम साहब ने एक ग़ज़ल- “कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं”, मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म “अंजुमन” के लिए रिकॉर्ड की थी। अफ़सोस कि यह फ़िल्म कभी भी प्रदर्शित नहीं हो सकी। मगर संगीत प्रेमी जगजीत कौर और ख़ुद ख़ैयाम की आवाज़ में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इस ग़ज़ल का लुत्फ़ यूट्यूब पर उठा सकते हैं।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
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बढ़िया
बहुत उम्दा लिखा है।