
- January 13, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव नवंबर से अमेरिका प्रवास पर हैं और अन्य देशों की यात्राओं पर भी जाने वाले हैं। इस दौरान वह रोज़ाना शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-6...
आदिवासी: अलग दुनिया, समान संघर्ष
दुनिया के दो अलग-अलग कोनों में बसे भारतीय जनजातियाँ और अमेरिकी मूल निवासी (नेटिव अमेरिकन) अपनी विशिष्ट पहचान, संस्कृति और इतिहास के लिए जाने जाते हैं। पहली नज़र में ये दोनों समुदाय एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न दिखायी देते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो इनके अनुभवों में हैरान करने वाली समानताएँ मिलती हैं। इन दोनों समुदायों के बीच के साम्य और अंतर को समझना रोचक है।
उपनिवेशवाद का साया
भारतीय जनजातियों और अमेरिकी मूल निवासियों के इतिहास पर यूरोपीय उपनिवेशवाद की छाप गहरी है। अमेरिका में, कोलंबस की यात्रा की “भूल” के कारण मूल निवासियों को “रेड इंडियन” कहा गया और यूरोपीय बस्तियों के विस्तार के साथ ही उनकी जनसंख्या एवं संस्कृतियों का बड़ा भाग नष्ट हो गया। भारत में भी ब्रिटिश शासन ने आदिवासी समुदायों की ज़मीनों, संसाधनों और स्वायत्तता पर सबसे पहले कब्ज़ा किया।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही मामलों में औपनिवेशिक ताकतों ने “फूट डालो और शासन करो” की नीति अपनायी। अमेरिका में इरोक्वॉइस संघ जैसी संस्थाओं को औपनिवेशिक शासन के “अनुपालनकर्ता” के रूप में इस्तेमाल किया गया, जबकि भारत में विभिन्न जनजातीय समूहों के बीच फूट पैदा की गयी। इस प्रकार, दोनों समुदायों ने भूमि हड़पने, जबरन विस्थापन और सांस्कृतिक विनाश का दर्द झेला है।
सांस्कृतिक समानताएँ: प्रकृति और समुदाय का बंधन
सांस्कृतिक स्तर पर दोनों समुदायों में कई समान सूत्र देखे जा सकते हैं। प्रकृति से गहरा जुड़ाव जनजातीय विशेषता है। दोनों ही समुदाय प्रकृति को पूजनीय मानते हैं। भारतीय जनजातियों में पेड़, नदी और पहाड़ों की पूजा बहुत सामान्य है, जबकि अमेरिकी मूल निवासी प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहने पर ज़ोर देते हैं।
सामुदायिक जीवन: व्यक्ति से अधिक समुदाय को महत्व देना दोनों ओर समान विशेषता है। ऐसा शायद इसीलिए भी था क्योंकि सुदूर क्षेत्रों में समुदाय ही प्राथमिक सहारा हो सकता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया दोनों समुदायों में सामूहिक होती रही है।
वाचिक परंपरा: इतिहास, ज्ञान और नैतिक शिक्षाएँ कहानियों, गीतों और नृत्यों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचायी जाती हैं।
कला और शिल्प: दोनों समुदायों ने अद्वितीय कला रूप विकसित किये हैं, चाहे वह भारत की वर्ली पेंटिंग हो या अमेरिकी मूल निवासियों की बुनाई और उनके मिट्टी के बर्तन।
मुख्य अंतर: संदर्भ और वर्तमान
समानताओं के बावजूद, भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों के कारण दोनों के अनुभवों, विकास क्रम और वर्तमान स्थिति में बड़े अंतर भी हैं।
- जनसांख्यिकीय आकार: भारत में जनजातीय समुदाय देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% हैं, जो संख्या में करोड़ों में है। अमेरिका में मूल निवासियों की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 2% मात्र है और उनकी ऐतिहासिक जनसंख्या में भारी कमी हुई है।
- संवैधानिक मान्यता: भारत के संविधान ने जनजातियों को “अनुसूचित जनजाति” का दर्जा देकर शैक्षिक और राजनीतिक आरक्षण जैसे विशेष अधिकार प्रदान किये हैं। अमेरिका में मूल निवासी जनजातियों को “संप्रभु राष्ट्र” के रूप में मान्यता प्राप्त है और उनके साथ संधियों के आधार पर संबंध हैं।
- भूमि अधिकार और स्वायत्तता: अमेरिका में कई जनजातियों के पास “आरक्षण” (Reservations) के रूप में स्वशासित भूभाग हैं। भारत में “अनुसूचित क्षेत्र” हैं, लेकिन जनजातीय भूमि पर बाहरी लोगों का दबाव और विस्थापन एक बड़ी समस्या बना हुआ है।
- सांस्कृतिक एकीकरण बनाम अलगाव: भारत की विशाल और विविध आबादी में जनजातीय समुदायों की वैविध्यता में उनका एकीकरण और साथ ही उनकी प्रत्येक की विशिष्ट पहचान बनाये रखने का संघर्ष जारी है। अमेरिका में मूल निवासी अल्पसंख्यक हैं और उनकी पहचान और संस्कृति मुख्यधारा से भिन्न है।
वर्तमान चुनौतियाँ और आशा की किरण
आज दोनों समुदाय समान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं:
- सांस्कृतिक क्षरण: वैश्वीकरण और मुख्यधारा की संस्कृति के दबाव में उनकी मूल भाषाएँ और परंपराएँ ख़तरे में हैं।
- आर्थिक पिछड़ापन: ग़रीबी, शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ापन एक सामान्य समस्या है।
- पर्यावरणीय न्याय: जनजातियों की पारंपरिक भूमियों पर खनन और वनों की कटाई जैसे विकास के कथित प्रोजेक्ट्स से ख़तरा मंडरा रहा है।
इन चुनौतियों के बीच आशा की किरणें भी हैं। दोनों समुदाय अपनी भाषा, कला और परंपराओं को पुनर्जीवित करने के लिए सक्रिय हैं। भारत में आदिवासी लेखक अपनी मातृभाषा में साहित्य रच रहे हैं, तो अमेरिका में जनजातीय स्कूलों में मूल भाषाओं को पढ़ाया जा रहा है। सरकारें जनजातीय महत्व को समझ रही हैं। एन.जी.ओ. स्वतंत्र रूप से व्यापक कार्य कर रहे हैं। भूमि अधिकारों के लिए कानूनी और सामाजिक संघर्ष तेज़ हुआ है।
भारतीय जनजातियाँ और अमेरिकी मूल निवासी, दोनों ही अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आधुनिक दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। उपनिवेशवाद के साझा दर्द और प्रकृति के प्रति गहरे लगाव ने उनके अनुभवों में समानता के धागे दिये हैं। हालाँकि, उनके राजनीतिक संदर्भ, जनसांख्यिकीय आकार और वर्तमान चुनौतियाँ अलग-अलग हैं। इन अंतरों को समझना और समानताओं से सीखना महत्वपूर्ण है। अंततः दोनों समुदायों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि सांस्कृतिक विविधता मानवता की सबसे बड़ी धरोहर है, और उसे संरक्षित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। उनका संघर्ष केवल अपने अस्तित्व की लड़ाई नहीं, बल्कि एक अधिक समावेशी और बहुसांस्कृतिक विश्व के निर्माण का आह्वान है।
इस दिशा में रिसर्च तथा ज़मीनी कार्यों की अपार संभावना है। जिस पर सरकारें तथा यू.एन.ओ., विश्वविद्यालय संयुक्त रूप से व्यापक कार्य कर सकते हैं।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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सुंदर एवं आज के क्रूर समय अत्यंत उपयोगी विचार।
” अध्ययन के लिए एक अपेक्षित विषय है -नेटिव अमेरिकन भारतीय मूल की जनजातियों का तुलनात्मक अध्ययन,यह महत्वपूर्ण है। रेड इंडियन्स नाम के कारण जिज्ञासा होती ही है।
लेख में प्रमुख बिन्दुओं पर विचार करना प्रभावी है।”