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मासिक ब्लॉग दीक्षा मनीष की कलम से....

नदियों के मायके की तस्वीर देखी आपने?

            भारत की प्रमुख नदियों की कोख हिमालय को माना जाता है लेकिन आप जानते हैं कि भारत के हृदय प्रदेश को नदियों का पीहर या मायका क्यों कहा जाता है? यहां से दर्जनों बड़ी-छोटी नदियां फूटती हैं और पूरा प्रदेश इनके कल-कल नाद से ही जैसे जल और जंगल का एक मेला-सा दिखता है। कभी टीवी चैनलों पर इन नदियों पर वृत्तचित्र बने, कभी संगीतकारों ने इन्हें गाया और बजाया तो कभी कवियों ने इनकी सुंदरता और पीड़ा (लेख में सभी काव्यांश कीर्तिशेष कवि रामप्रकाश अनुरागी के गीतों से) को ध्वनित किया।

नर्म रेत गंगाजी को छोड़ी तुमने पाहन वरण किये
हर पाहन लगता है जैसे शिवजी का अवतरण लिये
ऐसी शिल्पी धार तुम्हारी सारी सृष्टि उकेर रही
जो भी तट पर आया उसके पाप-शाप सब हरण किये
तुम अनुरागी या कि विरागी राग सुनाती हो
नर्मदे बोलो तो…
कहां-कहां कितनी गंगाएं रोज़ बहाती हो?
नर्मदे बोलो तो…

जल संपदा से भरपूर, एक ओर विंध्य पर्वत की उत्तरी पहाड़ियों पर बहने वाली चंबल, बेतवा, केन, धसान, कालीसिंध और पार्वती की झांकी है तो दूसरी ओर सतपुड़ा पर्वत की श्रेणियों से निकलकर विंध्य की दक्षिणी पहाड़ियों पर बहने वाली नर्मदा व सोन मध्य प्रदेश की प्यास बुझाती हैं। मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा प्रदेश की सबसे बड़ी व भारत की पांचवीं सबसे बड़ी नदी है। यह सतपुड़ा पर्वत शृंखला की मेकल श्रेणी के अमरकंटक से निकलकर अरब सागर तक 1312 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। पूर्व से पश्चिम की ओर बहने के कारण भी नर्मदा को अद्भुत और सबसे अलग माना जाता है।

नर्मदा को आप अनेक नामों से जानते हैं जैसे रेवा, मेकलसुता, सोमो देवी आदि। मध्य प्रदेश के पूर्वी छोर से निकलकर 15-16 ज़िलों को तृप्त करते हुए नर्मदा गुजरात में प्रवेश करती है और फिर अरब सागर में विलीन होती है। इस बीच तवा, शक्कर, दूधी, देव, बरना, चंद्रशेखर, हथिनी जैसी कई नदियां नर्मदा में समाहित हो जाती हैं। अपने लंबे रास्ते में नर्मदा बड़े ही सुंदर जलप्रपात बनाती है- कपिलधारा, दुग्ध धारा, धआंधार, मांदार, दर्दी, सहस्त्रधारा आदि।

जल की व्यथा कथा
सागर से जाकर कौन कहे?
नदिया कब तक मौन बहे..!

लोककथाएं ऐसी भी हैं कि सोन, नर्मदा और जोहिला के बीच एक प्रेम त्रिकोण बना और नर्मदा इसलिए आजीवन कुंआरी नदी ही रहीं। फिर भी यह नदी इसलिए भी पवित्र मानी गयी है क्योंकि 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर इसी के तट पर है। नर्मदा मध्य प्रदेश की वह नदी है जिसके संबंध में विपुल साहित्य भी उपलब्ध है और इसके तटों पर महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन भी होता है।

जिससे रूठ गयी थीं नर्मदा

भारत की बड़ी नदियों में से एक सोन नदी अमरकंटक से ही निकलकर अनेक छोटे-छोटे जलप्रपात बनाते हुए, 784 किलोमीटर बहकर गंगा नदी में समाहित हो जाती है और साथ-साथ ले चलती है घागर, जोहिला, छोटी महानदी, गोपद, रिहंद, कनहर, कोल आदि नदियों की जलधाराओं को भी। सुवर्णा, सोनभद्रा, शुभांगधी आदि नामों से भी पुकारी जाने वाली इस नदी को पौराणिक कथाओं में पुरुष ‘नद’ भी कहा गया है। लोककथाओं के अनुसार नर्मदा नदी इससे रूठकर विपरीत दिशा में बहने लगी, जबकि सोन नद पूर्व दिशा में बहते रहे। बुंदेलखंड की जीवन रेखा कहलाने वाली बेतवा को पुराणों में वैत्रावती कहा गया है। यह मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के बीच एक सीमा रेखा है। बेतवा के उद्गम पर भीमकुंड अति सुंदर जलप्रपात है, जिसका संबंध महाभारत से बताया जाता है।

प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी नदी

चंबल का उत्कर्ष विंध्य पर्वत की जानापाव पहाड़ियों से होता है, 965 किलोमीटर के रास्ते में क्षिप्रा, कालीसिंध, पार्वती, बनास आदि नदियों के जल को साथ लेकर यह यमुना में समाहित हो जाती है। इसके पौराणिक नाम धर्मावती व चर्मावति मिलते हैं। मंदसौर में चूलिया व इंदौर में पातालपानी चंबल नदी के सुंदर जलप्रपातों में से हैं।

मैं भी नदी हूं तू भी नदी है
समानांतर हैं यह त्रासदी है…

सूर्यपुत्री के नाम से प्रसिद्ध ताप्ती नदी बैतूल की मुलताई पहाड़ियों से निकलकर नर्मदा के समानांतर 724 किलोमीटर बहते हुए खंभात की खाड़ी में समाहित हो जाती है। साथ ही मिला लेती है पुर्ना, बहादुर, गिरना, बोरी, शिवा आदि नदियों को। यह पश्चिमी भारत में कृषि की जीवन रेखाओं में से एक है। ताप्ती नदी का विशाल रूप घोघरा जलप्रपात के रूप में दर्शनीय है। बैतूल के पास पारसडोह झरना भी इस नदी की सुंदर कविता की तरह दिखता है।

बेतवा और और भी कई नदियां

रायसेन जिले के कुभरा गांव से निकलकर यमुना नदी में मिलने तक बेतवा नदी 590 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। विदिशा, ओरछा, सांची आदि दर्शनीय स्थल बेतवा नदी के किनारे पर स्थित हैं। बीना, धसान, सिंधु जैसी छोटी नदियां इसकी जलराशि को समृद्ध करती हैं।

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सिवनी जिले की महादेव पहाड़ियों से निकलने वाली बेनगंगा नदी 570 किलोमीटर का रास्ता तय करके गोदावरी में लीन हो जाती है। बेवा व वैया भी कही जाने वाली बेनगंगा का संगम जब महाराष्ट्र में वर्धा के साथ होता है तो प्राणहिता नदी का रूप बन जाता है।

470 किलोमीटर बहने वाली सिंध नदी विदिशा ज़िले से निकलकर कुंवारी, पाहुज आदि नदियों को लेते हुए यमुना में मिल जाती है। पन्ना के निकट सुंदर पांडव जलप्रपात बनाने वाली केन नदी विंध्याचल पर्वत, कटनी से निकलकर 427 किलोमीटर बहकर यमुना में समाहित हो जाती है।

ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर जिसके किनारे है और जिसके तट पर हर 12 साल में महाकुंभ सिंहस्थ का मेला भरता है, उस शिप्रा को ‘मालवा की गंगा’ कहते हैं। 195 किलोमीटर की लंबाई वाली शिप्रा इंदौर की ककरा बर्डी पहाड़ियों से निकलकर चंबल में समा जाती है।

नर्मदा की सहायक नदियों में सबसे बड़ी तवा नदी पचमढ़ी की महादेव पहाड़ियों से निकलकर 172 किलोमीटर चलती है।

नदी जोड़ो कवायदें और संकट

भारत सरकार की नदी जोड़ो परियोजनाओं में सबसे पहली नर्मदा-शिप्रा जोड़ो परियोजना थी जो कि 29 नवंबर 2012 में शुरू की गयी, जिसके अंतर्गत ओंकारेश्वर बांध का पानी शिप्रा नदी में प्रवाहित किया जाता है। मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश की संयुक्त परियोजना ‘केन- बेतवा लिंक परियोजना’, जिसे अमृत क्रांति नाम दिया गया, को प्रायद्वीपीय नदी विकास योजना के अंतर्गत सन् 2005 में प्रारंभ किया गया था। हालांकि अनुपम मिश्र जैसे अन्य कई पर्यावरणविदों ने इस क़दम को प्रकृति विरुद्ध बताकर समय-समय पर नदी जोड़ने वाली परियोजनाओं पर आपत्ति एवं विरोध जताया।

सींच-सींच कण-कण धरती का
बूंद-बूंद सूखी
संस्कृतिहीन सभ्यता फिर भी
भूखी की भूखी
आसपास बालू ही बालू
किसकी बांह गहे?
नदिया कब तक मौन बहे..!

  • प्रदूषण: सीवेज, औद्योगिक कचरा और कृषि अपवाह के कारण नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, ख़ासकर नर्मदा, शिप्रा और बेतवा नदियाँ, जिससे जल की गुणवत्ता गिर रही है और पीने व सिंचाई के लिए पानी अनुपलब्ध हो रहा है।
  • रेत खनन और बांध: बड़े बांधों और अनियंत्रित रेत खनन से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, जलस्तर घट रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है।
  • वनों की कटाई: नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वनों की कटाई से वर्षा जल का संचयन कम हो रहा है, जिससे नदियों में पानी की कमी हो रही है।
  • जल संकट और सूखा: अत्यधिक दोहन और कम वर्षा के कारण बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में नदियाँ और कुएँ सूख रहे हैं, जिससे पीने के पानी की गंभीर समस्या है।
  • अवैज्ञानिक प्रबंधन: सरकारी और स्थानीय स्तर पर नदी संरक्षण के प्रति उदासीनता और अवैज्ञानिक तरीक़ों के प्रयोगों के आरोप भी लगते हैं।
  • बाढ़: मानसून के दौरान अत्यधिक बारिश और बांधों से छोड़े गये पानी के कारण अचानक बाढ़ आ जाती है।

कहां कौन-सा बांध?

होशंगाबाद ज़िले में, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के पास, 1815 मीटर लंबा तवा बांध मध्य प्रदेश का सबसे लंबा बांध है। (जबकि खंडवा ज़िले में नर्मदा नदी पर बना इंदिरा सागर बांध मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा बांध है, जो 958 वर्ग किलोमीटर में फैला है) यहीं वृहद तवा जलाशय भी है। रानी अवंतीबाई सागर बरगी, इंदिरा गांधी नर्मदा सागर-पुनासा बांध व सरदार सरोवर बांध नर्मदा पर बनी बड़ी परियोजनाओं में शामिल हैं।

शिवपुरी ज़िले का मणिखेड़ा बांध सिंध नदी की महत्वपूर्ण परियोजना है। मध्य प्रदेश की पहली जल विद्युत परियोजना गांधी सागर नीमच में चंबल नदी पर है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार की संयुक्त परियोजना बाणसागर बांध सोन नदी पर शहडोल जिले में स्थित है। भांडेर परियोजना दतिया, ग्वालियर, भिंड आदि को सिंचित करने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है, जो बेतवा नदी पर है। महारानी लक्ष्मी बाई सागर व हलाली नहर बेतवा संबंधी अन्य अहम परियोजनाएं हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद होने वाले नव भारत निर्माण के समय नेहरू जी ने बांधों को नये भारत के मंदिर तक कहा था, लेकिन नदी को गाने वाले कवि उसकी पीड़ा भी महसूसते हैं, तभी तो कह उठते हैं

नदी के दो किनारे हैं एक योगी एक भोगी
संतुलित धार ही शायद नदी की ज़िंदगी होगी
नदी बांहें पसारे है, नदी का भाव आराधो…
नदी पर पुल बना लो पर
नदी में बांध मत बांधो..!

दीक्षा मनीष, deeksha manish

दीक्षा मनीष

पेशे से सांदीपनि विद्यालय में व्याख्याता। शिक्षा, साहित्य एवं कलाओं संबंधी रुचियों से संपन्न। ख़ुद को लेखक तो नहीं मानतीं किंतु निरंतर अध्ययन करते रहना एक शग़ल ज़रूर।

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