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पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....

नाम बदलने की सनक बनाम समझ

            एक राग है काफ़ी। जितना कर्णप्रिय राग है, इसका नाम भी कुछ कम नहीं। ‘काफ़ी’ बेमतलब शब्द नहीं है और अपने अर्थों की वजह से यह शब्द सकारात्मक या नकारात्मक जैसी परिभाषाओं में बंधता भी नहीं है। तब आपको क्या ख़याल आएगा जब किसी सरकारी प्राथमिक स्कूल में हाज़िरी लेते वक़्त मास्टर एक बच्ची को पुकारे ‘काफ़ी’?

आगे की बात एक बीते क़िस्से से करता हूं। पापा के एक दोस्त हुआ करते थे। फ़ौज से छुट्टी पाने के बाद ग्वालियर से चार पन्नों का एक साप्ताहिक निकाला करते थे। नाम रामकिशन तायल फ़ौजी। एक लंबे दौर के लिए पापा और तायल अंकल क़रीबी दोस्त रहे। हम जब ग्वालियर जाते तो उन्हीं के घर रुका करते और वो भोपाल आते तो हमारे। तायल अंकल तो हमने बाद में (पापा के बाद) कहना सीखा, बचपन में हम उन्हें ताऊ कहा करते और उनके बच्चे हमारे पापा को चाचा। तब छह या सात बेटियां थीं (अब भी होंगी) तायल अंकल की। शायद छह के बाद एक बेटा हुआ और फिर एक और बेटे की चाह में जब और एक बेटी हुई तो तब उन्होंने हाथ जोड़े। इस आख़िरी संतान का नाम ‘तृप्ति’ रखा था।

ऐसे कुछ कवियों को भी मैंने अपने आसपास देखा है, जो बेटियों पर स्नेह और गर्व लुटाती कविताएं, कहानियां मंचों से सुनाते हैं। शान से बताकर कि उनकी तीन या चार या पांच बेटियां हैं इसलिए बेटियों से बड़ा लगाव है। जबकि मुझे पता है वो ख़ुद जानते हैं, बेटे की ख़्वाहिश में इतनी बेटियां होती रहीं, इतनी बेटियों के कारण लंबे समय तक वे सामाजिक रीति-रिवाजों को ढोने के लिए तनाव में रहे और… ख़ैर, मैं यहां बेटा-बेटी बहस नहीं बल्कि नामों को लेकर कुछ विचार रहा हूं।

एलीट भाषा संपन्न वर्ग विशेष में मिलने वाला नाम तृप्ति हर बार ऐसे ही किसी कारण से नहीं रखा जाता होगा। फिर भी ऐसे कारण हमारे आज के भारत में मौजूद तो हैं। क़स्बाई या शहरों से सटे ग्रामीण इलाक़ों में ज़रा एक फेरा लगाइए, बेटे की चाहत में हो रही बेटियों के वो नाम मिलेंगे कि अपने समाज पर अफ़सोस होने लगेगा। किसी स्कूल में किसी बच्ची का नाम ‘आखरी’ पुकारा जा रहा है, किसी का नाम ‘अंतिम’, किसी का ‘बसकरी’ भी।

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पहलवानी में एक बेटी ने 2022 में भारत को चैंपियन होने का गौरव जब महसूस करवाया, तब उसका नाम चर्चा में कुछ देर के लिए आया। रेसलर अंतिम पंघल 21वीं सदी के भारत की पैदाइश है। मां-बाप ने उसका यह नाम इस मन्नत में रख दिया था कि अब और बेटी नहीं, बेटा पैदा हो।

अब बात कुछ जगहों की। ज़िलों, क़स्बों, शहरों के नाम तो बदलने का सिलसिला पिछले कुछ सालों से रुक ही नहीं रहा। गांवों के नाम बदलने की मांगें लगातार अनसुनी पड़ी हुई हैं। कई राज्यों में स्थानीय लोगों ने कई बार सरकार को अर्ज़ियां भेजी हैं कि हमारे गांव का नाम बदल दो सरकार.. पर सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती। कहीं-कहीं जूं रेंगने में बरसों लग रहे हैं। मध्य प्रदेश समेत अन्य कुछ राज्यों में यह मांग इसलिए गंभीर है क्योंकि कई गांवों के नाम जातिसूचक हैं। इन गांवों के नामों की वजह से लोगों को तरह-तरह के अपमान आज भी झेलने पड़ रहे हैं इसलिए मैं उन गांवों के नाम यहां लिखने से परहेज़ कर रहा हूं। इनके नाम बदलने में सरकारों को कोई रुचि क्यों नहीं है?

अब ऐसे गांवों के नाम बदलने से न तो सरकारों को सियासी नफ़े का कोई मसाला मिलता है, न विपक्ष को घेर पाने की कोई रणनीति।

इस सिलसिले में अपने पड़ोस की बात भी करना ज़रूरी है। हमारे पड़ोसी मोहल्ले का नाम ‘संत आसाराम नगर’ है। जब रखा गया होगा तब भी क्यों रखा गया होगा! 2018 में आसाराम को 2013 के बलात्कार मामले में अदालत ने दोषी पाया। 2023 में जिन मामलों के लिए उम्र क़ैद दी गयी वो 2001 और 2006 के हैं। इस मोहल्ले की बसाहट संभवत: 2001 के बाद की ही है। पुरानी बात छोड़ भी दें तो अब पिछले सात-आठ बरस से इस मोहल्ले का नाम एक बलात्कारी के नाम पर क्यों पड़ा हुआ है? हरियाणा में राम रहीम के नाम पर कुछ स्थान बसे हुए हैं, ऐसे और भी पाखंडी बाबाओं के नाम पर और जगहों के नाम भी आपके ज़ेह्न में आएंगे। हम किस तरह का समाज और किस तरह का तंत्र हैं?

आसाराम या राम रहीम जैसे बाबाओं के नाम हटाने से होने वाले उपद्रव का ख़याल ही हमारी छप्पन इंच की सरकारों को डरा देता हो शायद। असल में, यह विशुद्ध रूप से सकारात्मक और समाज को उठाने का काम है, सो इसकी ख़बर प्रमुखता से उछलेगी भी नहीं। शायद ऐसी ही तमाम वजहों से इन मांगों की फ़ाइलें धरी रह जाती हों।

समीर चंदा निर्देशित एक बांग्ला फ़िल्म है ‘एक ​नदिर गल्पो’। पिता की लाड़ली बचपन से ही पूछती है इस नदी का नाम केलेघाई क्यों है, इसका जब कोई मतलब ही नहीं! कहानी के अंत में वह पिता अपनी बेटी की याद में नदी का नाम ‘अंजना’ रखने की मांग करते हुए बौराया जा रहा है। तब एक प्रशासनिक अधिकारी उस प्रक्रिया पर विचार कर रहा है कि किसी नदी का नाम क्या बदला जा सकता है! हां, तो कैसे! एक जज़्बाती कहानी इस तरह सामाजिक और वैचारिक मुद्दों के स्तर पर भी झकझोरती है।

कितने प्रशासनिक अधिकारी हैं जो ऐसे विचार कर पा रहे हैं? जबकि सामने दर्जनों क्या सैकड़ों गांवों के अजीब/बेमतलब/हास्यास्पद/अफ़सोसनाक या अपमानसूचक नामों की फ़ेहरिस्त रखी हुई है। जबकि शहरों के नाम रातो-रात बदले जा सकते हैं, मोहल्लों और गांवों के लिए इस स्थिति में क्यों और कितने बरसों तक विचार की ज़रूरत पड़ती है?

हबीबगंज, जलालाबाद जैसे नगरीय क्षेत्रों के, राजपथ जैसे मार्गों के या मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं के जब नाम बदले जाते हैं तो एक हंगामा-सा खड़ा होता है। हमारे लेखक, एक्टिविस्ट भी प्रतिक्रिया में कुछ कटाक्ष कर लेते हैं। नाम बदले जाने की प्रक्रिया के मूल में दरअसल वजह नहीं नीयत का ही खेल है। सदियों से होता आया है, जिसका राज हो वो ऐसे तमाशे करता ही है। ये सब अब भी होते रहना सवालिया निशान है कि लोकतंत्र और प्रगति बस नाम के दावे हैं! और अब नकारात्मकता समाज के भीतर पसरती जा रही है। तमाम नारों के शोर में हमें ठहरकर सोचना होगा एक समाज के तौर पर हम और पीछे तो नहीं जा रहे हैं।

कभी-कभी मैं ऐसे शहर की कल्पना करता हूं जहां स्थानों के नाम लीडरान या एलीट वर्ग के बजाय चिंतकों, कवियों, कलाकारों और विद्वानों के नाम पर हों; जहां निचली या पिछड़ी ​बस्तियों के नाम अंबेडकर नगर न रख दिये जाते हों; जहां लोग अक्सर कहते मिलते हों हम ग़ालिबनगर में हैं या प्रेमचंदपुर या महाश्वेतागंज या… ​मुझे लगता है इन बातों से समाज का मिज़ाज पता चलता है। जगहों के नामों से अंदाज़ा लगता है वहां के लोग दक़ियानूसी हैं, बेपर्वा हैं… या फिर उनके पीछे कोई कलात्मक/रचनात्मक चेतना है।

1980 के दशक का एक वीडियो, जिसमें महादेवी वर्मा के भाव सुनायी देते हैं- ‘भई इतना शोर है प्रगति का लेकिन हम पूछते हैं मनुष्य कहां है? मनुष्य की समझ, उसके दिल-दिमाग़ की कितनी प्रगति हुई? क्या वह बेहतर मनुष्य बन सका?’ 40 बरस बाद फिर विकास का शोर बहुत है, लेकिन यह सवाल अब भी लाजवाब किये हुए है।

कुछ पत्रकार दोस्त ताल ठोककर कहते सुने जाते हैं अब तक अहमदाबाद का नाम तो बदला नहीं गया! मगर सवाल ऐसे नामों को बदलने का है ही कब! जो नाम बदले जा रहे हैं, वो तो मुद्दे हैं ही नहीं। (उपर्युक्त चर्चानुसार) बेटियों के नाम हों या गांवों के या मोहल्लों के, जब तक हमारी सोच पुराने दलदलों में ही धंसी हुई है, हम चाहे जो नारे चिल्लाते रहें, फ़र्क क्या पड़ता है! हम बोलेंगे कि नामों से पहले सोच बदलना है। मैं अपने समाज, एक्टिविस्ट साथियों व लीडरान से और क्या कहूं, आपको नहीं लगता ज़रूरत उन्हें मुद्दा बनाने की है, जिन नामों को बदलना सभ्य, जाग्रत और मनुष्य होने का सबूत है?

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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