
भारत को जो हिस्सा प्राकृतिक सुंदरता का गढ़ है, वहां राजनीति की कुरूपता भयावह हो रही है! उत्तराखंड में हाल ही हुई चर्चित सांप्रदायिक घटना के बाद प्रेस के सामने जो चिंताजनक हालात बन रहे हैं, उनके संबंध में एक चिट्ठी मिली है…
उत्तराखंड में नफ़रत के ख़िलाफ़ मोर्चा
नमस्ते साथियो!
उत्तराखंड इस वक्त घृणा और अलगाव की राजनीति का केंद्र बन गया है। हम किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, इसका अंदाज़ा हमारे वैचारिक साथियों को भी नहीं है इसलिए जनता के दुश्मनों और ख़ास तौर पर अमन-चैन और मुहब्बत, देश-दुनिया के दुश्मनों का मुक़ाबला बेहद कठिन हो गया है।
आपको बता दें कि ‘अनसुनी आवाज़’ के संपादक रूपेश कुमार सिंह को कुछ अराजक लोगों द्वारा पिछले कुछ दिनों से लगातार ट्रोल किया जा रहा था। बीती 26 जनवरी को कोटद्वार में दीपक कुमार ने ख़ुद को मोहम्मद दीपक बताकर कथित उग्र भीड़ से एक मुस्लिम दुकानदार का बचाव जिस तरह किया, उसके समर्थन में रूपेश ने ख़बर की। दीपक वाली घटना के बाद रुद्रपुर में जिम चलाने वाले एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर लिखा ‘मैं भी मोहम्मद दीपक’ हूं, तो उस पर भी हमला हुआ और रूपेश ने इसे भी कवर किया। ऐसी ख़बरों पर अब रूपेश सिंह को धमकी दी गयी है कि वह ख़ामियाजा भुगतने को तैयार रहें।
इसके ख़िलाफ़ सैकड़ो पत्रकारों ने हुंकार भरी और एकसूत्र में बंधकर ऐसे नफ़रती तत्वों के विरुद्ध मोर्चा खोला। एस.एस.पी मणीकांत मिश्रा से मुलाक़ात कर पत्रकारों ने कार्यवाही की मांग की, जिस पर एस.एस.पी. ने अतिशीघ्र कार्यवाही का भरोसा दिया।
विवेक और साहस की सबसे अधिक आवश्यकता है। पत्रकारिता का मतलब है स्टैंड लेना। नैनीताल समाचार में 1978 से, जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस में 2016 तक और जनसत्ता से रिटायर होने के बाद अब तक हमने हर मुद्दे पर जनता के पक्ष में, समानता, लोकतंत्र और न्याय के पक्ष में स्टैंड लिया है। ‘अनसुनी आवाज़’ में संपादक रूपेश हम सभी का चेहरा हैं। हम सबकी मनुष्यता, मानवीय संवेदना, हम सभी का साहस और विवेक हैं।

मोहम्मद दीपक मज़हब की आड़ में असभ्य, बर्बर हो चली सियासत के ख़िलाफ़ जिस विवेक और साहस के साथ बजरंगियों के मुक़ाबले खड़े हुए, वह इस देश के लोकतंत्र और संविधान की ताक़त है।
आतंक और झूठ का तंत्र, नफ़रत की सियासत मुट्ठी भर लोगों की करतूत है। लोग बोलना शुरू करें, उनके मुक़ाबले खड़ा होना शुरू करें तो नफ़रत और दहशत का यह तिलिस्म न सिर्फ़ उत्तराखंड में बल्कि पूरे देश में टूट जाएगा यक़ीनन।
तराई को सभी समुदायों के लोगों ने भाईचारा और मुहब्बत से बसाया है। यह मुहब्बत का मिनी इंडिया है। यहां नफ़रत और हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है।
प्रेस सबसे मज़बूत स्तंभ है लोकतंत्र का क्योंकि वह सच के साथ, जनता के साथ, अमन के साथ, मुहब्बत के साथ खड़ा होता है। कम से कम तराई के पत्रकारों ने आज यह साबित कर दिया।
रूपेश किसी सूरत में अकेला नहीं हो सकता।
कोई सच्चा पत्रकार कभी अकेला नहीं हो सकता।
ज़िंदाबाद साथियों।
-पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक-प्रेरणा अंशु
