ताहिर फ़राज़, tahir faraz
डॉ. आज़म की कलम से....

ताहिर फ़राज़ को ख़िराज

            “ताहिर फ़राज़ ने जनता की साइकी, मनोविज्ञान, माइंड सेट, उनकी प्राथमिकता, उनके मानसिक सरोकारों के मसाइल को समझने की भरपूर कोशिश की है और उनकी मासूम-मासूम भावनाओं और अनुभूतियों को अपनी शायरी के ढांचे में ढाला है। उन अनुभवों को जो यात्राओं से (जगह-जगह मुशायरों में आने-जाने से) प्राप्त होते हैं, ताहिर फ़राज़ ने उन्हीं को शायरी में व्यक्त दिया है।

ताहिर फ़राज़ की शायरी गूढ़ और भारी फ़लसफ़ों वाली नहीं है बल्कि उनकी शायरी में ज़िंदगी की सच्चाइयां और हक़ीक़त रक़्स करती हैं जिन्हें हमारी आंखें दिन-रात देखती हैं। वह रोज़मर्रा के मुआ’मलात और सादे विचार व कल्पनाओं को अपनी शायरी का हवाला बनाते हैं और बहुत सादगी से अपनी बात करते हैं। ताहिर फ़राज़ की गुफ्तगू अवाम से है।” -सलाहुद्दीन परवेज़

“ताहिर फ़राज़ मुशायरों के मक़बूल शायर हैं मगर मुशायरों तक ही में सीमित नहीं हैं। उनकी रचनाओं का बदन बहुत नर्म, शफ़्फाफ़ (निर्मल), जाज़िब (आकर्षक) व मरमरीं (धवल) है। मुझे यक़ीन है कि ताहिर फ़राज़ की शायरी का जादू सर चढ़ के बोलेगा।” – हक़्क़ानी अल क़ासमी

ताहिर फ़राज़ का जन्म 29 जून 1953 को बदायूं की सरज़मीन पर हुआ और वहीं शायरी परवान चढ़ी। फिर ऐसी शोहरत मिली कि वो रामपुर स्कूल के नुमाइंदा शायर बन गये। मुशायरों में पाक़ीज़ा लहजे का ऐसा शायर कोई दूसरा नहीं था। न सिर्फ़ मुलायम लहजा था बल्कि उनकी शख़्सियत भी मुलायमियत भरी थी। नर्म तरन्नुम था तो बातें भी नर्म लहजे में करते थे।

इतवार को ये दुख भरी खबर सोशल मीडिया से मिली कि उनका इंतक़ाल मुंबई में हो गया। जिसकी वजह से तमाम शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखने वालों में शोक की लहर दौड़ गयी। ख़बरों के मुताबिक़ ताहिर फ़राज़ किसी घरेलू कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गये हुए थे, जहां इतवार को सुबह दिल का दौरा पड़ा और उनका इंतक़ाल हो गया।

ताहिर फ़राज़, tahir faraz

शिगुफ्ता तरन्नुम से ग़ज़ल पढ़ने वाले इस शायर की हालांकि मुशायरों से ही पहचान थी। लेकिन उनका आहंग आजकल के मुशायरों के शायरों से जुदा था। उनकी एक किताब “कश्कोल” प्रकाशित हुई जिसको काफ़ी लोकप्रियता मिली। उनकी मौत की ख़बर पर सोशल मीडिया में शोक संदेशों का एक सैलाब आ गया। सबको अपना कोई बिछड़ा हुआ महसूस हो रहा था।

उनके तरन्नुम में एक ऐसा लोच था, ऐसी मिठास थी, ऐसा दर्द था और ऐसी कशिश थी जो दिलों पर बेपनाह असर करती थी इसलिए मुशायरों में बहुत मक़बूल थे। उनके अशआर अवाम के दिलों में बसते थे और वह अवाम की ही बातें करते थे इसलिए उनकी ज़बान का लहजा भी अवामी था। इस क़दर आसान शेर कहते थे जो जज़्बात से इतने लबरेज़ होते थे कि मामूली पढ़ा-लिखा शख़्स भी अच्छी तरह समझ सकता था और उनके अहसास में शरीक हो जाता था। चीखने-चिल्लाने वाला अंदाज़ नहीं था। नारेबाज़ी नहीं थी। यही उन्हें तथाकथित मुशायराबाज़ शायरों से अलग करने की वजह रही।

अपनी शायरी में वह बहुत भारी-भारी शब्द या फ़लसफ़ा पेश नहीं करते थे। जीवन की सच्चाई सीधे अंदाज़ में पेश करने वाले शायर के तौर पर उनकी पहचान थी। शेरों में अतीत, वर्तमान और भविष्य की पड़ताल करती हुई बातें होती थीं। आम जनता की सोच को, उनकी फ़िक्र को, उनकी फ़िलासफ़ी को, उनकी नफ़सीयात को, उनके दुख-दर्द को अच्छे से समझते थे और इन्हीं को अपनी गुफ्तगू का विषय बनाते थे। एक शेर ने मुझे कभी अपने प्रभाव में ले लिया था। उसको मैं अक्सर गुनगुनाता था और उसके ख़याल की बुलंदी पर अश-अश करता था। शेर है:

मुफ़लिसी में पले हुए बच्चे
बे-इरादा जवान होते हैं

ख़ैर उनकी किताब “कश्कोल” मंज़र-ए-आम पर आयी, वह भी मुशायरों में 30 साल तक पढ़ने और उससे पहले से शायरी करते रहने के बाद। उनकी याद में उनके चंद शेर यहां गुनगुनाये जाते हैं:

इंतिख़ाब

कशिश ज़मीन की छोड़े तो मैं चला जाऊं
कि मेरा घर तो हमेशा से आसमान में है

उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वरना एक और क़लंदर होता

हाथों में कश्कोल ज़बां पर ताला है
अपने जीने का अंदाज़ निराला है

ख़ुद को पढ़ता हूं छोड़ देता हूं
इक वरक़ रोज़ मोड़ देता हूं

मिरी सोहबत का यह असर निकला
उसकी गर्दन पे मेरा सर निकला

किसी के वास्ते साया बना हुआ हूं मैं
न जाने धूप में कबसे खड़ा हुआ हूं मैं

नर्म बिस्तर की जगह ख़ुद को बिछा लेते हैं लोग
बाज़ुओं को मोड़कर तकिया बना लेते हैं लोग

नज़र बचाके गुज़रते हो तो गुज़र जाओ
मैं आईना हूं मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है

वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल
अफ़सोस ये है उसने मिरी बात काट दी

जो शजर बेलिबास रहते हैं
उनके साये उदास रहते हैं

बला की धूप अभी दिल के साइबान में है
अभी न आ कि बहुत कुछ कमी मकान में है

मैंने तो एक लाश की दी थी ख़बर फ़राज़
उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया

तेरी नज़र सजे हुए शोकेस पर रही
मैं आईने में अक्स तिरा देखता रहा

मुफ़लिसी में पले हुए बच्चे
बे-इरादा जवान होते हैं

बड़ी शिद्दत से आती है याद तुम्हारी
दुआ करो कि मेरी याददाश्त चली जाये

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *