आयुर्वेद, ayurveda, ayurvedic medicine
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....

आयुर्वेद पर फैसला बिना सुनवाई?

            आयुर्वेद भारत की केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक समग्र दृष्टिकोण है। इसके बावजूद आज इसे बार-बार ‘अवैज्ञानिक’ या छद्म विज्ञान कहकर ख़ारिज कर दिया जाता है। आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े कई लोग यह तर्क देते हैं कि आयुर्वेद के पास पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, इसलिए इसे मुख्यधारा की चिकित्सा शिक्षा या नीति-निर्माण में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए।

यह पहली नज़र में तार्किक लगता है, लेकिन इसके भीतर एक गंभीर विरोधाभास छिपा है। आयुर्वेद से कहा जाता है कि पहले वह आधुनिक वैज्ञानिक तरीक़ों से स्वयं को सिद्ध करे। लेकिन जब सरकार या कोई सार्वजनिक संस्था आयुर्वेद पर शोध के लिए संसाधन लगाने की बात करती है, तो वही लोग कहते हैं कि यह जनता के पैसे की बर्बादी है। यानी प्रमाण भी चाहिए, लेकिन प्रमाण जुटाने की व्यवस्था नहीं चाहिए।

यह ठीक वैसा है जैसे पहले अंडा माँगा जाये, लेकिन मुर्गी पालने से मना कर दिया जाये। विज्ञान स्थिर नहीं होता — वह बदलता है। विज्ञान कोई बंद किताब नहीं है। इतिहास गवाह है कि जिन विचारों को कभी अवैज्ञानिक या असंभव कहा गया, वही बाद में नयी खोजों के साथ वैज्ञानिक समझ का हिस्सा बने।

एक समय था जब मस्तिष्क की तरंगों को बाहरी उपकरणों से मापने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज EEG और TMS जैसी तकनीकों के ज़रिये मस्तिष्क गतिविधियों का अध्ययन किया जा रहा है। जिन अवधारणाओं को पहले “कल्पना” कहा गया, वे आज प्रयोगशालाओं में परखी जा रही हैं।

“विज्ञान निश्चितताओं का संग्रह नहीं, बल्कि परीक्षण योग्य अनुमानों की प्रक्रिया है।” -दार्शनिक कार्ल पॉपर

इसी तरह आयुर्वेद की नाड़ी परीक्षा या दोष सिद्धांत को भी केवल इसलिए ख़ारिज कर देना कि आज की तकनीकें उन्हें पूरी तरह नहीं माप पा रहीं — यह विज्ञान के स्वभाव के विपरीत है। साथ ही यह तर्क भी दिया जाता है कि सिर्फ़ 3 पैमानों पर मानव के क्लिष्टतम विज्ञान को नहीं समझ सकते। लेकिन ये वास्तव में 3 पैमाने नहीं तीन तरह के पैमाने हैं, जिनसे लाखों परिस्थितयों का आंकलन किया जा सकता है।

अतः असली सवाल यह नहीं है कि आज हम क्या माप पा रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम नये औज़ार और नये दृष्टिकोण विकसित करने को तैयार हैं?

एक तर्क यह भी दिया जाता है कि इसमे रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (RCT) — यानी यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण नहीं हुआ है। यह एक विचित्र विरोधाभास है। कोई फ़ार्मा अपना पैसा ख़र्च करके, अपने तरीक़े से परिणाम लेकर, अपने लोगों से शोधपत्र छपवाकर साल दो साल या तीन साल में प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लेती है, यह सही है। लेकिन हज़ारों सालों से लोग उसी का उपयोग कर कर के लंबा स्वास्थ्य जीवन जिये हैं, वह प्रमाण नहीं है!

और फिर जब कभी सरकार इसके लिए फ़ंड करती है तो हो-हल्ला कि सरकार करदाता का पैसा बर्बाद कर रही है।

क्या आयुर्वेद से डर है?

यह भी एक असहज सच है कि स्वास्थ्य का मौजूदा मॉडल काफ़ी हद तक दवा-केन्द्रित हो चुका है। हर समस्या का समाधान गोली या इंजेक्शन में खोजा जाता है। आयुर्वेद जीवनशैली, आहार, दिनचर्या और व्यक्तिगत प्रकृति पर ज़ोर देता है। यदि लोग सच में अपने स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी लेने लगें, तो केवल दवाओं पर निर्भरता कम हो सकती है। यही कारण है कि समग्र स्वास्थ्य प्रणालियाँ कई बार व्यापारी मानसिकता असुविधाजनक लगती हैं।

क्या समग्र स्वास्थ्य से असहजता है?

आज स्वास्थ्य व्यवस्था का बड़ा हिस्सा दवाओं पर आधारित है। हर समस्या का समाधान गोली या इंजेक्शन में खोजा जाता है। आयुर्वेद जीवनशैली, आहार, दिनचर्या और व्यक्ति की प्रकृति पर ज़ोर देता है।” यह दृष्टिकोण अधिक ज़िम्मेदारी माँगता है — और शायद इसी कारण असुविधाजनक लगता है।

यह कहना ग़लत होगा कि वर्तमान आयुर्वेदिक चिकित्सा में समस्याएँ नहीं हैं। फिर भी कुछ ग़लत प्रथाओं या व्यावसायिक हितों के कारण पूरी प्रणाली को ख़ारिज नहीं किया जाता। लेकिन आयुर्वेद में एक भी झोलाछाप या भ्रामक दावा दिख जाये, तो पूरी परंपरा को ही अवैज्ञानिक ठहरा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड है।

आयुर्वेद को भी आत्ममंथन की ज़रूरत

यह लेख आयुर्वेद को “निर्दोष” घोषित करने का प्रयास नहीं है। समय के साथ आयुर्वेद की मूल परंपराएँ कमज़ोर पड़ी हैं। संस्कृत ग्रंथों के अनुवादों में त्रुटियाँ हुई हैं। कई जगह आधुनिक चिकित्सा से मेल बैठाने के लिए मूल सिद्धांतों को तोड़ा-मरोड़ा गया है। व्यावसायीकरण ने भी आयुर्वेद को त्वरित-लाभ के उत्पादों में बदल दिया है।

दक्षिण भारत की पारंपरिक पद्धतियां, जैसे केरल की अष्टवैद्य परंपरा या तमिल सिद्ध ग्रंथ, आज भी आयुर्वेद की गहरी समझ को संजोये हुए हैं। इन परंपराओं का संरक्षण, डिजिटलीकरण और विद्वानों द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।

हमें क्या बहस चाहिए?

आयुर्वेद बनाम आधुनिक चिकित्सा की लड़ाई से समाज का कोई लाभ नहीं होगा। ज़रूरत है ईमानदार संवाद की।

ज़रूरत है ऐसी वैज्ञानिक सोच की, जो पहले से तय न कर ले कि क्या “वैध ज्ञान” है और क्या नहीं। इसके दुष्परिणाम हमने कोविड के समय देखा है।

“आई एम द साइंस”… आयुर्वेद को न तो आँख बंद करके स्वीकार करने की ज़रूरत है, और न ही बिना समझे ख़ारिज करने की।

विज्ञान का काम है जाँच करना, न कि पहले ही फैसला सुनाना। अगर हमने आयुर्वेद को समझने के लिए औज़ार, संसाधन और ईमानदार प्रयास ही नहीं किये, तो उसे “अवैज्ञानिक” कहने का नैतिक अधिकार हमें नहीं है।

जैसा कि रिचर्ड फ़ाइनमैन ने कहा था- “विज्ञान विश्वास पर नहीं, संदेह पर चलता है।”

आइए, शोध होने दें।
आइए, आयुर्वेद को बोलने दें —
अपने शब्दों में भी, और विज्ञान की भाषा में भी।

डॉ. आलोक त्रिपाठी

डॉ. आलोक त्रिपाठी

2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।

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