
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
बाज़ारों से पहाड़ों तक 'बर्गन' के रंग
बर्गन, नॉर्वे के दक्षिण में बसा छोटा-सा प्रान्त है। ओदवे क्लीवे ने पूरा इंतज़ाम किया था कि मैं स्त्वांगर से बर्गन ज़रूर जाऊं। ओदवे का बचपन इस शहर में बीता था, उसकी बेटियां भी यहां रहती थीं। बर्गन में आने से पहले एक दुर्घटना हो गयी, हम पानी के जहाज़ पर थे, बीच में नाश्ते के लिए जहाज़ रुका, हम नीचे जलपान के लिए उतरे कि जहाज़ रवाना हो गया। अब मैं कहां हूं, मुझे पता नहीं था, तभी एक कार गुज़री, जिसमें एक महिला थी, उसने समस्या पूछी तो बोली, मैं बर्गन जा रही हूं, छोड़ देती हूं। मैंने ओदवे को ख़बर की, और कैरि की बेटी आकर होटल में छोड़ गयी। जिस वक़्त मैं बर्गन में उतरी, मौसम साफ़ था।
शाम को कवि ओयविन मिलने आये तो बेहद बरसात हो रही थी। ओयविन से बातचीत अद्भुत अनुभव था, जिसके बारे में अलग से चर्चा करना ठीक है। ओयविन से मिलना एक तरह से नॉर्वे के साहित्य से मिलना था। रात को लौटी तो 11 बज गये थे, लेकिन आसमान में उजाले की चमक बाक़ी थी।
दूसरे दिन कैरि सुबह दस बजे आयी और एक साहित्य संस्था के ऑफ़िस तक छोड़ कर चली गयी। कुछ देर बातचीत से पता चला कि नॉर्वे में कई किशोर और युवा रचनात्मक लेखन में प्रशिक्षण लेने आते हैं। इस तरह अनेक लेखकों को पार्ट टाइम रोज़गार भी मिल जाता है। नॉर्वे में कला, लेखन और फ़िल्म के लिए सरकारी अनुदान भी काफ़ी मिल जाता है। संभवतः यही कारण है अनेक कलाकार मात्र कला के सहारे अपना काम चला लेते हैं।
एक लड़की मिली, एक उपन्यास लिख रही थी, जो उन पहाड़ी लोगों की कहानी कहता था, जो सूअर पालकर जीवन चलाते हैं। वह स्वयं ऐसे परिवार की थी, जहां सूअर पाल कर जीविका चलायी जाती थी। आज भी बहुत-से लोग उसी तरह की ज़िंदगी पसंद करते हैं। मैं बाहर निकलकर स्वयं घूमना चाहती हूं। यहां की हर इमारत अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने में सक्षम है। हर चर्च रुककर देखने को मजबूर कर रहा है।
यद्यपि नॉर्वे पर रोमन साम्राज्य का शासन नहीं हो पाया था, यह इलाक़ा अधिकतर स्वीडन के अधीन रहा, फिर भी बर्गन की इमारतों पर रोमन साम्राज्य की शिल्प कला का प्रभाव दिखायी दे रहा था। मुझे अपने लैपटॉप के लिए दो प्लग वाला अडॉप्टर चाहिए, जो नॉर्वे में चलता है। खोजते-खोजते मैं एक दुकान में घुसती हूं तो पता चला है यह एक शॉपिंग मॉल का हिस्सा है। बाहर से साधारण इमारतों की तरह दिखने वाली यह पुरानी इमारत भीतर से इतनी नयी होगी, सोचा नहीं था। मैं भीतर घुसकर कुछ सैंडविच आदि खाने के बाद मैं दुकानों का जायज़ा लेती हूं, हर चीज़ भारत से दस गुना महंगी है।

एक अकेला इस शहर में…
शॉपिंग माल से निकलकर मैं मछली बाज़ार की ओर चल देती हूँ। मेरे ज़ेह्न में तो केरल और मुंबई के मछली बाज़ार थे, लेकिन ये बेहद ख़ूबसूरत दिखने वाली मछलियों को ठेलों नुमा दुकानों पर सजाकर खाने के लिए बेचने वाला बाज़ार था। कई मछली वाले मुझसे बातचीत करना चाहते हैं, पर भाषा आड़े आती है। नॉर्वे में अंग्रेज़ी का कोई ख़ास प्रचार नहीं है।
बर्गन को हार्बर शहर कहा जाये तो ग़लत नहीं होगा। यह शहर काफ़ी घना बसा हुआ है। मछली बाज़ार में कुछ देर भटकने के बाद याद आया मेरी कैप कहीं गिर गयी, मैं फिर से शापिंग मॉल की तरफ़ गयी, वहाँ कुछ नहीं दिखायी दिया तो एक बेंच पर बैठी। उस बेंच पर एक आदमी, जो कि नॉर्वे का नहीं लग रहा था, से मैंने पूछा कि यहाँ सार्वजनिक शौचालय कहाँ होते हैं। उसने सबसे ऊपर की मंज़िल में जाने के लिए कहा। मैं बेहद थकी थी, इसलिए कुछ देर यूँ ही बैठी रही। उसे समझ में आ ही गया था कि मैं नयी हूँ, वह मुझसे अंग्रेज़ी में बात करने लगा, कहाँ से आयी हूँ, क्यों, आदि। जब मैंने उससे उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह चिली का रहने वाला है और यहाँ ट्रक ड्राइवर का काम करता था, लेकिन पिछले दिनों एक्सीडेंट होने के कारण वह बेकार है। शाम को यूँ ही मॉल में आकर बैठ जाता है, या फिर किसी ऐसे केंद्र में चला जाता है, जहाँ नशे की लत वाले युवकों का इलाज होता है। वहाँ जाकर उन्हें बाइबिल आदि सुनाता है।
क्या यहाँ नशे की लत काफ़ी लोगों को है? मेरे पूछने पर वह कहने लगा अमेरिकन संस्कृति का प्रभाव सभी पर पड़ा है। परिवार के बारे में पूछने पर उसने बताया उसके तीन बेटे हैं, और वह ही माँ और पिता दोनों का दायित्व निभाता है। पत्नी के बारे में पूछने पर कहने लगा कि उसे किसी नॉर्वेवासी से प्यार हो गया तो वह उसके साथ चली गयी, मैंने अपनी पत्नी से कहा तुम जाओ, लेकिन मेरे बेटों को यहीं छोड़ जाओ, दूसरा व्यक्ति उनका ख़याल नहीं रख सकता है। अब वह महीने में एक बार आती है, बच्चों के साथ रहती है। मैं मेहमान की तरह उसकी देखभाल करता हूँ। अब वह मेरी पत्नी नहीं, बस दोस्त है। मैं अपना समय समाज सेवा के लिए लगाता हूँ। थोड़ी देर बाद वह उठा और कहने लगा मैं आपको ऊपर जाने का रास्ता बताता हूँ, मुझे उससे काफ़ी कुछ जानकारी मिल रही थी, इसलिए उसके साथ ऊपर तक चली आयी। ऊपर शौचालयों के दरवाज़े पर डिब्बा-सा था, उसने एक दरवाज़े के डिब्बे में एक सिक्का डाला और मुझसे कहा मैं चली जाऊँ। तभी मुझे पता चला शौचालय के लिए शुल्क है।
क्या आप कॉफ़ी पिएंगी, उसने मुझसे पूछा। मैं उसकी कहानी सुनना चाह रही थी और यह भी महसूस कर रही थी कि वह अपनी कहानी कहने को आतुर है। हालाँकि बातचीत इतनी आसान नहीं थी, क्योंकि वह इंग्लिश सोच-सोच के बोल रहा था।
हम ऊपर बने कॉफ़ी हाउस में बैठ गये तो वह दो कॉफ़ी ले आया। कॉफ़ी पीते वक़्त मैंने उसकी फ़ोटो ली। वह बताने लगा कि उसे यह देश बिल्कुल पसंद नहीं है, लोग 6 महीने तक घरों में घुसे रहते हैं, हमेशा बर्फ़ और अंधेरा। सर्दियों के दिनों में वह अपने देश चला जाता है, लेकिन पैसा कमाने के लिए उसे नॉर्वे आना ही पड़ता है। नॉर्वे में पेट्रोल और मछली के निर्यात के कारण काफ़ी धन आ गया है और यह युवा वर्ग को भ्रमित भी कर रहा है। लेकिन ऐसे युवकों की कमी नहीं है, जो अपने लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ रहे हैं।
कॉफ़ी पीने के बाद मैंने चिली से आये उस व्यक्ति को बताया कि मैं शहर में चलने वाली फ्री बस में घूमना चाह रही हूँ, तो वह मेरे साथ बस स्टैंड तक चला आया। मैंने जान-बूझकर उसकी पत्नी और बच्चों की बात नहीं की। लेकिन मुझे यह तो पता चल ही रहा था कि वह पत्नी के जाने के बाद भीतर से बेहद अकेला हो गया है। उसके चेहरे पर एक भोलापन-सा था और व्यवहार में सादगी थी। यही कारण है कि मैं उसको साथ चलने के लिए मना नहीं कर पायी।
कुछ देर बाद हम फ्री बस में बैठ गये, यह संभवतः सैलानियों को ध्यान में रखकर चलायी गयी है, हालाँकि मैंने उसमें स्कूल के बच्चों को बैठते-उतरते देखा। बस एक तरह से शहर की परिक्रमा करती है।
दस-पंद्रह मिनट में ही हमने बस में शहर का चक्कर लगा लिया और होटल के क़रीब उतर गये। मैंने उसे भारतीय नमकीन का पैकेट दिया और विदा माँगी। “मुझे शाम को किसी से मिलने जाना है, आप भारत आएँ तो मिलें।” वह चुपचाप हाथ मिलाकर चला गया।
बांसुरी से ध्वनि प्रदूषण तक…
यात्रा में हम जगह की बातें तो करते हैं, उन लोगों को छोड़ देते हैं, जो अनायास ही अपने मन को हमसे बाँट लेते हैं। शायद अनजान व्यक्ति से मन के दुख को बाँटना आसान होता है। शाम को सात बजे कैरी आकर अपने साथ कैफ़े ले गयी, जहाँ उसकी बहन क्यूहु और भाई हमारा इंतज़ार कर रहे थे। यह कैफ़े भी संभवतः आर्टिस्ट लोगों का अड्डा रहा होगा, क्योंकि लोगों को कई समूहों में बँटे और गंभीर चर्चा करते देख पा रहे थे।
कैफ़े का मेनू नॉर्वेजियन भाषा में था, लेकिन एक आइटम के आगे इंडियन लगा हुआ था। कैफ़े मालिक अंग्रेज़ी जानता था, पूछने पर बताया कि जब भारत ब्रिटिश के अधीन था, तब इस खाद्य पदार्थ को इंडियन नाम दिया जाने लगा। बात मुझे ख़ास समझ में नहीं आयी, लेकिन इतना ज़रूर महसूस हुआ कि इंडिया शब्द इन लोगों के लिए नया नहीं है। मुझे नॉर्वे के खाने में विशेष प्राकृतिक स्वाद का अनुभव हुआ, और एक बार भी नहीं लगा कि खा नहीं सकती।
खाने के बाद कैरि हमें शहर में घुमाती हुई पहाड़ी की ओर ले गयी। हालाँकि मैं तीसरी-चौथी बार शहर में घूम रही थी, लेकिन हर चीज़ मन को आकर्षित कर रही थी। शहर के बीचो-बीच बने थिएटर KUNSTMUSEENE – I BERGEN के आसपास अनेक मूर्ति शिल्प थे। यूरोप में पाये जाने वाले सभी पुरातन शिल्प में रोमन शिल्पकला का स्पष्ट प्रभाव है। देह को दैवीय बनाते हुए, अंग-अंग के कौशल को दिखाना इनका उद्देश्य है। इन शिल्पों में नग्नता रोमांचक नहीं बल्कि मानवीयता को दैविकता के क़रीब ले जाने की कोशिश-सी लगती है।
हम पहाड़ी के नीचे आये, पहाड़ी के ऊपर जाने के लिए एक रेलगाड़ी का इंतज़ाम था। इस रेलगाड़ी का निर्माण 1918 में हुआ था। स्टेशन पर कई चित्र थे, जिसमें गाड़ी निर्माण की प्रक्रिया बतायी गयी थी। इस काल के अन्य चित्रों में पुल निर्माण आदि को भी दिखाया गया है।
नॉर्वे महंगा देश है, अतः यहाँ धनिक सैलानी ही आते हैं, यही कारण है यहाँ एशियाई लोग कम दिखायी दिये। पहाड़ी के ऊपर जाते ही मन भीग-सा गया। पहाड़ी ढलानों पर घने जंगल, घनी आबादी वाला शहर और समुद्र… लेकिन एक बात थी, जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया, और वह थी आवाज़। सागर, शहर और मशीनों की आवाज़ ऊपर तक पहुँचते-पहुँचते इस क़दर घनीभूत हो गयी थी कि उन्हें अलग-अलग करना मुश्किल था। ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव मुझे पहली बार महसूस हुआ।
मुझे याद आया कि ओदवे ने बताया था वह अपने बचपन में पहाड़ों के ऊपर बाँसुरी लेकर चली जाती थी और घण्टों तक प्रकृति का आनन्द लेती थी। उसके बाल्यकाल में बर्गन विकसित शहर नहीं था। लेकिन ओदवे को आज भी बर्गन की यादें सताती हैं। स्त्वांगर में वह ब्रेयान के कारण पहुँची, हालाँकि दोनों में मित्रता बर्गन में ही हुई थी।
रात काफ़ी हो गयी थी, फिर भी सूरज का उजाला था। कैरि ढलान से ही लौट गयी, मैं आसपास की दुकानों में झाँकती हुई होटल की ओर चलने लगी। बर्गन में जो दूसरी बात मैंने देखी वह यह थी कि बर्गन में हर सड़क में दो-चार आर्ट गैलरियाँ थीं। पता नहीं यह सैलानियों के लिए थीं या फिर जन निवासियों के लिए। नॉर्वे के लोग बड़ी ख़ूबसूरती से घर सजाते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। उन्हें चीज़ें एकत्रित करने का भी शौक़ है।
इस बारे में ओदवे का कहना था कि हम लोग सर्दी के कारण अधिकतर घरों में ही रहते हैं, शायद इसीलिए चीज़ें संग्रहित करना हमारा शौक़ बन गया है।
दूसरे दिन सुबह आठ बजे मैं रेलवे स्टेशन पर थी।
बर्गन का स्टेशन बेहद छोटा-सा था, घड़ी के पास खुदे वक़्त के अनुसार इस स्टेशन का निर्माण 1868 में हुआ था। गाड़ियाँ बेहद छोटी किन्तु आरामदेह हैं। ओदवे ने रिज़र्वेशन करवाकर टिकट हाथ में थमा दिया था, इसलिए कोई परेशानी नहीं हुई। लग ही नहीं रहा था हम किसी मॉडर्न शहर के रेलवे स्टेशन में बैठे हैं। गाड़ी में बैठकर मैं बर्गन के बारे में लिख रही हूँ।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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