
- March 15, 2026
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21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो एक टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण...
पाक्षिक ब्लॉग (भाग-5) मानस की कलम से....
क्यों ख़ास है ‘हासिल’? और यह न होती तो?
‘हासिल’ (2003), जिसे तिग्मांशु धूलिया ने लिखा और निर्देशित किया, सतही तौर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि में रची गयी एक प्रेम कहानी लगती है। कुछ लोग इसे सत्ता संघर्ष की कथा मानते हैं, तो कुछ बदले की कहानी। लेकिन गहराई से देखें तो ‘हासिल’ दरअसल उस क्षण की कहानी है, जब राजनीति आपके घर के भीतर प्रवेश कर जाती है। फ़िल्म का एक संवाद इसकी थीम स्पष्ट कर देता है- जब भ्रष्ट राजनीतिक शक्ति आपकी निजी दुनिया पर नज़र डालती है, तो सिर्फ़ व्यवस्था नहीं, आपका घर भी असुरक्षित हो जाता है।
‘हासिल’ उन फ़िल्मों में है, जिन्हें बॉक्स ऑफ़िस का बड़ा सहारा नहीं मिला, फिर भी समय के साथ जिन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी। हासिल, सहर और रहना है तेरे दिल में… जैसी फ़िल्मों को दर्शकों ने अपनाकर उन्हें मील का पत्थर बना दिया। ‘हासिल’ ने हिंदी सिनेमा को दो मज़बूत धुरंधर दिये- तिग्मांशु धूलिया और इरफ़ान खान।
कहा जाता है जिस समय इरफ़ान सिनेमा छोड़ने का मन बना चुके थे, उसी समय तिग्मांशु ने उन्हें ‘हासिल’ का रणविजय सिंह दिया और फिर नतीजा सबके सामने है। स्वयं तिग्मांशु ने स्वीकार किया कि केवल ‘हासिल’ की बदौलत उन्हें वर्षों तक इंडस्ट्री में काम मिलता रहा। सवाल यही है आख़िर ऐसा क्या था ‘हासिल’ में, जिसने इतने लोगों को इतना कुछ हासिल करा दिया?
फ़िल्म इतिहासकार गौतम चिंतामणि के अनुसार, छात्र असंतोष को पहली बार प्रभावशाली ढंग से लीडर (1964) में दिखाया गया, जिसमें दिलीप कुमार ने छात्रों की आवाज़ बनने वाले युवा की भूमिका निभायी थी। सत्तर और अस्सी के दशक में व्यवस्था-विरोधी छात्र आक्रोश कई फ़िल्मों का विषय बना। लेकिन छात्र राजनीति की जटिलताओं को जिस सूक्ष्मता और यथार्थ के साथ ‘हासिल’ ने चित्रित किया, वह उसे विशिष्ट बनाता है। यह फ़िल्म दिखाती है छात्र राजनीति दरअसल राष्ट्रीय राजनीति की प्रयोगशाला है।
छात्र राजनीति पर आधारित अन्य उल्लेखनीय फ़िल्मों में गुलाल (अनुराग कश्यप), हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी (सुधीर मिश्रा), युवा (मणि रत्नम), आरक्षण (प्रकाश झा) और दिल दोस्ती इत्यादि (मनीष तिवारी) शामिल हैं। फिर भी ‘हासिल’ अपनी अलग पहचान गढ़ती है.. और इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:
1. संवाद: ज़मीन से जुड़ी भाषा की ताक़त
‘हासिल’ के संवाद फ़िल्म की सबसे बड़ी शक्ति हैं। एक भी संवाद अनावश्यक नहीं लगता। रिक्शेवाले का यह कहना- “रिक्शा नयी है, सजाएँगे नहीं तो रूठ नहीं जाएगी”- न केवल उसके चरित्र को जीवंत बनाता है, बल्कि इलाहाबाद को भी एक जीवित किरदार की तरह स्थापित करता है।

“BSc कि BA बे?” के जवाब में रुआंसे गले से बोलना, “Bsc कहाँ? BA”.. जैसे छोटे संवाद हिंदी पट्टी में विषय-चयन से जुड़ी सामाजिक मानसिकता को उजागर करते हैं। रणविजय का कहना- “लड़की जो है, आदमी से प्यार करती है और आदमी में वीरता नहीं है तो वो आदमी आदमी नहीं है”.. पितृसत्तात्मक समाज में ‘मर्दानगी’ की परिभाषा पर टिप्पणी है।
“वो साले गुंडे हैं, सरकारी गुंडे हैं। हम क्रांतिकारी हैं, गुरिल्ला वार किया जाएगा”.. यह पंक्ति सत्ता और प्रतिरोध के बीच की रेखा को स्पष्ट करती है।
और जब अंग्रेज़ी में फ़ेल हुए छात्र के प्रसंग में रणविजय कहता है- “काहे नही पढ़ेगा अंग्रेज़ी बे! अंग्रेज़ी किसी के बाप की है क्या?”… तो वह अंग्रेज़ी को लेकर हिंदी पट्टी की आकांक्षाओं को उजागर करता है, जहाँ लड़के कॉम्पटिशन में अंग्रेज़ी में सबसे कम स्कोर कर पाते हैं!
ऐसे संवादों के माध्यम से तिग्मांशु ने पूरी फ़िल्म की आत्मा को शब्द दिये हैं।
2. चरित्र निर्माण: ग्रे शेड का इरफ़ान
रणविजय सिंह का चरित्र हिंदी सिनेमा के यादगार किरदारों में गिना जाता है। ‘हासिल’ और ‘चरस’, वह एक साथ नायक भी है और खलनायक भी। तिग्मांशु और इरफ़ान के रचनात्मक तालमेल ने इस किरदार को परतदार बनाया। तिग्मांशु की फ़िल्मों जैसे पान सिंह तोमर या साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स में भी इरफ़ान ग्रे शेड वाले किरदार में ही हैं। इसके अलावा ‘हासिल’ में सिर्फ़ मुख्य पात्र ही नहीं, बल्कि छोटे किरदार जैसे रिक्शेवाला, अख़बार वाला, पुलिसवाला, गैंग के सदस्य… सब विस्तार से गढ़े गये हैं। जैसे जैक्सन, गुंडागर्दी के धंधे में भी अंग्रेज़ी बोलने से एक अहमियत पाता है। (वैसे अंग्रेज़ी बोलने वाला ही धोखा देता है, यह महज़ संयोग होगा और इस मेटाफ़र को तो तिग्मांशु ही समझा सकते हैं)
सबसे अहम किरदार है- इलाहाबाद। हासिल के संवाद और बोलने के लहजे इसमें मदद तो करते हैं लेकिन ख़ास है वो दृश्य, जो इलाहाबाद की तासीर है। जैसे प्रेमी-प्रेमिका का ख़ाली पड़े सिनेमा हॉल में मिलना, कैम्पस में गौरीशंकर का लड़कों को सम्बोधित करना, छुपने के लिए भी सिनेमा हॉल का उपयोग, देर होने पर निहारिका का अनिरुद्ध को साथ चलने को कहना, वोट के लिए अग्नि की शपथ दिलाना और क्लाइमेक्स कुम्भ मेले में शूट करना। इसके अलावा छात्र राजनीति में इलाहाबाद को एपिसेंटर की तरह इस तरह किसी फ़िल्म ने नही दिखाया।
3. प्रेम कथा: छोटे शहर का असली प्यार
अनी और निहारिका का प्रेम प्रसंग वो उबाऊ कहानी नहीं है, जिसमें लड़का-लड़की मिलते हैं, नोक-झोंक होती है, ढेर सारी ग़लतफ़हमियां होती हैं, वग़ैरह-वग़ैरह। यह प्यार एक छोटे शहर का प्यार है। मिलना तो दूर, एक-दूसरे को चिट्ठी लिखने के लिए मशक़्क़त करनी पड़ती है। अख़बार वाले की मदद लेनी पड़ती है। यहाँ लड़कियों पर हर वक़्त दस तरीक़े के पहरे लगे होते है। लड़की का दूर का भाई भी अपने आपको उसका अभिभावक समझता है। मिलने के लिए तमाम हथकंडे अपनाये जाते हैं, तब जाकर बमुश्किल दो मिनट से ज़्यादा की मुलाक़ात नही होती। इन दो मिनटो में ही दोनों प्रेमियों को एक-दूसरे से तमाम बातें कहनी हैं। ये बेचैनी, ये तड़प अन्नी के उस ऐक्ट में दिखती है जब वह निहारिका को देखकर घबराया हुआ होता है और उसी घबराहट में वो निहारिका को चूम लेता है। और फिर उसी शिद्दत से सॉरी भी बोलता है।
दोनों बमुश्किल ही मिल पाते हैं, फिर भी दोनों का प्यार परवान चढ़ता है। इस प्यार की कहानी में सिर्फ़ दो लोग नहीं होते हैं। माँ, बाप, भाई के अलावा यहाँ दोस्त है। कुछ इन्हें रोकते हैं तो कुछ मदद करना चाहते हैं। इस प्यार की कहानी में अख़बारवाला भी है। इस प्यार में पर्फ़्यूम वाली चिट्ठी और टेलिफ़ोन की घंटी भी है। यही वजह है इस प्यार से हम कनेक्ट कर पाते हैं। हालाँकि फ़िल्म में तीन रोमांटिक गाने हैं, जो थोड़ा ड्रामा जोड़ते हैं लेकिन वो कथानक की वास्तविकता को नुक़सान नही पहुँचाते।
इन तमाम फ़ैक्टरों ने ‘हासिल’ को एक मील का पत्थर बनाया। इरफ़ान को इरफ़ान बनाया। तिग्मांशु को तिग्मांशु बनाया। ‘हासिल’ वो वजह है, जिसकी वजह से इरफ़ान आज न होकर भी हमारे बीच हैं। और ‘हासिल’ ही वो वजह है, जो न होती तो हम कैसे कह पाते- “वी लाइक दैट आर्टिस्ट!”
‘हासिल’ को इस तरह भी समझा जाना चाहिए कि इसके बाद इस तरह के सिनेमा ने एक गति, एक विश्वास हासिल किया, जो लोकल की जड़ों को पकड़कर भी ग्लोबल अपील पैदा करता है। ‘लोकल इज़ ग्लोबल’ के सियासी नारे से पहले ‘हासिल’ ने यह कारनामा किया और ऐसी एक लेगेसी तैयार भी की। लीक से अलग अपील रखने वाले कलाकारों के लिए आज अगर रास्ते और मौक़े बहुतायत में नज़र आ रहे हैं, तो तिग्मांशु और इरफ़ान की ‘हासिल’ को भी इसका एक बड़ा श्रेय तो दिया ही जा सकता है।
और यह ट्रिविया भी…
गानों को लेकर ‘हासिल’ की कम बात होती है। जबकि “अब घर आजा” एक अंडररेटेड गाना है। इसके अलावा जब निहारिका, अनिरुद्ध से मिलने, बुर्क़े में, सिनेमा हॉल जाती है तो बैकग्राउंड में एक गाना बज रहा होता है- “सुन री सखी जिया क्यूँ घबराये!” लेकिन ऐसा पहली बार है कि इतना उम्दा गाना फ़िल्म में होने के बाद भी न उसका कहीं कोई क्रेडिट है, न ज़िक्र है और न ही वो गाना कहीं पूरा उपलब्ध है। हालांकि तमिल में इसका ओरिजनल गाना, ‘उयिर वाज़वधी’ तमिल फ़िल्म थूंडिल thoondil में सुना जा सकता है, जिसे के.एस. अधीयमन ने लिखा है।

मानस
विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।
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