‘क्वीन’ के बाद: हिंदी सिनेमा में स्त्री का पुनर्लेखन

‘हिंदी की ज़मीनें’ अंक में प्रसंगवश… इस स्तंभ में 21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की...

साहित्य जनमत बनाने के सिवा करे भी क्या: असग़र वजाहत

“साथ, यक़ीं, वाबस्तगी, बिकने थे बेदाम/ आज़ादी जो रख दिया, बंटवारे का नाम”… 1947 में विभाजन की क़ीमत पर आज़ादी मिली। आज हम कितने आज़ाद हैं और कितने विभाजित?...

सिनेमा को ‘वैचारिक’ बनाने वाला पहला फ़िल्मकार

पहले विश्वयुद्ध के बीच रूस की क्रांति ने एक फ़िल्मकार को उभारा, जिसने पहली बार सिनेमा को वैचारिकी का माध्यम बनाने का सफ़र शुरू किया। इस सफ़र में वह...

‘मुल्क’ से बदलते सिनेमा का अनुभव

सिनेमा जगत में एक ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी आज़ादी का माहौल है तो दूसरी ख़ास तरह की फ़िल्मों के लिए पूरी पाबंदी का। इस बीच एक...

ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?

नियमित कॉलम भवेश दिलशाद की कलम से…. ओडिसी: इस वक़्त महाकाव्य का पुनर्पाठ?              महाकाव्यों का सबसे बड़ा विरसा होता है कि ये देश...

अवतार कौल: यह क़ाबिल डायरेक्टर याद है आपको?

पुस्तक चर्चा ज़ाहिद ख़ान की कलम से…. अवतार कौल: यह क़ाबिल डायरेक्टर याद है आपको?            हिन्दी सिनेमा में जब भी समानान्तर सिनेमा की बात...

लगान: क्या है उपलब्धि और विरासत?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...

विक्की डोनर: एक फ़िल्म से बनी कई की राह

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण …...

ईरानी सिनेमा में प्रतिरोध और मानवतावाद

प्रासंगिकता के चलते आब-ओ-हवा पर प्रस्तुति के लिए ‘हम देखेंगे’ पत्र से विशेष रूप से प्राप्त, ईरानी सिनेमा पर यह चर्चा सुधन्वा देशपांडे की कलम से निकली है, जिसका...

दुर्लभ भारतीय फिल्म क्यों है ‘आँखों देखी’?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...
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