ईरानी सिनेमा में प्रतिरोध और मानवतावाद

प्रासंगिकता के चलते आब-ओ-हवा पर प्रस्तुति के लिए ‘हम देखेंगे’ पत्र से विशेष रूप से प्राप्त, ईरानी सिनेमा पर यह चर्चा सुधन्वा देशपांडे की कलम से निकली है, जिसका...

दुर्लभ भारतीय फिल्म क्यों है ‘आँखों देखी’?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...

चार्ली चैपलिन: परदे के पीछे की पूरी कहानी

पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से…. चार्ली चैपलिन: परदे के पीछे की पूरी कहानी नमस्कार साथियो, कैसे हैं आप सब? दोस्तो, सिनेमा – विश्वकथा की शृंखला में हम...

सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन

पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से…. सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन        दृश्य-श्रव्य माध्यमों, विशेषतः सिनेमा और टेलीविज़न, में व्यंग्य की भूमिका पर...

विश्व-सिनेमा की पहली महिला फिल्मकार

पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से…. विश्व-सिनेमा की पहली महिला फिल्मकार           नमस्कार साथियो, उम्मीद है आपको विश्व सिनेमा के इतिहास की यह सीरीज़...

फिल्म नहीं केस स्टडी है ‘कोई मिल गया’

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण …...

जब सिनेमा बेकरार था कि सत्यजीत रे आएं…

गूंज बाक़ी… सत्यजीत रे (02.05.1921-23.04.1992) की याद के दिन एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़। 1980 में नैशनल बुक ट्रस्ट से छपी किताब ‘सत्यजीत राय का सिनेमा’, लेखक चिदानंद दास गुप्ता और...

क्यों प्रासंगिक बनी हुई है ‘हज़ारों ख़्वा​हिशें ऐसी’?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण… पाक्षिक...
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