dangers challenges for our ai sovereignty blog by jayjeet
पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

क्या संकट में है हमारी एआई सम्प्रभुता?

           पहले यूक्रेन, फिर वेनेज़ुएला और अब ईरान। साम्राज्यवादी महाशक्तियों को जो देश पसंद नहीं है, उनकी सम्प्रभुता ख़तरे में है। कल अगर चीन के हाथों ताईवान की सम्प्रभुता भी कुचल दी जाये तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

बेशक, किसी भी राष्ट्र की सम्प्रभुता (Sovereignty) की रक्षा के लिए टैंक, मिसाइलें, फ़ाइटर जेट, पनडुब्बियां सब ज़रूरी हैं और इसीलिए हथियारों की ख़रीद-फ़रोख़्त बढ़-चढ़कर जारी है। सिपरी की 2026 की ताज़ी रिपाेर्ट भी आ गयी है, जो बताती है 2020 से 2025 के दौरान हथियारों की ख़रीदी में क़रीब 9.2 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। लेकिन केवल विध्वंसक और आधुनिकतम हथियार ही किसी देश की सम्प्रभुता की गारंटी नहीं हो सकते। यह दौर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का है और इस दौर में अब सम्प्रभुता देशों की भौतिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं रह गयी है।

सम्प्रभुता (जिसे यहां हम ‘एआई सम्प्रभुता’ कह सकते हैं) की रक्षा के लिए हमें टैंक, मिसाइलों, फ़ाइटर जेट्स, पनडुब्बियों से इतर तीन हथियार और चाहिए- अपना डेटा जिस पर केवल हमारा नियंत्रण हो, अपना एल्गोरिद्म और अपना कॉग्नीटिव इन्फ़्रास्ट्रक्चर यानी वह ढांचा जिस पर हमारा पूरा एआई सिस्टम काम करे। इस कॉग्नीटिव इन्फ़्रास्ट्रक्चर में डेटा सेंटर्स से लेकर क्लाउड सर्वर सर्विसेज़ शामिल हैं।

अगर आप एक एआई कंट्री के तौर पर आगे बढ़ना चाहते हैं, हर फ़ील्ड में एआई का इस्तेमाल करना चाहते हैं, लेकिन उक्त तीन चीज़ें आपके नियंत्रण में नहीं हैं तो इसका मतलब है आप अपने देश की एआई सम्प्रभुता को गिरवी रखने जा रहे हैं। एआई सम्प्रभुता के संकट में होने का एक नतीजा अपनी भौगोलिक सम्प्रभुता को ख़तरे में डालना भी हो सकता है।

क्या है एआई सम्प्रभुता?

आईबीएम थिंक की स्टीफ़ेनी सुसनज़ारा के मुताबिक एआई संप्रभुता का अर्थ है किसी राष्ट्र या संस्था की अपनी एआई तकनीक के पूरे ‘स्टैक’ (Stack) पर नियंत्रण रखने की क्षमता।

एआई की दुनिया में ‘स्टैक’ का मतलब होता है तकनीकी परतों का वह सेट, जिस पर पूरा एआई सिस्टम काम करता है। इसको आसान तरीक़े से समझने के लिए एक मकान का उदाहरण लिया जा सकता है। अगर आपको मकान बनाना है, तो इसके लिए नींव, कॉलम व बीम की बुनियादी संरचना ज़रूरी है। फिर दीवारों व छत के बग़ैर मकान पूरा नहीं होगा। बुनियादी संरचना और दीवारों-छताें के अलावा बिजली की वायरिंग, बाथरूम फ़िटिंग्स वगैरह की ज़रूरत भी होगी, क्योंकि इनके बिना मकान का कोई औचित्य नहीं रहेगा। जब इन तीनों चीज़ों पर आपका अधिकार होगा, तभी आप सुकून से अपने घर में रह सकेंगे।

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आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सिस्टम भी इसी तरह से बनता है और काम करता है। सुपरकंप्यूटर, पावरफ़ुल चिप्स और सर्वर को बुनियादी ढांचा कह सकते हैं। डेटा और विभिन्न मॉडल्स (जैसे एलएलएम मॉडल्स) दीवारों तथा छतों का काम करते हैं। चैटबॉट्स, ऐप्स और इन ऐप्स का इंटरफ़ेस जैसी चीज़ें आपके एआई सिस्टम को कार्य करने में सक्षम बनाती हैं। अगर ये तीनों आपके नियंत्रण में हैं, तभी आप मान सकते हैं कि आपकी एआई की सत्ता महफ़ूज़ है।

एआई मामलों के विशेषज्ञ डेनिज़ केन्जिज़ इससे जुड़े ख़तरे को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं: ‘भले ही देश के अहम फ़ैसले देश के भीतर लिये जा रहे हैं, लेकिन अगर आपके डेटा का प्रवाह विदेशों में हो रहा है; आपके देश के बच्चों की शिक्षा विदेशी एल्गोरिद्म के ज़रिये हो रही है; आपके डॉक्टर, न्यायाधीश और नौकरशाह इन प्रणालियों पर भरोसा कर रहे हैं, तो यहीं एआई की सम्प्रभुता पर असली संकट है।’ और एआई की सम्प्रभुता का संकट आगे चलकर पूरे देश की सरहदी सम्प्रभुता को भी लील ले तो क्या आश्चर्य!

डेनिज़ का मानना है जो डेटा आप पैदा करते हैं, यदि उनका संकलन (डेटा सेंटर) और उनका विश्लेषण (एआई मॉडल्स) कोई और करता है, तो इस बात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि वही डेटा किसी दिन आपके ही ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर लिया जाये। जियो पाेलिटिक्स में यह आम है और आज की अनिश्चितता से भरी जियो पाेलिटिक्स में तो इसके ख़तरे और भी बढ़ गये हैं। अगर अल्फ़ाबेट, माइक्रोसॉफ़्ट, मेटा और अमेज़न जैसी कंपनियां अपने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ढांचे पर अरबों डॉलर ख़र्च कर रही हैं तो सम्प्रभुता का संकट और विकट नज़र आने लगता है। (ग़ौरतलब है कि इन चारों कंपनियों ने 2026 में 700 अरब डॉलर ख़र्च करने की योजना बनायी है। यह धनराशि भारत के कुल बजट और दुनिया के नीचे के 85 फ़ीसदी देशों की सकल जीडीपी से भी अधिक है।)

क्या भारत एआई सम्प्रभु है?

अगर हमारी एआई की सम्प्रभुता को उक्त कसौटियों पर परखा जाये, तो इस सवाल का सीधा जवाब है- नहीं। शायद एआई सम्प्रभुता हमारी चिंताओं में शामिल भी नहीं है। अभी तो हमारा एक ही लक्ष्य है- एआई का हर जगह यथासंभव अधिक से अधिक इस्तेमाल करना। हाल ही दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में भी प्रधानमंत्री ने यह कहकर कि भारत न केवल नयी प्रौद्योगिकियों का निर्माण करता है, बल्कि उन्हें अभूतपूर्व गति से अपनाता भी है, दर्शा दिया है कि हम इनका आलिंगन करने को लेकर अति उत्सुक हैं, बनिस्बत इन्हें सुरक्षित बनाने के। शायद विपक्ष भी इसको लेकर जागरूक नहीं है, अन्यथा एआई समिट में यूथ कांग्रेसियों का प्रदर्शन अमेरिका के साथ ट्रेड डील के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि एआई सम्प्रुभता के मसले पर होता।

वैसे एआई सम्प्रभुता का मसला आज आया है, लेकिन डिजिटल सम्प्रभुता को लेकर ख़तरे तो एक दशक से बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील और साइबर क़ानूनों के विशेषज्ञ विराग गुप्ता ने अपनी किताब ‘डिजिटल क़ानूनों से समृद्ध भारत’ में बड़े विस्तार से समझाया है कि जो डिजिटल क्रांति भारत के लिए वरदान बन सकती थी, वही आज हमारी संप्रुभता के लिए श्राप बन सकती है और इसकी वजह है डिजिटल संबंधी नियम-क़ायदों को लागू करने में हमारी सरकारों की नाकामयाबी। हमने डेटा सुरक्षा क़ानून 2023 में ही पारित कर दिया था, लेकिन इस पर आज तक अमल नहीं हो पाया है।

डिजिटल इंडिया के बाद से ही आधार, यूपीआई और डिजिटल भुगतान के कारण रोज़ाना अरबों डेटा पॉइंट तैयार होते हैं। फिर वाट्सऐप जैसे ऐप्स पर बेशुमार डेटा है। इसका बड़ा हिस्सा अभी भी विदेशी क्लाउड प्रोवाइडर्स (अमेज़न वेब सर्विसेज़, गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट आदि) के सर्वर पर स्टोर होता है, भले ही उनके डेटा सेंटर भारत की ज़मीन पर हों। कई भारतीय कंपनियां अपने एआई एप्लिकेशन के लिए विदेशी मॉडल्स और प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करती हैं। ऐसे में हमारा डेटा हमारे नियंत्रण में तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि हम इसके लिए अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाते। और यह इच्छाशक्ति हम तभी दिखा पाएंगे, जब हमारे कर्णधारों को इसके ख़तरों का भान होगा या वे इन्हें समझने का प्रयास करेंगे।

केवल डेटा ही चिंता का विषय नहीं!

वैसे सम्प्रभु एआई के लिए केवल डेटा और मॉडल ही पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए भारी कंप्यूटिंग शक्ति और एआई चिप्स की ज़रूरत होती है। भारत में डेटा सेंटर बढ़ रहे हैं, लेकिन उच्च स्तरीय एआई कंप्यूटिंग के लिए अब भी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है। जैसे एआई ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली अधिकांश एडवान्स्ड चिप्स एन्वीडिया बनाती है। वैसे एन्वीडिया जैसी कंपनियों पर केवल भारत ही नहीं, कई अन्य देश भी निर्भर हैं। तो यह साझा चिंता का विषय भी होना चाहिए। आख़िर, सम्प्रभुता के सकंट से तो पूरी दुनिया ही गुज़रने वाली है!

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

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