
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
बदलती परिभाषा! प्रश्न करना विज्ञान-विरोध नहीं
जो शुरूआत बेहतर पहचान (detection) से हुई थी, वह धीरे-धीरे स्वयं “रोग” की परिभाषा को बदलने में बदल गयी है। जिसके गहरे जैविक, नैतिक और मानवीय परिणाम हैं। क्लासिकल पैथोलॉजी हमें क्या सिखाती है?
क्लासिकल पैथोलॉजी में रोग को मेज़बान (host) की संरचनात्मक या कार्यात्मक गड़बड़ी की अवस्था के रूप में समझा जाता था, जो लक्षणों, संकेतों या सामान्य शरीर-क्रिया में मापनीय बाधा के रूप में प्रकट होती थी। केवल किसी रोगजनक (pathogen) की उपस्थिति को तब तक रोग नहीं माना जाता था, जब तक वह स्पष्ट रूप से कार्यात्मक क्षति उत्पन्न न करे। संक्रमण (infection), वहन/वाहक अवस्था (carriage) और बीमारी (illness) को स्पष्ट रूप से अलग-अलग माना जाता था।
चित्र 1. पैथोलॉजी के मूल सिद्धांतों के अनुसार, मेज़बान और रोगजनक के बीच तीन गतिशील अवस्थाएँ हो सकती हैं, जो पर्यावरण द्वारा आकार लेती हैं।

केवल रोगजनक की उपस्थिति, या उसका समाप्त हो जाना, अपने आप में न तो रोग को परिभाषित करता है और न ही स्वास्थ्य को। अवस्थाएँ A और B को रोग नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि यह तंत्र प्रत्यावर्ती (reversible) है और मेज़बान की प्रतिरक्षा तथा पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार यह स्पष्ट रोग, रोगजनक की समाप्ति, या दीर्घकालिक सुप्तावस्था/वाहक अवस्था की ओर बढ़ सकता है।
अतः केवल रोगजनक की पहचान (detection) रोग नहीं है, और केवल रोगजनक का उन्मूलन स्वास्थ्य नहीं है- जब तक इसके साथ नैदानिक लक्षण या कार्यात्मक क्षति न हो।
रोग की आधुनिक पुनर्व्याख्या मुख्यतः पैथोलॉजी से नहीं, बल्कि स्क्रीनिंग-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी-विज्ञान से उत्पन्न हुई। 1968 में WHO की स्क्रीनिंग रूपरेखा एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने जोखिमपूर्ण अवस्थाओं और प्रारंभिक पहचान को हस्तक्षेप के लक्ष्य के रूप में परिभाषित किया। बाद में इसे साक्ष्य-आधारित चिकित्सा (EBM) ने और मज़बूत किया तथा आणविक निदान तकनीकों ने तेज़ कर दिया, जिससे बीमारी के बिना भी जैविक संकेतों की अत्यंत संवेदनशील पहचान संभव हो गयी।
इन विकासों को अक्सर वैज्ञानिक प्रगति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परंतु क्या ये हमेशा जैविक वास्तविकता को प्रतिबिंबित करते हैं? यह एक खुला प्रश्न है।
समय के साथ तकनीकी सफलता ने एक वैचारिक उलटफेर पैदा कर दिया: पहचान (detection) स्वयं रोग का स्थान लेने लगी। कुछ “मिल जाना” ही यह संकेत देने लगा कि कुछ “ग़लत” है। रोग एक जीवित जैविक विफलता से बदलकर एक मापनीय संकेत बन गया।
रोग एक अवस्था है, संकेत नहीं
क्लासिकल पैथोलॉजी में – रुडोल्फ़ विरचो और विलियम ऑस्लर जैसे विचारकों द्वारा स्थापित – रोग को मेज़बान की संरचनात्मक या कार्यात्मक गड़बड़ी के रूप में परिभाषित किया गया था, जो लक्षणों, संकेतों या मापनीय शारीरिक क्षति के रूप में प्रकट होती है। पैथोलॉजी यह भी मानती थी कि मेज़बान–रोगजनक अंतःक्रियाएँ गतिशील होती हैं और पर्यावरण से प्रभावित होती हैं, जिससे परिणाम स्पष्ट बीमारी से लेकर स्वतः समाप्ति या दीर्घकालिक सुप्तावस्था तक हो सकते हैं।
अतः केवल रोगजनक की पहचान रोग नहीं है और केवल उसका उन्मूलन स्वास्थ्य नहीं है। जब तक इसके साथ नैदानिक लक्षण या कार्यात्मक क्षति न हो।
फिर भी आज, केवल एक सकारात्मक परीक्षण रिपोर्ट किसी स्वस्थ व्यक्ति को रोगी बना सकती है- भले ही कोई पीड़ा या कार्यात्मक गड़बड़ी न हो। मूल प्रश्न अक्सर पूछा ही नहीं जाता… क्या केवल रोगजनक की उपस्थिति को ही रोग कहा जा सकता है? जैविकी इसका उत्तर ‘नहीं’ में देती है। मानव शरीर निष्क्रम (sterile) तंत्र नहीं है। सूक्ष्मजीव लगभग हर समय हमारे भीतर रहते हैं। रोग केवल आक्रमण से नहीं, बल्कि मेज़बान, रोगजनक और पर्यावरण के बीच संतुलन के टूटने से उत्पन्न होता है।
रोग-परिभाषा में यह बदलाव क्यों, कब और किस अधिकार से हुआ? यह स्पष्ट नहीं है।
स्पष्टता के लिए, यह चर्चा रोग (अनुभूत कार्यात्मक गड़बड़ी) को जोखिम (संभावना) से, तथा पहचान (मापन) को बीमारी (अनुभव की गई पीड़ा) से अलग करती है।
मैं चिकित्सीय परीक्षणों को लेकर सावधान हूँ- विज्ञान के विरोध में नहीं, बल्कि इसलिए कि मैंने देखा है कि जब परीक्षण बिना वास्तविक आवश्यकता और सावधानी के किये जाते हैं, तो वे नुकसान पहुँचा सकते हैं।
जब परिभाषाएँ बदलती हैं, तो आँकड़े बदलते हैं
ये परिवर्तन केवल अकादमिक नहीं थे। जैसे-जैसे रोग की परिभाषाएँ और नैदानिक सीमाएँ बदलीं, वैसे-वैसे बहुत अधिक लोगों को “बीमार” का लेबल मिलने लगा.. भले ही उनके दैनिक कार्य में कोई वास्तविक बाधा न हो। 1970 के दशक में अधिकांश लोग तभी बीमार माने जाते थे जब स्पष्ट लक्षण या विकलांगता होती थी। आज बड़ी आबादी बिना बीमार महसूस किये भी एक या अधिक चिकित्सीय निदान ढो रही है।
उदाहरण के लिए, थायरॉयड कैंसर के निदान कई देशों में 1970 के दशक से लगभग 10-15 गुना बढ़ गये हैं— मुख्यतः अल्ट्रासाउंड और बायोप्सी के कारण— जबकि इससे होने वाली मृत्यु लगभग अपरिवर्तित रही है। PSA परीक्षण के बाद प्रोस्टेट कैंसर के निदान तेज़ी से बढ़े, पर मृत्यु दर में बहुत कम बदलाव हुआ। क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ आज प्रयोगशाला कट-ऑफ़ के आधार पर 10-15% वयस्कों में बतायी जाती है, जबकि अधिकांश लोग कभी किडनी फ़ेल्योर तक नहीं पहुँचते। गर्भावधि मधुमेह (Gestational diabetes) की दरें नैदानिक मानदंड बदलने के बाद दो से तीन गुना बढ़ गयी हैं, बिना गंभीर गर्भावस्था जटिलताओं में समान वृद्धि के।
जनसंख्या स्तर पर यह बदलाव और भी स्पष्ट है। 1970 के दशक में पाँच में से एक से भी कम वयस्क किसी दीर्घकालिक रोग के निदान के साथ रहते थे। आज कई आबादियों में आधे से अधिक वयस्कों को कम से कम एक दीर्घकालिक रोग का लेबल दिया गया है। अक्सर परीक्षण परिणामों या जोखिम चिह्नकों के आधार पर, न कि वास्तविक अनुभव की गयी बीमारी के आधार पर।
यह दर्शाता है कि रोग-परिभाषाओं का विस्तार वास्तविक पीड़ा या विकलांगता के बोझ से कहीं तेज़ी से “मरीज़ों” की संख्या बढ़ा रहा है।

चित्र 2. विश्व जनसंख्या वृद्धि और वैश्विक फ़ार्मास्यूटिकल बाज़ार विस्तार (1990–2025) के बीच विचलन।
इस अवधि में विश्व जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ी, जबकि वैश्विक फ़ार्मा बाज़ार कहीं अधिक तीव्र गति से फैला। यदि रोग-भार केवल जनसंख्या के अनुपात में बढ़ता, तो दोनों वक्र लगभग समानांतर चलते। इनका विचलन यह दर्शाता है कि बाज़ार वृद्धि का मुख्य चालक रोग की परिभाषा का विस्तार, जोखिम का लेबलिंग और “प्री-डिज़ीज़” की दीर्घकालिक प्रबंधन-प्रणाली है- न कि वास्तविक अनुभव की गयी बीमारी में समानुपाती वृद्धि।
परीक्षण हमेशा तटस्थ नहीं होते
चिकित्सीय प्रक्रियाओं को अक्सर हानिरहित माना जाता है, पर वे हमेशा जैविक रूप से तटस्थ नहीं होतीं।
जब असामान्य या कैंसरग्रस्त कोशिकाएँ पहले से मौजूद हों, तो बायोप्सी या बार-बार छेड़छाड़ जैसी प्रक्रियाएँ स्थानीय चोट, सूजन या जटिलताएँ उत्पन्न कर सकती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि परीक्षण “कैंसर पैदा करते हैं,” पर यह अवश्य है कि नाज़ुक ऊतक को छेड़ना जोखिम-मुक्त नहीं है। जैविकी चोट, दबाव और हस्तक्षेप पर प्रतिक्रिया देती है और ये प्रतिक्रियाएँ हमेशा पूर्वानुमेय नहीं होतीं।
कुछ इमेजिंग परीक्षण भी शरीर पर दबाव डालते हैं। मेमोग्राफ़ी में स्तन ऊतक को ज़ोर से दबाया जाता है, जो असुविधाजनक होता है और पहले से संवेदनशील ऊतक को प्रभावित कर सकता है। CT स्कैन और एक्स-रे आधारित परीक्षण विकिरण देते हैं, जो समय के साथ जमा होता है। भले ही प्रत्येक ख़ुराक “कम” मानी जाये, बार-बार का संपर्क पूरी तरह हानिरहित नहीं होता, विशेषकर उन लोगों में जिन्हें परीक्षण से कभी वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा। MRI में विकिरण नहीं होता, पर यह अक्सर छोटे, निरापद असामान्यताओं को पकड़ लेता है, जो चिंता, दोबारा परीक्षण और कभी-कभी अनावश्यक प्रक्रियाओं की शृंखला शुरू कर देती है।
जब परीक्षण व्यवसाय बन जाता है
सबसे चिंताजनक यह है कि व्यवहार में परीक्षणों का दुरुपयोग कैसे होता है। कई जगहों पर जाँच इसलिए नहीं करायी जाती कि रोगी स्पष्ट रूप से बीमार है, बल्कि इसलिए कि परीक्षण से आय होती है, डॉक्टर को क़ानूनी सुरक्षा मिलती है, या आगे के हस्तक्षेप को उचित ठहराया जा सके। बीमारी को स्पष्ट करने का उपकरण व्यवसाय का साधन बन जाता है।
स्वस्थ लोगों को रोगी बना दिया जाता है, डर पैदा किया जाता है और उपचार शुरू हो जाता है, भले ही कोई वास्तविक रोग न हो। यह स्वास्थ्य सेवा नहीं, शोषण है।
समकालीन विद्वान भी यही कहते हैं – ये चिंताएँ अलग-थलग नहीं हैं।
- • जॉन इओनिडिस ने दिखाया है कि विस्तारित परीक्षण और पक्षपाती साक्ष्य रोग-भार को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं, बिना परिणाम सुधार के।
- • गिल्बर्ट वेल्च ने दिखाया है कि स्क्रीनिंग कैसे स्वस्थ लोगों को रोगी में बदल देती है।
- • आयोना हीथ और ट्रिश ग्रीनहाल्घ ने दिखाया है कि चिकित्सा कैसे जोखिम को बीमारी समझने लगी है।
- • एलन फ्रांसिस ने चेताया है कि निदान का विस्तार सामान्य विविधता को रोग घोषित कर “झूठी महामारियाँ” पैदा करता है।
यह कोई हाशिये की सोच नहीं है। यह निदान-अधिकता (overdiagnosis) की एक बढ़ती हुई, साक्ष्य-आधारित आलोचना है।
आज यह प्रवृत्ति केवल पुस्तकों में नहीं, सार्वजनिक विमर्श में भी दिखती है। जब कोई व्यक्ति चिकित्सा सहमति पर प्रश्न उठाता है- सुरक्षा, गति, अनिश्चितता या अनुपातिकता पर- तो उत्तर बहस नहीं, बल्कि आक्रोश होता है। प्रश्न पूछना ही “विज्ञान-विरोध” मान लिया जाता है।
यह प्रतिक्रिया स्वयं में बहुत कुछ उजागर करती है। जब चिकित्सा निष्कर्ष नीति और पहचान-आधारित निश्चितता में बदल जाते हैं, तो वे आलोचना से बचाये जाने लगते हैं। जोखिम को बीमारी, सावधानी को इनकार और बहस को ख़तरा मान लिया जाता है।
जोखिम बीमारी नहीं है
स्क्रीनिंग, अपने स्वरूप में, जैविक अवस्थाओं को पकड़ती है- जीवन में अनुभव की गयी पीड़ा को नहीं। वह यह विश्वसनीय रूप से नहीं बता सकती कि कौन स्वतः ठीक हो जाएगा, कौन कभी प्रगति नहीं करेगा और कौन वास्तव में हानि के जोखिम में है।
परिणामस्वरूप, पहचान एक बाध्यता बन जाती है: जोखिम निदान बन जाता है, निगरानी हस्तक्षेप बन जाती है, और जैविक विविधता तात्कालिकता में बदल जाती है। चिकित्सा रोगियों की देखभाल से हटकर जनसंख्या के प्रशासन की ओर खिसकने लगती है।
जोखिम स्वयं रोग नहीं है। वह जीवन की अनिवार्य अवस्था है। जब जोखिम का चिकित्साकरण होता है, तो सामान्य जीवन एक चिकित्सीय समस्या बन जाता है और स्वास्थ्य एक स्थिर अवस्था के रूप में अपना अर्थ खो देता है।
स्वास्थ्य संतुलन है। रोग संकेतों की उपस्थिति नहीं है, और स्वास्थ्य जोखिम की अनुपस्थिति नहीं है। रोग कार्य, अनुकूलन और संतुलन की विफलता की अवस्था है।
कई लोगों के लिए आज “रोग” का पहला लक्षण दर्द या विकलांगता नहीं, बल्कि एक परीक्षण रिपोर्ट होती है।
यह तर्क क्या है — और क्या नहीं
यह चिकित्सा विज्ञान या निवारक देखभाल का विरोध नहीं है। यह “मार्कर-अब्सोल्यूटिज़्म” का विरोध है- यानी यह मान लेना कि केवल पहचान ही रोग, पूर्वानुमान या हस्तक्षेप की आवश्यकता तय कर देती है। जब चिकित्सा यह भेद भूल जाती है, तो वह व्यक्तियों को ठीक करने के बजाय आबादी को शासित करने की ओर बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य-सेवा का लक्ष्य हर जोखिम को समाप्त करना या हर विचलन को पकड़ना नहीं होना चाहिए, बल्कि जहाँ संतुलन टूटा है वहाँ उसे पुनर्स्थापित करना और स्वस्थ लोगों को अनावश्यक रूप से छोड़ देना होना चाहिए।
स्वास्थ्य संकेतों की अनुपस्थिति नहीं है।
रोग जोखिम की उपस्थिति नहीं है।
जैविकी नियति नहीं है।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
