
- March 25, 2026
- आब-ओ-हवा
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आदित्य की कलम से....
एपिस्टीन फ़ाइल की गूंज बनाम भयंकर धमाके
विदेशी मीडिया द्वारा एपिस्टीन को एक घृणित अपराधी के रूप में बताया जा रहा है, जिसने जघन्य अपराध किये थे। भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया असमंजस में है कि इस मामले में क्या स्टैंड ले! दुनिया के प्रभावशाली लोगों से एपिस्टीन के गहरे संबंध थे, ये सभी उसके दरबार में हाज़िरी लगाते थे; और उसके पास अकूत दौलत थी जिसके आगे हमारा मीडिया साष्टांग दंडवत होता है। अगर वह ज़िंदा होता तो मीडिया उसकी हरकतें देखते हुए “जगतगुरु” घोषित कर चुका होता और कार्पोरेट की नौकरी करते हुए अपनी पेंशन का इंतज़ाम भी।
अमेरिका का जस्टिस डिपार्टमेंट एपिस्टीन की करतूतों को प्रकाशित न करने के भारी दबाव के बावजूद सार्वजनिक किये जा रहा है, जिसमें विश्व भर के ख्यातिलब्ध राजनेता, अरबपति बिज़नसमेन, मीडिया और फ़िल्म जगत की हस्तियां, शाही परिवारों के सदस्य आदि शामिल बताये जा रहे हैं। सुनते हैं एपिस्टीन का अमेरिका के राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप से बहुत याराना था और कुछ भारतीयों का इन दोनों ठरकपंथियों से। हालांकि इससे भारत की बहुसंख्य जनता को रत्ती भर भी फ़र्क नहीं पड़ा। हमारे यहां कई आधुनिक फ़र्ज़ी बाबाओं ने अपने आश्रमों में इससे मिलते-जुलते कांड किये हैं और आज भी समाज में श्रद्धेय हैं। हमारे बहुत से अगुआ, धनकुबेर और फटीचर भक्त इनके चरणों में लोटते देखे जा सकते है। बाबा ही क्या हमारे राजनेता भी ऐसे कांडों में समय-समय पर लिप्त पाये जा चुके हैं। प्रज्जवल रेवन्ना का नाम शायद हमारी वो जनता अभी याद कर पाये, जो शॉर्ट-टर्म मेमोरी लॉस की शिकार दिखती है। हमारे देश में एपिस्टीन के द्वीप “लिटिल सेंट जेम्स” से इतर इस तरह के कारनामे महलों, कोठियों, आश्रमों, अनाथगृहों आदि में संपन्न करने की लंबी परम्परा रही है।
एपिस्टीन फ़ाइल के खुलते ही विश्व भर के प्रभावशाली लोगों के ख़िलाफ़ कार्यवाहियाँ हो चुकी हैं। बहुत-से लोगों पर जांच बैठ गयी, बहुत-से भारतीयों के नाम भी शुरूआती दस्तावेज़ों में आये। लेकिन भारतीयों का एपिस्टीन से संबंध बनाना कीचड़ में कमल खिलाने की एक अदना-सी कोशिश मात्र थी, जिससे भारत की तरक़्क़ी और विकास की राह आसान हो सके। विरोधियों ने नाहक ही आसमान सर पे उठा रक्खा है। अब नया निज़ाम क़ायम हो गया है.. आर्थिक नीतियाँ, रक्षा समझौते, विदेश नीति, कूटनीतिक संबंध आदि के लिए विशेषज्ञों और प्रबुद्ध राजनयिकों की ज़रूरत नहीं है, इसके लिए भड़वे और दलाल ज़्यादा प्रासंगिक हैं, जिनकी सलाह पर कई देश चल रहे हैं। कुछ देश के अगुआ तो उनके इशारों पर नाच भी रहे हैं।

दुनिया जानती है ट्रंप एक शेख़ीबाज़ है, चापलूस पसंद और ठरकी प्रवृत्ति के बड़बोले और अस्थिर व्यक्ति के रूप में कुख्यात है। ट्रंप कुलीन और अरबपतियों के द्वारा बिठाया गया हम्प्टी डम्प्टी मात्र है। दुनिया की शक्तिशाली यहूदी लॉबी की सरपरस्ती कर अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर दुबारा पहुँचा है और नमक का कर्ज़ अदा कर रहा है। हम शेख़ीबाज़ ट्रंप की जी-हुज़ूरी में लगे हुए हैं और हमारे अगुआ शेख़चिल्ली बने हुए हैं; जिनसे अपने पड़ोसी नहीं संभलते, वह विश्व को संभालने के हसीन सपने देख रहे हैं।
पिछले दिनों देश में दो बड़ी घटनाएं घटीं, संसद में विपक्षी महिला सांसदों के कथित हमले की आशंका को देखते हुए लोकसभा के अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह दी। विपक्ष का इस मामले को लेकर विरोध संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। जबकि सत्ता पक्ष पर ज़ोरदार तमाचा मारा जा सकता था। महिला सांसदों को नाबालिग लड़कियों के नृशंस हत्यारे, बलात्कारी एपिस्टीन के मित्र हरदीप पुरी जैसे सदस्यों के साथ सदन में बैठने से स्पष्ट इनकार कर देना था, सदन में उनकी उपस्थिति का बहिष्कार कर वॉकआउट करती तो लोकसभा अध्यक्ष को सदन की महिला सदस्यों पर मंडरा रहे अन्य ख़तरों का भी आभास हो जाता।
दूसरे, कंगना जी ने नेता प्रतिपक्ष को ‘टपोरी’ कह दिया! कंगना जी नेता प्रतिपक्ष को देखकर असहज महसूस करती हैं। इसमें उनका दोष नहीं है। बेचारी..! राजनीति के गम्भीर पेशे में आने के लिए पिछले कुछ समय से उनका उठना-बैठना उम्रदराज़/बुज़ुर्गो के साथ हो गया है शायद इसीलिए कम उम्र के नेता प्रतिपक्ष उन्हें टपोरी लगने लगे हों। विपक्ष को एपिस्टीन के फ़ितरतन चेलों रमेश बिधूड़ी और बृजभूषण सिंह के बारे में कंगना जी से राय ज़रूर लेना थी।
ख़ैर! एपिस्टीन फ़ाइल ने बड़े-बड़ों को घुटनों पर ला दिया। एपिस्टिन फ़ाइल में नाम आने से उठे बवाल के चलते बिल गेट्स को भारत में आयोजित ए.आई. समिट में अपने संबोधन के बहुप्रचारित कार्यक्रम से पीछे हटना पड़ा। भारतीय मीडिया का एक धड़ा मानता है हाल ही में घटित घटनाएँ जैसे वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को बंदी बनाने और ईरान पर आक्रमण के पीछे मुख्य वजह रही एपिस्टीन फ़ाइल में सफ़ेदपोशों के घिनौने कारनामों पर से पर्दा उठना।
ट्रंप के एपिस्टीन से गहरे संबंध जगज़ाहिर हैं। वर्षों पहले एपिस्टिन की जेल के अंदर संदिग्ध हालत में मौत को भी ट्रंप से जोड़कर देखा जा रहा है, यह मौत ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान हुई थी। ट्रंप का कार्यकाल ख़त्म होते ही एपिस्टीन मामले की सघन जाँच हुई। इस स्थिति से निपटने के लिए ट्रंप का दुबारा चुना जाना ही एकमात्र विकल्प था, जिसके लिए अमेरिका और विश्व के प्रभावशाली सफ़ेदपोशों ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया और कामयाब भी हुए लेकिन तीर कमान से छूट चुका था। अमेरिका की फ़ेडरल अदालत के आदेश पर न्याय विभाग (DOJ) को ये दस्तावेज़ सार्वजनिक करने पड़ रहे हैं। एपिस्टीन फ़ाइल के धमाके की आवाज़ छुपाने के लिए दुनिया भर में बड़े धमाके किये जा रहे हैं..!
अगर यह सच है तो दुनिया के मुठ्ठी भर सनकी अपना व्यभिचार छुपाने के लिए निरापद लोगो की ज़िंदगियां जहन्नुम बना रहे हैं। जिस दिन से बढ़े हुए दाम चुकाने के बावजूद रसोई गैस के लिए भटकना पड़ रहा है, उसी दिन से अमेरिका की फ़ेडरल कोर्ट से ख़ार खाये बैठा हूँ। हरिश्चन्द्र की औलादों ने आधी दुनिया के लिए संकट खड़ा कर दिया है। एक-दो सप्ताह में पेट्रोल, डीज़ल और उर्वरक पर संकट आ जाएगा, महंगाई आसमान छूने लगेगी तब क्या घास खाकर गुज़ारा करेंगे?
हमारे यहां अगर ऐसी हरकत करते तो और ऊंचे पद पर बिठा देते, ज़्यादा ना-नुकर करते तो लोया की तरह लिटा देते, समझदार तो लिफ़ाफ़े में गोपनीय की सील लगाकर मामला सुलटा लेते। लानत है ऐसे अमेरिकी लोकतंत्र पर, जो इतना पुराना और मज़बूत होकर भी नौसीखियों जैसी हरकत कर रहा है।
(चित्र परिचय: निक एंडरसन रचित कार्टून/द वीक.कॉम से साभार)

आदित्य
प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।
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