self discovery, आत्म-खोज, lake, solitude
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से....

लेखन निर्णय नहीं, आत्म-खोज है

              ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा का चौथा अध्याय

मनुष्य जब लिखता है तो सामान्यतः यह मानकर लिखता है कि उसके पास कुछ कहने योग्य है। उसे लगता है कि उसके पास विचार हैं, निष्कर्ष हैं, अनुभव हैं और लेखन उनका प्रस्तुतिकरण है। पर यह लेखन का बाहरी रूप है, उसका सामाजिक रूप। लेखन का आंतरिक रूप इससे बिल्कुल भिन्न है। वहाँ लेखन कहना नहीं, खोजना है; प्रकट करना नहीं, देखना है; निर्णय देना नहीं, स्वयं को पढ़ना है।

“लेखन निर्णय नहीं, आत्म-खोज है”— यह वाक्य लेखन की पूरी परंपरा को एक नये कोण से देखने का निमंत्रण है। निर्णय का स्वभाव बंद करना है; खोज का स्वभाव खोलना। निर्णय कहता है, “मैं जानता हूँ”; खोज कहती है, “मैं देख रहा हूँ।” लेखन यदि निर्णय बन जाये तो वह विचारों का प्रसार भर रह जाता है; यदि खोज बन जाये तो वह चेतना का विस्तार बनता है।

लेखन का पहला भ्रम यही है कि हम सोचते हैं, हम लिखते हैं क्योंकि हमें पता है। पर गहरा सच यह है कि हम लिखते हैं ताकि हमें पता चल सके। बहुत-सी सच्ची पंक्तियाँ लेखक को लिखते समय ही पहली बार दिखायी देती हैं। वे पहले से तय नहीं होतीं। वे लिखते-लिखते प्रकट होती हैं। इसका अर्थ है कि लेखन कई बार ज्ञान का परिणाम नहीं, ज्ञान का माध्यम है।

जब कोई मनुष्य ईमानदारी से लिखता है तो वह अपने भीतर के अव्यवस्थित प्रदेश में प्रवेश करता है। वहाँ स्मृतियाँ हैं, दबी इच्छाएँ हैं, अस्वीकृत डर हैं, अधूरे प्रश्न हैं। सामान्य जीवन में हम इनसे बचते रहते हैं। हम एक व्यवस्थित व्यक्तित्व का निर्माण कर लेते हैं— एक कथा कि “मैं कौन हूँ।” लेखन उस कथा को हिलाता है। वह पूछता है— क्या सचमुच? क्या यह अंतिम है? क्या यह पूरा है?

आत्म-खोज का अर्थ है स्वयं को स्थिर इकाई न मानना। हम आदतों, स्मृतियों, सामाजिक भूमिकाओं और अपेक्षाओं का मिश्रण हैं। पर इनके नीचे एक जीवित चेतना भी है, जो निरंतर बदल रही है। लेखन उस परिवर्तन को देखने की प्रक्रिया बन सकता है। जब हम लिखते हैं, हम अपने विचारों को बाहर रखकर देख पाते हैं। जो भीतर धुँधला था, वह सामने आकार लेता है। तब हम पहली बार अपने ही मन को वस्तु की तरह देख पाते हैं। यही आत्म-दर्शन की शुरूआत है।

निर्णय आधारित लेखन अक्सर स्पष्ट होता है, व्यवस्थित होता है, प्रभावशाली भी हो सकता है। पर उसमें जोखिम कम होता है। वह वहाँ चलता है जहाँ लेखक सुरक्षित है। आत्म-खोज आधारित लेखन अनिश्चित होता है। उसमें लेखक ख़ुद को भी नहीं बख़्शता। वह अपनी छवि की रक्षा नहीं करता। वह यह नहीं सोचता कि पाठक क्या पसंद करेगा; वह यह देखता है कि भीतर क्या सत्य है। यह लेखन कई बार असुविधाजनक होता है—पाठक के लिए भी, लेखक के लिए भी।

लेखन के तीन आयाम

आत्म-खोज के लेखन का एक सूक्ष्म “क्वांटम कण” है— ध्यान। बिना ध्यान के लिखा गया लेखन स्मृति की पुनरावृत्ति है। हम वही लिखते हैं जो पहले से जानते हैं, जो सुना है, जो पढ़ा है। ध्यानपूर्ण लेखन में लेखक अपने विचारों को बनते हुए देखता है। वह अपने ही वाक्यों से चौंक सकता है। वह लिखते समय रुक सकता है और पूछ सकता है—यह सच है या आदत?

दूसरा कण है—ईमानदारी। यह नैतिक ईमानदारी से अलग है। यह अस्तित्वगत ईमानदारी है। क्या मैं वह लिख सकता हूँ जो मेरी छवि के विरुद्ध जाता है? क्या मैं अपनी कमज़ोरी, अपनी उलझन, अपनी अधूरी समझ को स्वीकार कर सकता हूँ? आत्म-खोज का लेखन पूर्णता का प्रदर्शन नहीं करता; वह अपूर्णता को देखने का साहस रखता है।

तीसरा कण है— असुरक्षा को स्वीकार करना। हम सामान्यतः निश्चित होना चाहते हैं। अनिश्चितता हमें भयभीत करती है। पर खोज अनिश्चितता में ही संभव है। यदि सब पहले से तय है, तो खोज का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए आत्म-खोज का लेखक अपने भीतर की धुंध से डरता नहीं। वह जानता है कि स्पष्टता कई बार धुंध से ही जन्म लेती है।

लेखन: दर्पण से आगे

लेखन को अक्सर दर्पण कहा जाता है, पर आत्म-खोज के संदर्भ में यह रूपक अधूरा है। दर्पण सतह दिखाता है; लेखन खुदाई करता है। खुदाई में परतें हटती हैं। ऊपर की मिट्टी में रोज़मर्रा के विचार मिलेंगे। नीचे की परतों में दबी भावनाएँ। और कहीं गहराई में वे प्रश्न जो हम वर्षों से टालते रहे। खुदाई हमेशा सुंदर नहीं होती। कभी-कभी वहाँ कठोर पत्थर मिलते हैं। पर वही पत्थर वास्तविक हैं।

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आत्म-खोज का लेखन सुखद अनुभव नहीं, सच्चा अनुभव है। यह लेखक को बदलता है। यदि लेखन के बाद लेखक वही बना रहे, तो संभव है उसने लिखा तो बहुत, पर देखा कम। सच्ची खोज लेखक की दृष्टि बदल देती है। वह दुनिया को भी नये ढंग से देखने लगता है, क्योंकि वह स्वयं को नये ढंग से देखने लगा है।

लेखन का एक मौन पक्ष भी है। आत्म-खोज का लेखन लगातार बोलता नहीं। वह रुकता है। वह सुनता है। कई बार लिखना रोक देना भी खोज का हिस्सा है। क्योंकि खोज सिर्फ़ शब्दों में नहीं होती; शब्दों के बीच के विराम में भी होती है। जब लेखक अपने भीतर उठते भावों को तुरंत शब्दों में नहीं बदलता, बल्कि उन्हें महसूस करता है— तब लेखन गहराई पाता है।

आत्म-खोज के लेखन में लक्ष्य उपलब्धि नहीं होता। वह पुस्तक, प्रसिद्धि, प्रशंसा से बड़ा क्षेत्र है। वहाँ लिखना देखना बन जाता है। लिखना एक ध्यान-प्रक्रिया हो सकता है— जहाँ लेखक अपने विचारों, प्रतिक्रियाओं, स्मृतियों को आते-जाते देखता है। वह उनसे चिपकता नहीं, उन्हें दर्ज करता है। इस अर्थ में लेखन आत्म-निरीक्षण का उपकरण बन सकता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी— आत्म-खोज का लेखन आत्म-केंद्रित लेखन नहीं है। यह “मैं, मेरा, मेरे अनुभव” की प्रदर्शनी नहीं। यह स्वयं को समझने की प्रक्रिया है ताकि मनुष्य जीवन को अधिक गहराई से देख सके। जब कोई अपने भीतर ईमानदारी से उतरता है, तो वह दूसरों के अनुभवों के प्रति भी संवेदनशील होता है। क्योंकि उसे दिखने लगता है कि भीतर की उलझनें सार्वभौमिक हैं।

लेखन का निर्णयात्मक रूप अक्सर दुनिया को बताता है कि क्या सही है, क्या ग़लत। आत्म-खोज का लेखन पूछता है— मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ? मेरे निष्कर्ष कहाँ से आते हैं? मेरे डर, मेरी धारणाएँ, मेरी प्रतिक्रियाएँ किस मिट्टी से बनी हैं? यह प्रश्नात्मकता ही उसे जीवित बनाती है।

आख़िर में लेखन आत्म-खोज कैसे बनता है? जब लेखक अपने शब्दों का उपयोग छिपने के लिए नहीं, खुलने के लिए करता है। जब वह अपने भीतर की गति को देखने लगता है। जब वह निष्कर्ष देने की जल्दी छोड़ देता है। जब वह अपने ही मन को पाठ की तरह पढ़ने लगता है।

तब लेखन निर्णय नहीं रहता। वह एक यात्रा बन जाता है।

लेखन: अभिव्यक्ति से आगे

और शायद लेखन का सबसे सच्चा क्षण वह है जब लेखक कह सके— “मैं लिख नहीं रहा, मैं स्वयं को देख रहा हूँ।” लेखन तब अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर साक्षात्कार बन जाता है। स्वयं से। अपने भीतर के उस जीवित प्रदेश से जो हर मनुष्य में है, पर जिसे देखने का साहस कम लोग करते हैं। लेखन उस साहस का नाम हो सकता है।

पर साहस यहाँ किसी वीरता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि देखने की विनम्रता है। अपने भीतर जो है उसे बिना सजाये, बिना बचाव के, बिना निर्णय के देख लेना। मनुष्य का मन स्वयं से बचने की अनेक युक्तियाँ जानता है। वह तर्क गढ़ता है, कहानियाँ बनाता है, औचित्य खोजता है। लेखन यदि सजग न हो तो वही युक्तियाँ कागज़ पर उतर आती हैं। तब लेखन आत्म-खोज नहीं, आत्म-रक्षा बन जाता है।

आत्म-खोज का लेखन रक्षा-तंत्रों को पहचानने से शुरू होता है। जब लेखक लिखते समय यह देख सके कि वह कहाँ अपने को सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, कहाँ अपने को बेहतर दिखा रहा है, कहाँ कुछ छिपा रहा है— तभी लेखन भीतर की दिशा पकड़ता है। यह पहचान आसान नहीं, क्योंकि हमारा अहंकार बहुत सूक्ष्म है। वह सत्य का वस्त्र पहनकर भी आ सकता है।

लेखन में स्मृति

लेखन का एक और सूक्ष्म कण है— साक्षीभाव। जब लेखक अपने अनुभव को जीते हुए भी उसे देख सके। जैसे भीतर दो स्तर हों— एक जो अनुभव कर रहा है, दूसरा जो देख रहा है। लेखन इस दूसरे स्तर को मज़बूत कर सकता है। जब हम लिखते हैं— “मैं क्रोधित था”—तो हम क्रोध से थोड़ा बाहर आ जाते हैं। क्रोध अब पूरा ‘मैं’ नहीं रहता; वह एक अनुभव बन जाता है, जिसे देखा जा सकता है। यही दूरी आत्म-ज्ञान की शुरूआत है।

धीरे-धीरे लेखक समझने लगता है कि उसके विचार भी स्थायी नहीं। वे आते हैं, जाते हैं। आज जो सत्य लगता है, कल बदल सकता है। यह समझ विनम्र बनाती है। निर्णय कठोर बनाता है; खोज लचीला। निर्णय कहता है— “यही है”; खोज कहती है— “अभी इतना दिख रहा है।” यह “अभी” शब्द आत्म-अन्वेषण का बड़ा संकेत है, क्योंकि वह अनुभव को समय से जोड़ता है, उसे अंतिम नहीं मानता।

आत्म-खोज के लेखन में स्मृति की भूमिका भी गहरी है। हम अपने अतीत को सीधी रेखा की तरह याद नहीं करते; हम उसे कथाओं में बदल देते हैं। हर स्मृति में चयन होता है—कुछ याद रखा, कुछ भुला दिया, कुछ बदल दिया। जब लेखक अपनी स्मृतियों को लिखता है, तो वह पहली बार देख सकता है कि उसकी कहानी कितनी गढ़ी हुई है। यह देखना चौंकाने वाला हो सकता है। पर यही चौंकना जागरण का क्षण भी है।

लेखन यहाँ इतिहास लिखना नहीं, स्मृति को समझना है। स्मृति तथ्य नहीं, अनुभव की व्याख्या है। जब यह स्पष्ट होता है, तो लेखक अपने ही अतीत से मुक्त होने लगता है। वह देखता है कि वह अपनी कहानी नहीं है; वह कहानी का साक्षी भी हो सकता है। यह बोध आत्म-खोज का गहरा मोड़ है।

एक और सूक्ष्म आयाम है—शरीर। हम अक्सर आत्म-खोज को मानसिक प्रक्रिया मानते हैं, पर अनुभव शरीर में भी बसता है। डर सिर्फ़ विचार नहीं, धड़कन भी है। दुःख सिर्फ़ स्मृति नहीं, आँखों की नमी भी है। यदि लेखक लिखते समय अपने शरीर की संवेदनाओं पर ध्यान दे—साँस की गति, भीतर का संकुचन, फैलाव— तो लेखन और प्रामाणिक हो सकता है। तब शब्द सीधे अनुभव से निकलते हैं, विचारों की छन्नी से नहीं।

लेखन: प्रार्थना और साधना तक

आत्म-खोज का लेखन धीरे-धीरे गति बदल देता है। वह जल्दबाज़ी से दूर ले जाता है। वहाँ लिखना उत्पादन नहीं रहता कि रोज़ इतना लिखना है। वहाँ लिखना सुनना बन जाता है— कब भीतर कुछ सचमुच लिखना चाहता है। कभी एक पंक्ति ही पर्याप्त होती है, क्योंकि वह जीवित होती है। बहुत-सा मृत लेखन कई जीवित पंक्तियों से कम मूल्यवान हो सकता है।

यहाँ एक भ्रम टूटता है— कि अधिक लिखना ही अच्छा लिखना है। आत्म-खोज के मार्ग पर गुणवत्ता का अर्थ भी बदलता है। अच्छी पंक्ति वह नहीं जो प्रभावशाली हो, बल्कि वह जो भीतर से ईमानदार हो। जिसे लिखते समय लेखक ने कुछ सचमुच देखा हो। पाठक उस प्रामाणिकता को अक्सर महसूस कर लेता है, भले उसे शब्दों में न कह पाये।

आत्म-खोज का लेखन लेखक को अकेलेपन से भी मिलाता है। क्योंकि भीतर उतरना अंततः अकेले ही संभव है। वहाँ कोई भीड़ नहीं जाती। पर यह अकेलापन नकारात्मक नहीं; यह रचनात्मक एकांत है। उसी एकांत में लेखक अपने असली प्रश्नों से मिलता है। वे प्रश्न जिनका उत्तर किताबों में नहीं, अनुभव में है।

धीरे-धीरे लेखन प्रार्थना जैसा भी हो सकता है— किसी देवता से नहीं, अस्तित्व से संवाद। जैसे मनुष्य कह रहा हो— “यह मैं हूँ, जैसा हूँ।” बिना अलंकरण, बिना मुखौटे। इस अवस्था में लेखन शुद्ध हो जाता है। वह किसी को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करता। वह उपस्थित होता है।

और शायद आत्म-खोज के लेखन का अंतिम रहस्य यही है— उपस्थिति। जब लेखक पूरी तरह उपस्थित होकर लिखता है, तो लेखन ध्यान बन जाता है। वहाँ अतीत की छाया कम होती है, भविष्य की चिंता कम होती है। उस क्षण में जो देखा गया, वही लिखा जाता है। ऐसी पंक्तियाँ छोटी हो सकती हैं, पर उनमें घनत्व होता है।

अंततः आत्म-खोज का लेखन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। वह जीवन की तरह खुला रहता है। वह जानता है कि स्वयं को जानना कोई परियोजना नहीं जो पूरी हो जाये। यह एक सतत् प्रक्रिया है। हर लेखन उस प्रक्रिया का एक स्नैपशॉट है— उस क्षण का सत्य।

शायद इसलिए सच्चा लेखक अपने लिखे से चिपकता नहीं। वह जानता है कि वह भी बदल जाएगा, उसका देखना भी बदल जाएगा। वह अपने ही शब्दों को अंतिम सत्य नहीं मानता। वे उस समय की समझ थे— अब नयी समझ आ सकती है।

और तब लेखन उपलब्धि नहीं रहता, साधना बन जाता है। साधना— जिसका अर्थ है निरंतर देखना, निरंतर सीखना, निरंतर खुलना। यहीं आकर लेखन आत्म-खोज से भी आगे जा सकता है— आत्म-बोध की दिशा में। जहाँ प्रश्न भी शांत होने लगते हैं, और देखने की क्षमता ही पर्याप्त हो जाती है। और शायद तब लेखन भी कम हो जाता है, पर जो लिखा जाता है, वह भीतर की गहराई से आता है। क्योंकि अंत में लेखन का लक्ष्य बहुत लिखना नहीं, सचमुच देखना हो जाता है।

संजीव कुमार जैन

संजीव कुमार जैन

लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय कन्या महाविद्यालय, भोपाल नूतन कॉलेज में हिंदी के सह प्राध्यापक के रूप में सेवारत हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना, लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं। संपर्क: 98264 58553

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