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अजित कुमार राय की कलम से....

ममतालु अकादमी

             साहित्य अकादमी के 2025 के पुरस्कारों की घोषणा हो गयी है। इस बार हिन्दी में ममता कालिया को सन् 2021 में प्रकाशित उनके औपन्यासिक संस्मरण “जीते जी इलाहाबाद” के लिए यह पुरस्कार मिला है। पुरस्कार देर से घोषित हुए।

साहित्य अकादमी की स्वायत्तता पर भी सवाल उठे। पता नहीं लांछित अकादमी के पुरस्कार को विरोधी किस दृष्टि से देखेंगे। शायद कृष्ण कल्पित प्रसंग में जूरी के तीन सदस्यों में एक ममता कालिया भी थीं। पटना की घटना के बाद साहित्य अकादमी भी चर्चा में आयी। किन्तु अधिकांश लेखकों ने साहित्य अकादमी में अपना विश्वास बनाये रखा और उसके कार्यक्रमों एवं उत्सवों में भाग लेते रहे। कुछ लोगों ने फ़तवा जारी किया, लेकिन उसका व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा। वैसे भी पुरस्कार वापसी के बाद धीरे-धीरे सरकार ने पुरस्कार देना बंद कर दिया। कई संस्थान पुरस्कार नहीं दे रहे हैं।

यूँ भी पुरस्कारों की विश्वसनीयता सदा सवालों के घेरे में रही है। इस बार विचारणीय पुस्तकों की सूची में कविता, उपन्यास, निबन्ध और संस्मरण विधा की पुस्तकें रही हैं। अब संस्मरण और साक्षात्कार भी यशप्रदायी सिद्ध हो चुके हैं। यह अलग बात है कि निर्बाध यश आज एक यक्षप्रश्न बन गया है। और साहित्य की संस्था का क्षरण हो रहा है। शिविरबंदी ने साहित्य शब्द की अर्थवत्ता को ही प्रश्नांकित कर दिया है। अब सहित का भाव नहीं, विखंडन का दौर है। प्रयागराज के बजाय इलाहाबाद ममता जी की सृजनशीलता के केन्द्र में रहा है, जो यश मालवीय को सर्वाधिक जीवंत अनुभव लगा। तत्कालीन साहित्यिक परिवेश की पुनःसृष्टि एक वांछनीय आनुभूतिक सत्ता है।

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बहरहाल ममता जी एक स्थापित लेखिका हैं और शायद रवीन्द्र कालिया से अधिक सशक्त। तो उन्हें पुरस्कृत किया जाना था। पुस्तक तो एक बहाना था। कुछ नवीन लेखकों को शिवमूर्ति ज्यादा समीचीन लगे तो कुछ को आनन्द कुमार सिंह का अथर्वा। कुछ तो पाजामे से बाहर आकर ममता का आखेट करने लगे, जो कि संवेदना का ही आखेट है। किन्तु मांसाहार की निर्ग्रंथि भाव से स्वीकृति खटकती है और जीते जी इलाहाबाद संवेदनात्मक मृत्यु का प्रतीक बन जाता है। फिर भी ममता जी को हार्दिक बधाई। मेरे पास भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया के पत्र सुरक्षित हैं।

अजित कुमार राय, ajit kumar rai

अजित कुमार राय

आस्था अभी शेष है, रथ के धूल भरे पांव आपकी चर्चित कृतियां हैं। 'सर्जना की गंध लिपि' संपादित कृति है और 'नई सदी की हिन्दी कविता का दृष्टि बोध' आलोचना पुस्तक प्रकाशित है। आप हिंदी साहित्य की तमाम महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। अनेक संकलनों में निबन्ध, कविताएँ और आलोचनाएँ प्रकाशित। पूर्व प्रधानाचार्य, सुभाष इण्टर कालेज।

2 comments on “ममतालु अकादमी

  1. साहित्य से दूर की जिंदगी में अर्थात ‘ पाठकों की दुनिया ‘ में जो कि सिमट गई है ; स्वायत्तता, लांछन और विश्वसनीयता आदि साहित्य अकादमियों और पुरुस्कारों के संदर्भ में
    ये सब बातें काफी हाउस की क्रांति जैसी हैं ।

    लेखक और पाठक एक सिक्के के पहलू हैं । लेखकों ने ही सायास पाठकों को बाहर का रास्ता दिखाया है उनकी राय का , पसंद का जरूरत का साहित्य के दरबार में कोई स्थान नहीं है।

    साहित्य के खेमों से इतर लोगों की दिलचस्पी नहीं है किसे मिला पुरस्कार।

    तीन बहुत पढ़े लिखे 80 की पैदाइश जिन्हें साहित्य व्यर्थ लगा ; पूछ रहे थे क्यों लिखते हैं लोग ऐसी कविताएं, ऐसी किताबें क्यों सरकार पैसा खर्च करती है इन अकादमियों और पुरुस्कारों पर।

    ‘साहित्य की संस्था का क्षरण हो रहा है। शिविरबंदी ने साहित्य शब्द की अर्थवत्ता को ही प्रश्नांकित कर दिया है।अब सहित का भाव नहीं विखंडन का दौर है। ‘
    वर्तमान साहित्य के लिए यह आपका मात्र कथन नहीं है, हमारे समय का दस्तावेज है।
    विचारणीय एवं सराहनीय लेख है।

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