
- March 31, 2026
- आब-ओ-हवा
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अनुवाद: श्रीविलास सिंह की कलम से....
दस कविताएं: फ़िलिस्तीन के कवि नजवान दरविश
नजवान दरविश (Najwan Darwish) का जन्म 1978 में यरुशलम में हुआ था। 2000 में उनके पहले कविता संग्रह के प्रकाशन के बाद से, उनकी कविताओं का दस भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। नजवान की कविताओं के सम्बन्ध में एरिक डीन विल्सन कहते हैं “महमूद दरवेश के विपरीत, नजवान दरविश की फ़िलिस्तीनी-इज़रायली संघर्ष पर लिखी कविताएँ शांत चिंतन या शोकगीत से कहीं आगे जाती हैं… दरविश रिम्बॉद के विचार को जातीय पहचान तक विस्तारित करते हैं। विभिन्न समयों पर, वक्ता स्वयं को न केवल फ़िलिस्तीनी बल्कि कुर्द, बर्बर, अमाज़िग, अर्मेनियाई, अरब, सेफ़र्डिक यहूदी, सीरियाई और प्राचीन मिस्रवासी के रूप में पहचानता है, जिनमें से कुछ नाम विभिन्न जातीयताओं, धर्मों, इतिहासों और राष्ट्रीयताओं के प्रवासी समूहों को समाहित करते हैं।” उनकी दस श्रेष्ठ कविताओं के अनुवाद आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए…

भागो!
मैंने सुनी एक आवाज़ : भागो
और छोड़ दो पीछे यह अंग्रेज़ी द्वीप
तुम्हारा नहीं है कुछ भी सिवाय इस सजावटी रेडियो के
सिवाय इस कॉफ़ी पात्र के
सिवाय रेशमी आकाश के समक्ष खड़े बाग़ीचे के वृक्षों की पंक्ति के
मैं सुनता हूँ आवाज़ें उन भाषाओं में जो मैं जानता हूँ
और अन्य जिन्हें मैं नहीं जानता:
भागो
और छोड़ दो पीछे खँडहर हो चुकी लाल बसों को
ज़ंग लगी रेल लाइनों को
सुबह के कामों के प्रति आसक्त इस राष्ट्र को
इस परिवार को जो लटकाता है पूंजीवाद की तस्वीर अपनी बैठक में
मानो यह हो उसका कोई पूर्वज
पलायन करो इस द्वीप से
तुम्हारे पीछे हैं मात्र खिड़कियां
खिड़कियां वहाँ तक जहाँ तक देख सकते हो तुम
खिड़कियां दिन के प्रकाश में
खिड़कियां रात्रि में
प्रकाश से जगमग पीड़ा के बदरंग पक्ष
बदरंग पीड़ा के प्रकाश से जगमग पक्ष
और तुम सुनते हो आवाज: भागो
शहर की तमाम भाषाओं में, रहवासी भाग रहे हैं अपने बचपन के स्वप्नों से
उपनिवेशों के घावों से जो बदल गये हैं
ठंडे हस्ताक्षरों में अपने रचयिताओं के मरने के पश्चात्
पलायन करते लोग भूल चुके हैं कि वे भाग रहे हैं किस चीज़ से,
अत्यंत कायरता से अब पार करने को गलियां,
वे जुटाते हैं अपनी सारी कायरता और चीखते हैं:
भागो
***
नर्क में
1.
1930 के दशक में
समझ आया नाज़ियों को
डालना अपने शिकारों को गैस चैंबर में
आज के वधिक हैं अधिक पेशेवर :
वे रख देते हैं गैस चैंबर
अपने शिकारों के भीतर ही
2.
नर्क में जाओ, 2010
नर्क में जाओ तुम
अनधिकृत कब्ज़ा करने वालो,
तुम और तुम्हारी संतति
और नर्क में चली जाये समूची मानव जाति यदि यह दिखती है तुम्हारे जैसी
नर्क में जाएँ सब पोत और हवाईजहाज़, बैंक और विज्ञापनपट
मैं चीखता हूँ “नर्क में जाओ…”
अच्छी तरह जानते हुए कि
हूँ बस एकमात्र मैं अकेला
जो रहता है वहाँ
3.
इसलिए मुझे लेटने दो
और रखने दो मुझे मेरा सिर नर्क के तकियों पर
***
ध्वनिहीन कक्ष
वह अब लटका है लकड़ी के एक टुकड़े पर
और मैं बस चीख ही सकता हूँ
इन कक्षों में नहीं प्रवेश कर सकती कोई आवाज़:
वह लटका है अब लकड़ी के एक टुकड़े पर
रात और दिन
जाड़े और गर्मी में
हवा में, आग में, धरती और जल में
अंधेरे में और प्रकाश में
वह लटका है अब:
दुनिया लटकी है लकड़ी के एक टुकड़े पर
***
प्रस्थान
तुम प्रस्थान करते हो धरती से
किन्तु रोक नहीं सकते स्वयं को पुनः वापस गिरने से
तुम ज़मीन पर गिरोगे
अपने पैरों के बल अथवा मुंह के बल, पर तुम गिरोगे
यदि हवाई जहाज़ में हो जाये विस्फोट तब भी
तुम्हारे टुकड़े, अणु-परमाणु
गिरेंगे धरती पर ही
तुम कीलें ठोककर जड़ दिये गये हो इससे:
धरती, तुम्हारी नन्ही सलीब है।
***
स्पष्टीकरण
जूडा नहीं चाहता था करना मुझसे ‘विश्वासघात’
वह तो कभी जानता भी न था इतना भारी शब्द
वह तो था बस ‘बाज़ार का आदमी’
और उसने बस इतना ही किया कि – जब ग्राहक आये –
मुझे बेच दिया
क्या क़ीमत थी बहुत कम?
बिलकुल नहीं। चाँदी के तीस सिक्के
होते नहीं कोई छोटी राशि
एक मिट्टी से बने आदमी के लिए
मेरे सभी प्रिय मित्र थे जूडा
वे सभी थे
बाज़ार के आदमी।
***
जेरुसलम
जब मैं छोड़ता हूँ तुम्हें मैं बदल जाता हूँ पत्थर में
और जब मैं आता हूँ वापस मैं बदल जाता हूँ पत्थर में
मैं तुम्हारा नाम रखता हूँ मेडूसा
मैं तुम्हारा नाम रखता हूँ सोडोम और गोमोर्रा* की बड़ी बहन
तुम, दीक्षा जलपात्र जिसने जला दिया रोम को
मार डाले गये लोग गुनगुनाते हैं अपनी कविताएं पहाड़ियों पर
और विद्रोही धिक्कारते हैं उनकी कहानियां सुनाने वालों को
जब भी मैं छोड़ देता हूँ समुद्र को पीछे और वापस आता हूँ
तुम तक, वापस
इस छोटी नदी से होकर जो बहती है तुम्हारी निराशा में
मैं सुनता हूँ क़ुरआन का पाठ करने वालों और लाशों को कफ़न देने वालों को
मैं सुनता हूँ शोक मनाने वालों की धूल को
यद्यपि मैं नहीं हूँ अभी प्यासा,
तुमने दफ़न किया मुझे, बार—बार
और हर बार, तुम्हारे लिए
मैं प्रगट हुआ धरती से
इसलिए उन्हें जाने दो नर्क में जो गाते हैं तुम्हारे प्रशस्तिगान
जो बेचते हैं स्मृति चिन्ह तुम्हारी पीड़ा के
वे सभी जो अभी खड़े हैं तस्वीर में मेरे साथ
मैं तुम्हारा नाम रखता हूँ मेडूसा
मैं तुम्हारा नाम रखता हूँ सोडोम और गोमोर्रा की बड़ी बहन
तुम, दीक्षा जलपात्र जो अभी भी जलता है
जब मैं छोड़ता हूँ तुम्हें मैं बदल जाता हूँ पत्थर में
और जब मैं आता हूँ वापस मैं बदल जाता हूँ पत्थर में
***
आलिंगन
भ्रमित और भीगा हुआ
मेरे चिथड़े हुए हाथ प्रयत्न करते हैं
आलिंगन करने का पर्वतों, घाटियों और मैदानों का
और समुद्र का, जिसे मैंने प्यार किया, डुबाया मुझे बारम्बार
इस प्रेमी की देह बन चुकी है एक शव
तिरता हुआ पानी में
भ्रमित और भीगा हुआ
मेरा शव भी
फैलाता है अपनी बाहें
मरते हुए
आलिंगन करने को उस समुद्र का जो डुबोता है इसे
***
एक कविता महोत्सव
हर कवि के सामने है उसके देश का नाम
और मेरे नाम के पीछे कुछ नहीं बस जेरुसलम
कितना भयोत्पादक है तुम्हारा नाम मेरे नन्हे देश
मेरे लिए, कुछ नहीं रहता शेष इसका, सिवाय नाम के
मैं सोता और जागता हूँ इसी में
इसका नाम एक नाव आगमन
अथवा वापसी की आशा से रहित
यह न पहुँचती है न वापस आती है
यह न पहुँचती है न डूबती है
***
मैं लिखता हूँ भूमि
मैं लिखना चाहता हूँ भूमि,
मैं चाहता हूँ कि शब्द हो
भूमि स्वयं।
लेकिन मैं हूँ सिर्फ़ एक मूर्ति जिसे बनाया रोमनों ने
और अरबों ने भुला दिया।
उपनिवेशकों में चुरा लिया मेरा कटा हुआ हाथ
और रख दिया उसे एक अजायबघर में।
कोई बात नहीं। मैं अब भी चाहता हूँ लिखना इसे—
भूमि।
मेरे शब्द हैं हर कहीं
और मौन है मेरी कहानी।
***
मुश्किल से सांस लेता हुआ
शोक बहता है कमरों में से
जबकि मैं, एक प्रेत की भाँति, प्रवेश करता हूँ तुम्हारे परित्यक्त घरों में,
पकड़े हुए अपना सिरा अपने हाथ में,
सोता और जागता हुआ अपने खंडहर के साथ।
हतोत्साहित करने वाला है परिचित होना
मेरी अपनी बरबादी से,
क़दम मिलाये चलना इसके संग यहाँ तक।
वे भारी हैं मुझ पर – ये परित्यक्त मकान,
यह पलायन जो भरा है तुम्हारे घरों में।
मैं प्रवेश करता हूँ उनके रिक्त हृदयों में,
और मुश्किल से सांस ले पाता हूँ…
न अरबी, न फ़ारसी न ही बायज़ैंटाइन महसूस कर सकते हैं अब मुझे।
क्या मेरा कभी कोई इतिहास न था?
और कैसे मैंने खो दिया उन्हें रास्ते में –
कविताओं को जिन्हें प्रसारित कर रही थी दुनिया, एक क्षण में।
और तुम कैसे खो गये, तुम सभी?
तुमने ले लिया मेरे हिस्से का खो देने का दुख
और छोड़ दिया परित्याग को पीछे,
एक ग्रह बिना पसलियों वाला —
तुमने इसे छोड़ दिया मेरे लिए, तुमने
छोड़ दिया इसे मेरा बोझ बनने को।
यदि मैं कहता कि मैं जा रहा था छोड़कर
तब भी कोई नहीं होता यहाँ
सिवाय परित्याग के,
अपनी कर्कश आवाज़ के साथ जो
निगलती जा रही है मेरी स्वयं की आवाज़ को।
***

श्रीविलास सिंह
अनेक वर्षों से लेखन। दो कविता संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कविताओं के, एक कहानी संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कहानियों के, कविताएँ, कहानियाँ और देशी विदेशी साहित्य के अनुवाद और लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित, साहित्य और संस्कृति की पत्रिका “परिंदे” का अवैतनिक संपादन।
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