
- March 31, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
लोकसाहित्य में व्यंग्य परंपरा और स्वरूप
किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना का सबसे प्राचीन और जीवंत स्रोत लोकसाहित्य है। इसका सबसे प्रमुख तत्व उसकी मौखिक परंपरा है। लिखित रूप में आने से पूर्व ही यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की स्मृति और कथन के माध्यम से संप्रेषित होता रहा है। लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोकोक्तियाँ, मुहावरे और पहेलियाँ इसके प्रमुख रूप हैं। लोकसाहित्य में सामान्य जनजीवन, सामाजिक संबंध, रीति-रिवाज, आचार-विचार और सांस्कृतिक मूल्यों की सहज अभिव्यक्ति मिलती है। इसमें किसी समुदाय के लंबे सांस्कृतिक अनुभव, जीवन-मूल्य और सामूहिक चेतना प्रतिबिंबित होती है। साथ ही श्रम, उत्सव, प्रेम, संघर्ष और प्रकृति से जुड़े विविध भावों का सजीव चित्रण भी इसमें प्राप्त होता है।
लोकसाहित्य के महत्वपूर्ण तत्वों में व्यंग्य भी एक प्रमुख तत्व है। लोकजीवन में व्यंग्य का प्रयोग समाज की विसंगतियों, पाखंडों और अन्याय पर टिप्पणी करने के लिए किया जाता है। यह व्यंग्य अक्सर हास्य, रूपक, प्रतीक और अतिशयोक्ति के माध्यम से व्यक्त होता है। भारतीय लोकसंस्कृति में व्यंग्य के माध्यम से समाज अपने दोषों पर स्वयं हँसता भी है और उन्हें सुधारने का संकेत भी देता है।
लोकसाहित्य को अनेक विद्वानों ने “जनता की वाणी” कहा है। यह किसी एक लेखक की रचना नहीं होती, बल्कि सामूहिक अनुभवों और भावनाओं की अभिव्यक्ति है। गाँवों के गीतों, कहावतों और लोकनाट्यों में सामाजिक असमानताओं, पारिवारिक संबंधों, पाखंड और सत्ता की आलोचना व्यंग्य के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।
लोकगीतों में व्यंग्य
लोकगीत भारतीय लोकजीवन का दर्पण माने जाते हैं। इन गीतों में समाज की सामूहिक अनुभूतियाँ, पारिवारिक संबंध, सामाजिक परंपराएँ और आर्थिक परिस्थितियाँ सहज रूप में अभिव्यक्त होती हैं। “एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार “लोकगीत मनुष्य के हृदय की स्वाभाविक भावनाओं से उत्पन्न होने वाला संगीत है। जब व्यक्ति अपने सुख-दुःख, आशा-निराशा और जीवन के अनुभवों को व्यक्त करना चाहता है, तो वह उन्हें केवल बोलकर नहीं बल्कि गाकर अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार गीत के माध्यम से मन के भावों को प्रकट करने की जो स्वाभाविक अभिव्यक्ति होती है, वही लोकगीत कहलाती है।”
प्रसिद्ध निबंधकार और समालोचक गुलाबराय लोकगीतों को ‘लोकभावना की अभिव्यक्ति’ मानते हैं, जबकि लोकसाहित्य के प्रमुख शोधकर्ता देवेन्द्र सत्यार्थी उन्हें संस्कृति के “मुँह बोलते चित्र” के रूप में देखते हैं। आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में “ग्रामगीत आर्येतर सभ्यता के वेद हैं।” इन मतों से स्पष्ट होता है कि लोकगीत, लोक के सांस्कृतिक अनुभवों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और जीवनमूल्यों के जीवंत दस्तावेज़ हैं।
लोकगीतों का संबंध लोकजीवन की परंपराओं, रीति-रिवाजों और लोकविश्वासों से गहराई से जुड़ा होता है। ये घर, गाँव और नगर की जनता के गीत हैं, जिन्हें विशेष अवसरों और त्योहारों पर गाया जाता है। इनके रचनाकार सामान्य जन होते हैं और इन्हें ढोलक, करताल, झाँझ, सिंगी, ढपली, रमतूला, तुरही, इकतारा और बाँसुरी जैसे लोकवाद्यों की सहायता से प्रस्तुत किया जाता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति के अनुसार अलग-अलग प्रकार के लोकगीत प्रचलित हैं। लोक संस्कृति के अध्येताओं ने विषयवस्तु के आधार पर लोकगीतों को सामान्यतः पाँच प्रकारों में विभाजित किया है:
- संस्कार गीत – जन्म, नामकरण मुंडन, जनेऊ, विवाह, गौना, कुंवा-पूजा आदि अवसरों पर गाए जाने वाले गीत।
- गाथा गीत – वीरगाथाओं, लोकनायकों और ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित गीत, जैसे आल्हा, ढोला-मारू आदि।
- पर्व गीत – तीज, होली, कजरी, छठ, नागपंचमी आदि त्योहारों से जुड़े गीत।
- जीविका गीत – खेती-किसानी और श्रम से जुड़े गीत, जैसे बुआई, रोपाई, कटाई या धान कूटने के गीत।
- जातीय अथवा लोकजीवन गीत – बिरहा, झूमर, चैता, बारहमासा, बाउल, भटियाली आदि जो विशिष्ट समुदायों या जीवन-स्थितियों से जुड़े होते हैं।
स्पष्ट है कि लोकजीवन के प्रत्येक अवसर के लिए अलग-अलग लोकगीत रचे गये हैं। उदाहरण के लिए शिशु जन्म पर सोहर, विवाह पर मंगलगीत और गारी, होली पर होरी, छठ पर्व पर छठ मइया गीत, रोपाई-बिनाई के श्रमगीत तथा गंगा स्नान के गीत गाये जाते हैं। जीवन के हर शुभ अवसर और रोज़मर्रा के कामों में भी लोकगीतों का महत्वपूर्ण स्थान है।
लोकगीतों में व्यंग्य की उपस्थिति कई रूपों में दिखायी देती है। उत्तर भारत के विवाह गीतों में ससुराल या वर-पक्ष पर हल्के हास्य और व्यंग्य के स्वर मिलते हैं। दूल्हे, उसके रिश्तेदारों और बारातियों की अकड़ या लालच पर चुटकी लेते हुए गीत गाये जाते हैं। उदाहरण के रूप में दूल्हे को संबोधित एक गीत देखें जिसमें हास्य के साथ ही, दूल्हे की बनावट और दिखावे पर चुटीला कटाक्ष है- “बन्ने काला कोट सिलाना रे, नाइलोन के बटन लगाना रे।”
इसी प्रकार विवाह समारोह में गायी जाने वाली ‘गारी’ गीतों में बारातियों का हल्के व्यंग्य के साथ उपहास किया जाता है, जो हास्यपूर्ण वातावरण बनाने की एक पारंपरिक शैली है। वर के पिताजी (समधी) के उपहास के लिए गाये जाने वाले इस गीत को देखिए- “सबके हो गये दो-दो ब्याव, समधी खों बांध दई बुकरिया।”
शिशु जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले ‘सोहर’ गीतों में भी हास्य और व्यंग्य का पुट मिलता है- “जच्चा झुक-झुक देखे पलना। तेरे बाबा काले-काले, तू गोरा नाना पे हुआ, मेरे ललना।” एक अन्य सोहर गीत में बहू के मायके से खाने-पीने की सारी व्यवस्था करने की प्रवृत्ति पर हल्का तंज़ किया गया है- “सोंठ गिरी के लड्डू, मेरी अम्मा ने भिजवाए री! उसमें से एक लड्डू, मेरी सासू ने चुराए री।”
लोकगीतों की उपमाएँ भी अत्यंत सरल, रोचक और विनोदपूर्ण होती हैं, जैसे “बरफ़ी हो गये गाल, हो जोवन मगद के लडुआ हो गये।” ग्रामीण जीवन से जुड़े सामाजिक प्रसंग भी लोकगीतों का अंग होते हैं। उदाहरण के लिए, देवर के पटवारी बनने पर भाभी गर्व से गाती है- “सुनो बैनां, लाला भये पटवारी। कुआँ जो लिख दये बंदियां लिख दईं, लिख दई सरकारी उनारी। गइयां लिख दई बुकइयां लिख दई, लिखदई उननें गुवरारी।” इस गीत में ग्रामीण प्रशासनिक संरचना और उससे जुड़े अहंकार पर हल्का व्यंग्य निहित है।

इसी प्रकार ननद-भाभी के रिश्ते की नोक-झोंक भी लोकगीतों में व्यक्त होती है- “बमुरिया के कांटे न सालें री, जैसे सालें ननदिया के बोल रे।”
वर्तमान समय में भोजपुरी लोकगीतों पर कभी-कभी अश्लीलता के आरोप लगाये जाते हैं, किंतु भोजपुरी लोकपरंपरा मूलतः प्रेम, संवेदना और प्रतिरोध की संस्कृति से जुड़ी रही है। अनेक लोकगीतों ने सामाजिक अन्याय और शोषण के विरुद्ध जनचेतना को स्वर दिया है जिसे – “केकरा से करी अरजिया हो सगरे बंटमार” या “लड़े के बा किसान के लड़ैया, चल तुहूँ लड़े बदे भइया।” लोकगीतों में देखा जा सकता है।
बुंदेलखंड के लोकसाहित्य में लोककवि ईसुरी का विशेष स्थान है। उनके फाग में प्रेम, नोक-झोंक, सामाजिक व्यवहार और मानवीय कमज़ोरियों पर हल्के लेकिन प्रभावशाली व्यंग्य दृश्य मिलते हैं। उनका व्यंग्य कटु न होकर लोक-रस से युक्त होता है। भाषा में चुटीलापन, चित्रण में विनोद और अंत में नैतिक संकेत उनकी विशेषता है। उनके एक फाग गीत में पति के चंचल स्वभाव पर हल्का व्यंग्य किया गया है। देखिए- “अरी सखि! मोरे साजन बड़े रसिया, गली-गली रंग बरसावैं। घर की नारी बैठी रोवै, परदेसिन संग मुस्कावैं।”
इसी प्रकार एक अन्य फाग में वे जनसंख्या-वृद्धि और पारिवारिक अव्यवस्था पर व्यंजनापूर्ण कटाक्ष करते हैं- संतानों का ऐसा ढेर लग गया है, इतने कपड़े निकलने लगे हैं कि धोबन की धोने की शक्ति जवाब देने लगी, आंगन और अहाता धोने वाली बसोरन भी चिढ़ गयी है। नाईं ने इतने बच्चों के सिर मूड़ने से मना कर दिया है। घर जैसे भिखारियों का घर हो गया है। मूल पंक्तियाँ देखिए-
“पर गई लरकन की रगदाई बउ बरसान कहाई।
धोबन ज्वाय देत धोंबे खों, अब नइँ होत धुआई॥
सोरें धोउत बसोरन चिक गई, नाँइ करत है नाई॥
कैसी करें रंज के मारें, घर में आफ़त आई॥
मंगन सौ घर हो गऔ ‘ईसुर’ मांगन लगे खबाई॥”
अवधी क्षेत्र में सोहर, कजरी, बिरहा, चैता और आल्हा जैसे लोकगीत अत्यंत लोकप्रिय हैं। इन लोकगीतों में सामाजिक संरचना, ग्रामीण जीवन और पारिवारिक संबंधों पर उल्लेखनीय व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ मिलती हैं। अवधी के प्रसिद्ध लोककवि घाघ अपनी लोकोक्तियों और कथनों में व्यावहारिक तथा अनुभवजन्य व्यंग्य के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके कथनों में ग्रामीण जीवन, मौसम, कृषि व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार पर तीखा लेकिन व्यावहारिक व्यंग्य मिलता है। ब्रज क्षेत्र में रास, होरी, झूला, और फाग आदि लोकगीत विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। ब्रज क्षेत्र के लोकगीतों में प्रेम, उत्सव और सामाजिक संबंधों के साथ चुटीला व्यंग्य भी मिलता है, विशेषकर होरी और फाग के गीतों में।
राजस्थानी लोकसाहित्य में ‘ढोला-मारू’ की प्रेमगाथा अत्यंत प्रसिद्ध है। यह राजस्थान की लोकपरंपरा की महत्वपूर्ण कथा है, जिसे लोकगायक पीढ़ियों से गाते आ रहे हैं। राजस्थानी लोकगीतों में ‘घूमर’, ‘केसरिया बालम’ आदि गीत अत्यंत लोकप्रिय हैं। मांगणियार और लंगा गायकों की परंपरा में ऐसे गीत मिलते हैं, जिनमें सामाजिक विसंगतियों और मानवीय कमज़ोरियों पर चुटीली टिप्पणियाँ की जाती हैं। कुमाऊँ क्षेत्र के लोकगीतों में सामाजिक जीवन, पारिवारिक संबंधों और ग्रामीण व्यवस्था पर हल्का हास्य और व्यंग्य मिलता है। झोड़ा, चांचरी और छपेली जैसे लोकगीतों में स्त्री-पुरुष संवाद, प्रेम और सामाजिक व्यवहार में व्यंग्यात्मक भाव दिखायी देते हैं।
प्रसिद्ध लोककवि गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’ को आधुनिक कुमाऊँनी लोककाव्य का प्रमुख प्रतिनिधि माना जाता है। उनके गीतों में अंग्रेज़ी शासन, सामाजिक असमानता और ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं पर व्यंग्य मिलता है।
इन भाषाई क्षेत्रों के लोकगीत और लोककवियों की रचनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि लोकसाहित्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक जीवन का सजीव प्रतिबिंब है। कुमाऊँनी, ब्रज, अवधी और राजस्थानी लोककवियों की रचनाओं में प्रकृति, प्रेम, भक्ति, वीरता और सामाजिक जीवन के विविध आयामों के साथ व्यंग्य-बोध भी पर्याप्त रूप में विद्यमान है।
साहित्य की लिखित परंपरा के विकसित होने के पश्चात रीतिकालीन एवं भक्तिकालीन कवियों की रचनाओं में भी व्यंग्य की सूक्ष्म अंतर्धारा दिखायी देती है। सूरदास, तुलसीदास, केशवदास, बिहारी, रहीम और रसखान जैसे कवि, जो अपनी रचनाओं के कारण लोक-जीवन में व्यापक रूप से प्रतिष्ठित हैं, के काव्य में भी यह प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। सूरदास, जो कृष्णभक्ति और वात्सल्य रस के कवि माने जाते हैं, उनके कृष्ण-लीला प्रसंगों में गोपियों और यशोदा के संवादों में चुटीली शिकायतें और व्यंग्यात्मक स्थितियाँ मिलती हैं। उनके एक पद “मैया! मोरी मैं नहीं माखन खायो। ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मोहि मुख लपटायो” में कृष्ण अपनी शरारत छिपाने के लिए सखाओं पर दोष डालते हैं, जिससे हास्य और व्यंग्य का वातावरण बनता है।
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने काव्य में मानव-स्वभाव की कमज़ोरियों और व्यवहार की विडंबनाओं पर संकेतात्मक व्यंग्य किया है। ‘रामचरितमानस’, ‘कवितावली’ और ‘दोहावली’ में यह प्रवृत्ति दिखायी देती है। रामचरितमानस में परशुराम-लक्ष्मण संवाद इसका सशक्त उदाहरण है, जहाँ लक्ष्मण परशुराम के क्रोध और दंभ पर व्यंग्य करते हैं- “इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।” यानि यहाँ कोई कुम्हड़े की बेल नहीं है, जो आपकी उँगली देखकर ही मुरझा जाये। इसी प्रसंग में लक्ष्मण आगे कहते हैं- “कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।” मतलब “आपके वचन ही करोड़ों वज्र के समान हैं, धनुष-बाण और परशु व्यर्थ ही धारण किये हुए हैं।”
रामचरित मानस में ही तुलसीदास सत्ता की उस प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं जिसमें शक्तिशाली लोगों के अपराध भी छिपा दिये जाते हैं- “समरथ को नहिं दोष गोसाईं।” इसी तरह दूसरों को उपदेश देने लेकिन स्वयं उस पर न चलने वालों पर वह कटाक्ष करते हैं- “पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।” इस चौपाई “सुर नर मुनि सब कै यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती” का भावार्थ है देवता, मनुष्य और मुनि सभी स्वार्थ के कारण प्रेम करते हैं यानी यहाँ मानवीय स्वार्थ पर तीखा व्यंग्य विद्यमान है। सत्ता और अहंकार के संबंध पर व्यंग्य करते हुए तुलसीदास लिखते हैं- “नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं, प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं” यानि इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसे सत्ता मिलने पर अहंकार न हो। इस तरह हम पाते हैं कि रामचरितमानस में तुलसीदास का व्यंग्य तीखा या आक्रामक न होकर सूक्ष्म, नैतिक और व्यवहारिक स्वरूप का है।
केशवदास ने अपने काव्य में दरबारी जीवन और सामाजिक आडंबर पर संकेतात्मक व्यंग्य किया है। उनकी कृतियों ‘रसिकप्रिया’ और ‘कविप्रिया’ में व्यंग्य नीति और उपदेशात्मक कथनों के माध्यम से व्यक्त होता है। वे मानवीय दंभ और दिखावे की प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हैं। उदाहरणस्वरूप – “केशव केसन अस करी, जस अरिहूँ न कराहिं। चंद्रवदनि मृगलोचनी, बाबा कहि कहि जाहिं॥” में वह अपने सफेद बालों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि अब सुंदर स्त्रियाँ उन्हें बाबा कहकर बुलाती हैं। बिहारी की कृति ‘बिहारी सतसई’ सूक्ष्म व्यंग्य और संकेतपूर्ण शैली के लिए प्रसिद्ध है। उनके दोहों में प्रेम, समाज और राजनीति पर गहरी टिप्पणियाँ मिलती हैं।
रहीम के दोहों में नीति, जीवनानुभव और सामाजिक व्यवहार पर सूक्ष्म व्यंग्य मिलता है। उनके दोहे जीवन के व्यवहारिक पक्षों को उजागर करते हैं। उदाहरणार्थ इस दोहे को देखिए – “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि॥” रहीम यहाँ उन लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो केवल बड़प्पन, पद या शक्ति के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और छोटे या साधारण लोगों को महत्व नहीं देते। यह रूपकात्मक व्यंग्य का बेहतरीन उदहारण है, जिसमें व्यंग्य ‘सौम्य और संकेतात्मक’ रूप में उपस्थित है।
कृष्णभक्त कवि रसखान के पदों में कई स्थानों पर शाही वैभव और सामाजिक आडंबर के प्रति हल्का व्यंग्य भी दृष्टिगोचर होता है। “मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।” उनका प्रसिद्ध पद है जिसमें वह ब्रज के ग्रामीण जीवन को आदर्श बताते हुए अप्रत्यक्ष रूप से राजसी जीवन की कृत्रिमता पर व्यंग्य करते प्रतीत होते हैं।
भक्तिकालीन कवियों में कबीर का स्थान सबसे प्रखर व्यंग्यकार के रूप में स्वीकार किया जाता है। उनका व्यंग्य धार्मिक पाखंड, जाति व्यवस्था और बाह्याचार पर केंद्रित है। उदाहरणस्वरूप- “माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥” इस पद में कबीर बाहरी पूजा-पाठ पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि माला फेरने से कुछ नहीं होगा, जब तक मन का परिवर्तन न हो। इसी प्रकार उन्होंने मूर्तिपूजा पर व्यंग्य करते हुए लिखा है – “पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार। ताते तो चाकी भली, पीस खाए संसार॥” धार्मिक आडंबर पर व्यंग्य करते हुए वह कहते हैं – “कांकर पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, बहरा हुआ खुदाय” जिसका आशय है यदि ईश्वर सर्वव्यापी है तो मस्जिद की मीनार पर चढ़कर जोर से पुकारने की क्या आवश्यकता है।
अभी हमने लोकगीतों और लोककाव्य में व्यंग्य की उपस्थिति पर चर्चा की, अगली कड़ी में लोककथाओं और नाट्य पर इस चर्चा को जारी रखा जाएगा…

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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