
- March 31, 2026
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मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से....
आज अमेरिका और टू किल अ मॉकिंगबर्ड
टू किल अ मॉकिंगबर्ड, जब हार्पर ली ने 1960 में यह उपन्यास लिखा, तब अमेरिका बड़े बदलावों की कगार पर था। सिविल राइट्स मूवमेंट की शुरूआत हो चुकी थी। टू किल अ मॉकिंगबर्ड सही जगह और सही वक़्त का उपन्यास था।
उपन्यास की कहानी अमेरिका के एक छोटे-से क़स्बे मेकॉम्ब, अलाबामा में शुरू होती है। उपन्यास में यह ग्रेट डिप्रेशन का दौर है। अपनी शुरूआत में कहानी स्काउट फिंच नाम की एक बच्ची के अनुभव की है, लेकिन कथा सुनाने वाली स्काउट फिंच एक वयस्क किरदार है। स्काउट अपने भाई जेम और सादा और इंसाफ़-पसंद पिता अटिकस के साथ रहती है जो एक वकील हैं। बच्चों की ज़िंदगी अमूमन जिज्ञासा और खेलकूद वाली है, लेकिन अपने एक दिलचस्प या अजीब पड़ोसी बू रेडली को लेकर उनके मन में भय और उलझन का भाव है। यह कैफ़ियत बू रेडली को लेकर मेकॉम्ब में लगभग सभी की है।
कहानी के अगले पड़ाव में अटिकस एक अश्वेत आदमी टॉम रॉबिन्सन का केस लेते हैं, जिस पर एक गोरी औरत के साथ बलात्कार का इल्ज़ाम है। यह घटनाक्रम अमेरिकी समाज के पूर्वाग्रह और भेदभाव वाली बुनावट की तरफ़ बढ़ता है। यह उस पूर्वाग्रही आशंका की परतें भी खोलता है कि स्काउट और जेम जिस तरह बू रेडली को देखते थे, वह उसके उलट है।
इस पूरी कहानी के केंद्र में अटिकस फिंच हैं, जो अमेरिकी साहित्य के सबसे अहम नैतिक किरदारों में से एक माने जाते हैं। उनका साहस किसी कोलाहल और नाटकीयता का मोहताज नहीं है, उसमें स्थिरता और दृढ़ता है। वे टॉम रॉबिन्सन का बचाव अपनी और उपन्यास की नैतिक नींव बनाने के लिए करते हैं। बच्चों के सामने इस लहजे में एक उदाहरण पेश करते हैं कि साहस कोई अमूर्त भाव नहीं है, उसकी सामाजिक भूमिका है।
‘मॉकिंगबर्ड’ उपन्यास में मासूमियत और सादापन का प्रतीक है। अटिकस अपने बच्चों से कहते हैं मॉकिंगबर्ड को मारना पाप है, क्योंकि वह किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाता, बल्कि अपनी मधुर आवाज़ से दुनिया को ख़ूबसूरत ही बनाता है। बच्चों की मासूमियत मॉकिंगबर्ड है। नस्लभेद का शिकार टॉम रॉबिन्सन और बू रेडली भी मॉकिंगबर्ड हैं। उपन्यास का सबसे बड़ा योगदान भी यह है कि वह टेम्पलेट नहीं, कसौटी है। वह आदर्शवाद से नहीं उपजा है। अदालत के दृश्य और अमेरिकी समाज का बेलौस चित्रण इस उपन्यास की ज़रूरत को साबित करता है।
टू किल अ मॉकिंगबर्ड में हार्पर ली ने अमेरिका के दक्षिण के लोगों की रोज़मर्रा की देसी और स्थानीय भाषा का जीवंत इस्तेमाल किया है। 1930 के दशक के दक्षिणी समाज को दिखाने के लिए उन्होंने अलग-अलग सामाजिक वर्गों की अलग-अलग बोलियों का कहानी में इस्तेमाल किया है।
उपन्यासों में नायकत्व का ह्रास हुआ है, लेकिन इस ह्रास की पूर्ति सिर्फ़ उपन्यासों में नायक की पुनर्स्थापना से पूरी नहीं होगी। सत्यकाम का धर्मेंद्र अब नहीं रहा, और मॉकिंगबर्ड का अटिकस जिस तरह के जोखिम रॉबिन्सन के केस के लिए उठाता है, वह रीढ़ सिर्फ़ वैयक्तिक नहीं होती। उसमें मानवीयता के आत्म के उत्थान का भी साहस होता है, लेकिन जैसा कि कहा, बग़ैर नाटकीयता और कोलाहल वाला साहस।
आज अमेरिका जिस राजनीतिक स्थिति में है, उसके पतन का जो क्रम है, वह किसी उपन्यास में उसके आत्म को ढूंढकर नहीं रोका जा सकता। वह चक पॉलनिक, वह इरविन वेल्श, फ़िलिप रॉथ और डर्टी रियलिज़्म के सब परदे उठ चुके हैं। मैं वह उपन्यास ढूँढ़ता फिरता हूँ जिसमें अमेरिका की खोयी हुई नैतिक धुरी ढूंढी जा सके।

निशांत कौशिक
1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।
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