justice surya kant, cji, cockroach
कटाक्ष श्रीकांत आप्टे की कलम से....

मीलॉर्ड ने कह दिया कॉकरोच!

             दुनिया में दो क़िस्म के लाॅर्ड हैं। एक वो जो ऊपर बैठा है और दूसरे नीचे धरती पर मीलॉर्ड। ऊपर लाॅर्ड, नीचे मीलॉर्ड। ऊपर वाला लाॅर्ड के तो कई नाम हैं। किसी का ख़ुदा है तो किसी का जीसस। मज़े तो हिंदुओं के हैं। ऊपर आसमान में एक, दो नहीं बल्कि पूरे तैंतीस करोड़ लाॅर्ड हैं हिंदुओं के। आसमान ही क्यों हमारे देश में तो नीचे धरती पर भी हर ओर भगवान दरिद्र नारायण हैं।

तैंतीस करोड़ से भी बहुत ज़्यादा हैं दरिद्र नारायण। भूखे नंगे दरिद्र नारायण। इन दरिद्र नारायणों को आह्वान किया जाता है कि जाओ बेटा धर्म की रक्षा करो। उन्हें समझा दिया गया है कि भूखे, नंगे रहना तो उनकी नियति है। इसके लिए रोना बंद करो। ऊपर वाला नारायण भला इसमें क्या कर सकता है। वह तो अडानियों, अंबानियों जैसों से घिरा रहता है। उसे तो उन्हीं से फुर्सत नहीं मिलती। दरिद्रनारायण, तुम जैसों की ओर देखने का टाइम ही नहीं है उसके पास।

ऊपर जो तैंतीस करौड़ बैठे हैं वे और कुछ नहीं तो कम-से-कम धर्म की रक्षा ही कर लें। पर वे यह काम भी नहीं करते। धर्म की रक्षा का काम भी भक्तों को आउटसोर्स कर दिया है। हाथों में लाठियां और लाउडस्पीकर थमा दिये हैं कि जाओ बेटा मस्जिदों के सामने हनुमान चालीसा बजाओ, चर्च के कंपाउंड में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित करो। कोई विरोध करे तो हाथ में लाठी है ही। पुलिस से डरने की ज़रूरत ही नहीं। दरोग़ा अपना ही आदमी है।

हिंदुओं के तैंतीस करोड़ लाॅर्ड आसमान में और उनसे भी ज़्यादा धरती पर। ये भी काफ़ी नहीं थे शायद। इसलिए अब अदालतों के मीलॉर्ड भी हिंदुओं के हो गये हैं।

ख़ुदा और जीसस तो माइनाॅरिटी में थे और हैं। पहले बोल लेते थे परंतु आजकल चुप ही रहते हैं। उनके साथ-साथ उनका ख़ुदा और जीसस भी आजकल राष्ट्रद्रोही कहलाता है।

मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में बैठे लाॅर्डों से तो तू तड़ाक कर सकते हो, काम न होने पर उसे भला-बुरा भी कह देते हो। लेकिन ऐसी हिमाकत अदालतों में बैठे मीलॉर्डों के साथ मत कर बैठना। अगर हिमाकत कर दी तो मार-मारकर ऐसी सुजा देंगे कि बैठ नहीं पाओगे।

मीलॉर्ड आख़िर मीलॉर्ड होते हैं। उनकी बात ही और है। किसी के लिए कुछ भी कह सकते हैं। परंतु उन्हें कोई कुछ नहीं कह सकता। कह दिया अगर ग़लती से भी तो फ़ौरन अदालत की कंटेंप्ट का पंजा, कहने वाले की गर्दन दबोच सकता है।

मुल्क की सबसे ऊंची अदालत के सबसे ऊंचे हाकिम ने मुल्क के बेरोज़गार जवानों को काॅकरोच कह दिया। सबसे गंदे जीवों में जिसकी गिनती वो काॅकरोच। जो घर में दिख जाये तो सारा घर क़िस्म-क़िस्म के कीटनाशकों से जिसे मार डालने की कोशिशों में लग जाता है, वो काॅकरोच।

मीलॉर्ड, आप बहुत पढ़े-लिखे हैं फिर भी काॅकरोच की ताक़त आप भूल गये। बहुत शक्तिशाली होता है काॅकरोच। धरती पर सबके ख़त्म होने के बाद भी एक ही प्राणी जो ज़िंदा बचा था, वो था काॅकरोच।

मीलाॅर्ड माना कि प्रकृति ने जीभ में हड्डी नहीं दी है। लेकिन इसका ये मतलब तो क़तई नहीं कि जीभ को मनमाना घुमाकर किसी के लिए भी आप कुछ भी कह दें। देश के युवाओं को आपने काॅकरोच कह दिया।

सबसे ऊंचे मीलॉर्ड देश के युवाओं से ख़फ़ा हैं। इस बात पर ग़ुस्सा हैं कि ये पढ़े-लिखे बेरोज़गार फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब के ज़रिये सिस्टम पर अटैक क्यों करते हैं। सड़कों पर सिस्टम के ख़िलाफ़ आंदोलन क्यों करते हैं।

सालों मेहनत करके देश के युवा कांप्टीशन इम्तिहान देते हैं। इम्तिहान ही कैंसल हो जाता है।कई-कई इम्तिहान देने के बाद भी उनके और नौकरी के बीच का फ़ासला जस का तस बना रहता है। उन युवाओं की निराशा और तकलीफ़ को आप समझ ही नहीं सकते मीलॉर्ड क्योंकि मीलॉर्ड बनने के लिए कोई कांप्टीशन आपको पास नहीं करना पड़ता।

एक सवाल और मीलॉर्ड। क्या इस मुल्क में सिस्टम कहीं बचा भी है? अगर है तो इन बेरोज़गारों को काम क्यों नहीं देता? पकोड़े तलने या नाली की गैस से चाय बनाने को क्यों कहता है? सिस्टम बनाता कौन है? सरकार। जो सिस्टम इनके लिए काम ही नहीं करता उस सिस्टम पर अटैक तो उनका संवैधानिक अधिकार है। जी हां, वही संविधान जिसकी शपथ आपने मीलॉर्ड की कुर्सी पर बैठने से पहले ली थी। उसी संविधान के दिये अधिकार का इस्तेमाल युवा करने लगे तो वे आपकी नज़रों में काॅकरोच हो गये।

2013-14 में सिस्टम पर अटैक करके, रामलीला मैदान में आंदोलन करके, सिस्टम के ख़िलाफ़ झूठा प्रचार करके ही मोदीजी प्रधानमंत्री और अमित शाह गृहमंत्री बने हैं। मतलब आपकी डिक्शनरी के मुताबिक़ वे भी तो काॅकरोच हुए? उन्हें काॅकरोच कहकर बता दीजिए। मुरीद हो जाएगा यह देश आपका। मां क़सम, हम मान जाएंगे आपकी हिम्मत को।

श्रीकांत आप्टे, shrikant apte

श्रीकांत आप्टे

चार दशकों से व्यंग्य लेखन में सक्रिय। रंगमंच पर भी लेखन, अभिनय और निर्देशन। 150 से अधिक रेडियो नाटक प्रसारित। फ़िल्मों के लिए पटकथा एवं संवाद लेखन के साथ कविताओं एवं साहित्य के पोस्टरों पर भी काम। संपर्क: 91799 90388।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!