
बरहज आश्रम और महुआ डाबर संग्रहालय परिवार ने बलिदान शताब्दी वर्ष मनाने के लिए कसी कमर
बिस्मिल की समाधि को राष्ट्रीय स्मारक के दर्जे की मांग
बरहज, देवरिया। शहीदों की यादों को संरक्षित करने के लिए समर्पित एक संस्था ने घोषणा की है कि वह आगामी दिनों में भारत के अमर स्वतंत्रता संग्राम नायक रामप्रसाद बिस्मिल के बलिदान का शताब्दी वर्ष को पूरी श्रद्धा से मनाएगी। बिस्मिल के बलिदान शताब्दी वर्ष के प्रथम चरण में महुआ डाबर संग्रहालय परिवार द्वारा 17, 18 और 19 दिसंबर, 2026 को गोरखपुर में तीन दिवसीय “राष्ट्रीय स्मृति समारोह” का आयोजन किया जाएगा, जिसमें देश भर से क्रांतिकारी शहीदों के वंशज उपस्थित होंगे।
दरअसल, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सर्वाधिक शहादत देने वाले गौरवशाली क्रांति-तीर्थ महुआ डाबर (बस्ती) के वंशजों द्वारा संचालित महुआ डाबर संग्रहालय परिवार ने बरहज आश्रम पहुँचकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कमांडर के रूप में भी प्रसिद्ध रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जी की समाधि-स्थल और प्रतिमा पर श्रद्धा-सुमन अर्पित किये।
महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राना, क्रांतिकारी विचारक अविनाश कुमार गुप्ता और संग्रहालय परिवार के सदस्यों ने समाधि पर पुष्प अर्पित कर, बलिदान शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का विधिवत ब्यौरा दिया। बरहज आश्रम के पीठाधीश्वर महंत आंजनेय दास जी महाराज ने संग्रहालय परिवार का स्वागत किया।
क्रांतिकारी विचारक अविनाश कुमार गुप्ता ने याद किया कि बिस्मिल ने भारत की स्वतंत्रता के लिए गोरखपुर कारागार में 19 दिसंबर, 1927 को अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। इस बलिदान की शताब्दी पर हमें शहीदों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना ही चाहिए। वही, डॉ. शाह आलम राना ने बताया…
“बिस्मिल की समाधि पर संग्रहालय परिवार का आना-जाना दशकों से रहा है। बरहज आश्रम क्रांतिकारियों का सदैव से केंद्र रहा है, इसी कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उन दिनों आश्रम को तहस-नहस कर ‘ग़ैर-कानूनी’ घोषित कर दिया था। बाबा राघवदास गोरखपुर जेल में बिस्मिल जी से निरंतर भेंट करने जाते थे। 19 दिसंबर, 1927 को राप्ती तट पर अंतिम संस्कार के समय बाबा राघवदास स्वयं उपस्थित थे। वे उनकी अस्थियों को खद्दर की चादर में लपेटकर बरहज आश्रम लाये और 20 दिसंबर, 1927 को ताम्र-पात्र में रखकर आश्रम में ही यह समाधि स्थापित की। यही बिस्मिल की प्रथम और मूल समाधि है। इस समाधि की मिट्टी आज भी क्रांति की सुगंध देती है।”

शताब्दी वर्ष की पुकार
समाधि पर नमन के बाद संग्रहालय परिवार ने यह चिंता जतायी कि अमर शहीद का समाधि स्थल ऐसी हालत में नहीं है, जिसे संतोषजनक कहा जा सके। इतना अहम स्थान होते हुए भी यह लगभग वीरान और जर्जर पड़ा हुआ है। बिस्मिल के बलिदान शताब्दी वर्ष को राष्ट्रीय महापर्व के रूप में ऐतिहासिक बनाने के लिहाज़ से शासन-प्रशासन के सामने मांगपत्र भी रखा गया। इसके अनुसार:
- बरहज आश्रम स्थित समाधि परिसर में ‘अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल बलिदान शताब्दी शिलालेख’ का भव्य अनावरण किया जाये, जिस पर अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर बिस्मिल, बाबा राघवदास और बरहज आश्रम का गौरवशाली इतिहास अंकित हो।
- पर्यटन और संस्कृति विभाग द्वारा समाधि स्थल का भव्य सौंदर्यीकरण, टफन ग्लास प्रदर्शनी, नित्य दीपदान, सी.सी.टी.वी. सुरक्षा और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर स्वतंत्रता संग्राम सर्किट के पर्यटन मानचित्र पर अंकित किया जाये।
- दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ शोध पीठ की स्थापना और सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्र को ‘बिस्मिल स्वर्ण पदक’ प्रदान किया जाये।
- आगामी 19 दिसंबर, 2026 को गोरखपुर जिला कारागार स्थित बिस्मिल के फाँसी-स्थल पर ज़िला प्रशासन द्वारा 21 गन-शॉट की शस्त्र-सलामी के साथ राजकीय सम्मान, पुष्पचक्र अर्पण और बरहज, गोंडा, अयोध्या, प्रयागराज की माटी के कलशों पर भारतीय वायुसेना द्वारा पुष्प-वर्षा करवायी जाये।
- बलिदान शताब्दी पर 100 रुपये का स्मारक सिक्का, 5 रुपये का डाक टिकट और प्रथम दिवस आवरण जारी किया जाये।
- गोरखपुर जेल की पावन मिट्टी से देश भर में 100 स्थानों पर ‘शताब्दी स्मारक उपवन’ स्थापित किए जाएं, जिसकी शुरूआत बरहज आश्रम से हो।
- शताब्दी वर्ष को ‘अमर शहीद एकता वर्ष-2027’ घोषित किया जाये, स्कूली पाठ्यक्रमों में बिस्मिल का जीवन-चरित्र जोड़ा जाये और शहीदों पर शोध हेतु ‘शहीद छात्रवृत्ति’ प्रारंभ की जाये।
- संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान सदन में चारों शहीदों – रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, अशफ़ाकउल्ला ख़ां और ठाकुर रोशन सिंह को सर्वदलीय श्रद्धा-सुमन अर्पित किये जाएं।
- रामप्रसाद बिस्मिल पर शोधपरक समग्र ग्रंथ प्रकाशित किया जाये और उनसे जुड़ी दुर्लभ तस्वीरों और दस्तावेज़ों की डिजिटल मेमोरियल आर्काइव/3D-VR आर्काइव बनायी जाये तथा आकाशवाणी, दूरदर्शन और संसद टीवी पर नियमित कार्यक्रमों का प्रसारण हो।
जन-जन से अपील
इस अवसर पर महंत आंजनेय दास ने कहा कि महान बलिदानी रामप्रसाद बिस्मिल बलिदान शताब्दी समारोह को ऐतिहासिक और गौरवशाली बनाने के लिए देश-विदेश में बसे बिस्मिल-प्रेमियों के साथ गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क किया जाएगा। बरहज पीठाधीश्वर ने अपील करते हुए कहा कि शासन-प्रशासन और आमजन को शताब्दी वर्ष को यादगार बनाने के लिए हर तरह से सहयोग करना चाहिए।
दास ने कहा कि इस अवसर पर बरहज आश्रम इस शताब्दी समारोह में महुआ डाबर संग्रहालय के साथ सदैव खड़ा है। हमें भरसक कोशिश करना चाहिए कि बिस्मिल की कीर्ति-रक्षा में कोई चूक न रह जाये।
-प्रेस विज्ञप्ति
