
- April 26, 2025
- आब-ओ-हवा
- 0
गीत अब
ज्ञानप्रकाश पांडेय
शब्द ये
गंभीरता खोने लगे हैं
भाव गूँगे सिर झुकाते
मात खाये-से
शब्द के कंकाल में हैं
मुँह छुपाये-से
शोर
शब्दों में प्रबल होने लगे हैं
भैंस ज्यों खूँटा तुड़ाकर
खेत चर ले
घाम जैसे चाँदनी का
चीर हर ले
शब्द
शासन हीन-से होने लगे हैं
सर टिके हैं साधनों की
चौखटों पर
हो मुखर कैसे भला
प्रतिवाद का स्वर
शब्द,
मुश्किल देखकर रोने लगे हैं
…..

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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