aabe gum classic by mushtak ahmed yousufi blog by azam
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

आब-ए-गुम: यूसुफ़ी की काट का अकाट कारनामा

        मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी की यह किताब उर्दू तंज़-ओ-मिज़ाह (हास्य-व्यंग्य) साहित्य की सबसे अच्छी किताबों में से एक मानी जाती है। यह 1989 में प्रकाशित हुई थी। यह हास्य और व्यंग्य लेखों का संग्रह है, जो अपने अनोखे प्रस्तुतिकरण, डीप नॉस्टैल्जिया (पुराने दौर की यादों) और सोशल सटायर की वजह से उर्दू साहित्य में एक शाहकार (मास्टरपीस) है।

यह संग्रह पुराने समय के पात्रों और माहौल को दिलचस्प ढंग से पेश करता है। पात्र नॉस्टैल्जिक और प्रसिद्ध हैं, जिनमें भारत की मिश्रित संस्कृति और माइग्रेशन के बाद की स्थिति उभरकर सामने आती है। जहां तक लेखन कला की बात है, मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी उर्दू साहित्य के अकेले ऐसे व्यंग्यकार हैं, जो अपने लेखन से हमें हंसाने और दुखी होने पर मजबूर करते हैं। इस संग्रह में कई अध्याय शामिल हैं, जिनमें से कुछ बहुत मशहूर हुए हैं, जैसे कि ग़नोदियम (भूमिका/पसअओ-पेश-दीबचा), हवेली, स्कूलमास्टर का सपना, कार काबुली वाला और अल्लाह दीन बे-चिराग़, शहर दो-क़िस्सा, धीरज गंज का पहला यादगार मुशायरा आदि।

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इस किताब में उर्दू लेखन का मनभावन अंदाज़ अपने चरमोत्कर्ष पर है। पढ़ने वाला साहित्यिक बारीकियों और गुदगुदाने वाले वाक्यों की वजह से बहुत आनंदित होता है। लेकिन पढ़ने वाला शब्दों के आंतरिक लहर में छिपी गंभीर बातों को महसूस किये बिना नहीं रह पाता। फिर हंसते-मुस्कुराते हुए उसकी संवेदनाएं चोटग्रस्त भी होती हैं और वह दुखी भी होता है। “आब-ए-गुम” मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की चौथी किताब का शीर्षक है। वैसे, उनकी हर किताब पढ़ने लायक़ और अपने आप में बहुत दिलचस्प होती है। उन्होंने इस किताब का क्रेडिट अपने बच्चों अरशद, सरोश, रुख़साना और सीमा को दिया है। कुछ दिलचस्प मगर काटदार वाक्य देखिए:

“एक औरत का ख़ूबसूरत होना ज़रूरी नहीं है, एक आदमी का अंधा होना ही काफ़ी है।”
“दुनिया में एक आदमी के रोने से ज़्यादा बेइज़्ज़ती वाली कोई चीज़ नहीं है।”
“भरे पेट इबादत नहीं हो सकती और ख़ाली पेट अय्याशी नहीं हो सकती।”
“शब्दों की लड़ाई में, चाहे कोई भी जीत जाये, सिर्फ़ सच ही शहीद होता है।”
“जब किसी आदमी को यह नहीं पता कि उसकी नाल कहाँ गड़ी है और उसकी हड्डियाँ कहाँ दफ़न हैं, तो वह उस मनीप्लांट जैसा हो जाता है जो बिना मिट्टी के सिर्फ़ बोतलों में ही पनपता है।”
“आज़ाद शायरी का उदाहरण बिना नेट के टेनिस खेलने जैसा है।”
“अगर कोई तक़रीर के दौरान जोश में आ जाये, तो वह मच्छरदानी का पर्दा ऐसे हटाता जैसे निकाह के बाद दूल्हा सेहरा उलटता है।”
“क़िबला की बीमारियों के कीटाणु अरबी बोलते हैं अंग्रेज़ी दवाओं के क़ाबू में नहीं आने के।”
“जो बात बोलने और सुनने वाले दोनों को झूठ लगती है, वह गुनाह नहीं है।”
“मौसम ऐसा है जैसे किसी के दिल में नफ़रत भरी हो।”
“अगर कोई नमाज़, नींद, खाने या गाली देते समय बीच में आएगा, तो मैं उसे गोली मार दूंगा।”

उनके कई वाक्य और कोट्स इतने मशहूर हुए कि लोग उन्हें फ़ेसबुक या दूसरी सोशल साइट्स पर पोस्ट करते रहते हैं। कुछ ने तो उनकी चुटीली बातों को इकट्ठा कर पूरी किताबें ही लिख दीं। यहाँ कुछ और दिलचस्प जुमले, फ़िक़रे आपके लिए:

“मर्द की आँख और औरत की ज़बान का दम सबसे आख़िर में निकलता है।”
“पाकिस्तान की अफ़वाहों में सबसे बड़ी ख़राबी यह है कि वे सच निकलती हैं।”
“मुसलमान ऐसे जानवर को प्यार से नहीं पालते जिसे वे ज़ब्ह करके खा नहीं सकते।”
“एक बार जब कोई आदमी प्रोफ़ेसर बन जाता है, तो वह ज़िंदगी भर प्रोफ़ेसर ही रहता है, भले ही वह बाद में समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।”
“जब ठंड होती है और रज़ाई पतली होती है, तो ग़रीब और ज़रूरतमंद लोग मंटो की कहानियाँ पढ़कर सो जाते हैं।”
“इंसान ही अकेला ऐसा जानवर है जो अपना ज़हर अपने दिल में रखता है।”
“मैं उस भोली-भाली पीढ़ी से हूँ जो दिल से यह समझती है कि बच्चे बुज़ुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं।”
“अलहम्दुलिल्लाह जवानी में भी हमारा हाल और हुलिया ऐसा नहीं रहा कि किसी ख़ातून का ईमान डगमगाये।”
“पुराना मुक़दमेबाज़ आधा वकील होता है, और एक लंबे समय से असाध्य बीमारी में ग्रसित आदमी पूरा डॉक्टर होता है।”

मुश्ताक़ अहमद युसुफ़ी की महत्ता का ऐसे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बहुत-से लोगों का कहना है कि मुश्ताक अहमद युसुफ़ी के उच्च स्तर तक कोई नहीं पहुंचा है। कुछ ने कहा यह युसुफ़ी का ज़माना है। कुछ ने कहा कि यह सदी मुश्ताक युसुफ़ी की सदी है। वह सिर्फ़ एक ह्यूमरिस्ट नहीं बल्कि एक थिंकर, एक फ़िलॉसफ़र हैं।

वह समय-समय पर अशआर को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। इसके लिए भी हुनर की आवश्यकता होती है। एक तो शायराना मिज़ाज होना, दूसरा अरूज़ (ग़ज़ल का छंदशास्त्र) का ज्ञान होना। क्योंकि उसी बह्र में, उसी पदभार में, शब्दों को बदलकर नया मतलब पैदा करना हो तो ये दोनों ज़रूरी हैं। इस लिहाज़ से, यह कहा जा सकता है कि वह सिर्फ़ ह्यूमरिस्ट और व्यंग्यकार ही नहीं थे बल्कि उनमें शायराना अभिरुचि भी थी। उन्होंने मशहूर शायरों के प्रसिद्ध अशआर पर ऐसी ख़ूबसूरत सर्जरी की है कि पढ़ने वाला अनायास ही मुस्कुराने लगता है: ये उदाहरण देखिए: प्रसिद्ध मिसरा है-

“पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गये”

उसकी सर्जरी देखिए और मज़े लीजिए-

“पहले ख़ां फिर ख़ान-ए-ख़ां फिर ख़ान-ए-ख़ानां हो गये”

“आब-ए-गुम” एक ऐसी किताब है जो पढ़ने वाले को ख़ूबसूरत वादियों में ले जाती है और कभी-कभी उसे दुख की गहराइयों में धकेल देती है। इसमें नॉस्टैल्जिया (स्मृतिलिप्सा) यानी अतीत की यादों का बहुत अच्छा इस्तेमाल किया गया है। हर लाइन और वाक्य में उपमाएं और इशारे हैं। शैली में रोचकता है और व्यंग्य विनोद के छिपे हुए ख़ज़ाने हैं। इसलिए, यह बार-बार पढ़े जाने की ललक जगाती है। इसमें ख़ान साहिब, अब्दुल कुद्दूस एम.ए.बी.टी., आदि जैसे कई पेन स्केच भी हैं। लेख में सहजता और दिलकशी है। वह अपनी मज़ाहिया इबारत और दिलकश स्टाइल से, समाज की सबसे घिनौनी सच्चाई और कड़वाहट को भी दिलचस्प तरीक़े से पेश कर देते हैं। उनके लेखन में एक ऐसा जोश दिखता है, जो किसी दूसरे व्यंग्यकार में नहीं दिखता। जैसा कि एक आलोचक ने कहा:
“वह मिज़ाह की दुनिया के बेताज बादशाह हैं और उनकी सल्तनत में किसी और का कोई हस्तक्षेप या दख़ल नहीं।”

एक नज़र: मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी का जन्म 4 सितंबर 1923 को जयपुर, टोंक, राजस्थान भारत में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल करीम ख़ान यूसुफ़ी था, जो जयपुर नगरपालिका के चेयरमैन थे। बाद में उन्हें जयपुर विधानसभा का स्पीकर भी बनाया गया। मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने अपनी शुरूआती पढ़ाई राजपूताना में की और आगरा यूनिवर्सिटी से बी.ए., फ़िलॉसफ़ी में एम.ए. और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री ली।

परिवार पाकिस्तान चला गया। वहां उन्हें मुस्लिम कमर्शियल बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर बनाया गया। बाद में उन्होंने कई ज़रूरी पद संभाले। वे पाकिस्तान बैंकिंग काउंसिल के प्रेसिडेंट भी बने। बैंकिंग सेक्टर में बेहतरीन सर्विस के लिए उन्हें क़ायद-ए-आज़म मेडल से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी पुस्तक “चिराग़ तले” में जिस तरह अपना परिचय दिया है, वह विलक्षण है। उन्होंने कुल पांच किताबें लिखी हैं। चिराग़ तले 1961, ख़ाकम ब दहन 1969, ज़र गुज़िश्त 1976, आब-ए-गुम 1990 और आख़िरी किताब थी शाम-ए-शेर याराँ 2014।

उन्हें पाकिस्तान से “हिलाल-ए-इम्तियाज़” और वहाँ का सबसे बड़ा सम्मान, “सितारा-ए-इम्तियाज़ (स्टार ऑफ़ डिस्टिंक्शन)” मिला। 20 जून, 2018 को कराची में 94 साल की उम्र में इंतिक़ाल हुआ।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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