
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
आता-जाता साल और शाइरी के रंग
वक़्त किसी का नहीं होता। वह सभी के साथ चलता है और सभी को साथ लेकर चलता है। शाइरी भी तो यही करती है। अपने साथ सभी को शामिल करती हुई चलती है। उसमें ज़िन्दगी की हर शै शामिल होती है। हंसी-ख़ुशी, ग़म, अपने रिश्ते-नाते, अपनी पीड़ाएं। सब कुछ शाइरी के भीतर जज़्ब होता जाता है। फिर यह गुज़रता वक़्त भला शाइरी से अछूता कैसे रह सकता है।
शाइरी ने हर गुज़रते लम्हे को अपने साथ शुमार किया और गुज़रते हुए पलों को लफ़्ज़ों के ज़रिये नयी ऊंचाइयां प्रदान कीं। शाइरी और समय सांसों की मानिंद हर पल चल रहे हैं। इनके रुकने से बहुत कुछ थम सकता है, इसीलिए ये कभी नहीं रुकते। लेकिन इन गुज़रते हुए पलों के साथ जो कुछ गुज़र जाता है उसे भुलाया नहीं जा सकता। नयी उम्मीद की ख़ुशी में बीते हुए लम्हों की कसक विस्मृत नहीं की जा सकती। अहमद फ़राज़ कहते हैं-
आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर
जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
बीते हुए ज़माने बीते हुए होते हैं, मगर आने वाला वक़्त भी कई सारी ख़्वाहिशों को अपने साथ लेकर आता है। नया वक़्त आता है तो दिल में नई उमंगें पैदा होती हैं और यह ख़्वाहिश भी इंसान रखता है कि नये वक़्त में उसकी हाथों की लकीरें संवर जाएंगी। इस उम्मीद में वह नये वक़्त का इस्तक़बाल करता है। ग़ालिब ने कहा भी है-
देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
लेकिन वक़्त बदलने से भला कहीं हाथों की लकीरें बदलती हैं! तक़दीर और तदबीर का खेल अलग-अलग होता है। वक़्त के भरोसे बैठने वाले वहीं के वहीं रह जाते हैं। तभी ग़ालिब की बात को पलट कर क़तील शिफ़ाई कुछ इस तरह तंज़ करते हैं-
जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में
इन सबके बावजूद नया तो नया होता है। उसके साथ भले ही इंसान की माली हालत न बदले लेकिन उसके ख़्यालों में ताज़गी आती है। कहीं कोई ऐसी मुबारकबाद मिल जाये जिससे दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। लगता है कि ज़िन्दगी अब तक बहुत वीरान थी और एक फ़ोन आते ही ज़िन्दगी बदल गयी। शाइरी उस एक फ़ोन से निकली हुई ख़ुशी को लफ़्ज़ों में क़ैद करना जानती है। अली सरदार जाफ़री कहते हैं-
ये किसने फ़ोन पे दी साल-ए-नौ की तहनियत मुझको
तमन्ना रक़्स करती है तख़य्युल गुनगुनाता है
नया साल एक नया कैलेंडर लेकर आता है। यह कैलेंडर घर की दीवार पर लग जाया करता है लेकिन बीता हुआ कैलेंडर दीवार से उतरना नहीं चाहता। वह दीवार से उतर भी जाता है तो दिल के भीत पर कहानी टंगा रहता है। आज़ाद गुलाटी कहते हैं-
साल-ए-नौ आता है तो महफ़ूज़ कर लेता हूँ मैं
कुछ पुराने-से कैलेण्डर ज़ेह्न की दीवार पर
ज़ाहिर-सी बात है, कैलेंडर बदलने से वक़्त नहीं बदलता। शाइरी इस बात को अपने भीतर जज़्ब कर लेती है, जो इन बदलते कैलेंडरों के बीच कहीं मौजूद होती है। बदलते वक़्त के बीच मौजूद लम्हों को अपने साथ लेकर चलती हुई शाइरी बहुत दूर तक जाती है। इस सिलसिले में अपना ही एक मौज़ू शेर याद आता है-
अपनी क़िस्मत के कैलेण्डर में कहां हो जनवरी
ख़त्म होता ही नहीं है जब दिसंबर प्यास का
बहरहाल, शाइरी उम्मीद करती है कि उसके चाहने वालों की ज़िन्दगी से तकलीफ़ों का दिसंबर ख़त्म हो और एक नयी ज़िन्दगी की शुरूआत ख़ुशनुमा जनवरी के साथ हो। बक़ौल फ़रियाद आज़र-
न कोई रंज का लम्हा किसी के पास आये
ख़ुदा करे कि नया साल सबको रास आये
आमीन!

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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बहुत उम्दा लेख। सटीक और प्रासंगिक शे’र। नववर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।