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पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

क्या हम ‘आख़िरी आविष्कार’ के नज़दीक हैं?

            हाल ही नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में सबके कान इसी पर लगे हुए थे कि ओपन-एआई के सीईओ सैम आल्टमैन क्या कहते हैं। उन्होंने उम्मीद के मुताबिक़ बड़ी बात ही कही। उन्होंने कहा- दुनिया आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस (ASI) यानी ‘सुपर ब्रेन’ के शुरूआती वर्जन से बस कुछ ही साल दूर है। उन्होंने यह भी कहा कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस किसी कंपनी के सीईओ से बेहतर काम करने लगे। उनके सपाट और भावविहीन चेहरे से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वे इस पर ख़ुशी जता रहे थे या चेतावनी दे रहे थे!

जब आल्टमैन एक बतौर सीईओ यह सब कह रहे थे, तो कई अन्य कंपनियों के संस्थापक या सीईओ और अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष उन्हें बड़े उत्साह से सुन रहे थे। इस पूरे परिदृश्य को देखकर मुझे निक बोस्ट्रोम की किताब ‘सुपर इंटेलिजेंस: पाथ्स, डैंजर्स, स्ट्रैटजिस’ (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2016) में दी गयी एक छोटी-सी कहानी याद आ गयी। आइए, पहले इस कहानी के लुब्बे-लुबाब को समझ लेते हैं:

एक बार गौरैयों का एक झुंड विचार करने लगा अगर उनके पास एक उल्लू हो तो उनका जीवन कितना आसान हो जाएगा। वह उनके घोंसले बनाने में मदद करेगा, उनके बच्चों की रक्षा करेगा और बिल्लियों से भी उन्हें बचाएगा। बुजुर्ग गौरैया पास्टस को यह विचार पसंद आया। उन्होंने किसी उल्लू को पकड़कर अपनी बस्ती में लाने का आदेश दिया। लेकिन स्क्रोनफिंकल नाम की एक समझदार गौरैया ने आगाह करते हुए कहा: ‘क्या हमें किसी उल्लू (जैसे शिकारी पक्षी) को उठाकर अपने बीच लाने से पहले उसे पालतू बनाने और नियंत्रित करने की कला नहीं सीख लेनी चाहिए? वरना वह हमें तबाह भी कर सकता है।’

इस पर पास्टस ने उससे कहा, अभी तो उल्लू लाना ही मुश्किल काम है। हम पहले उसे लेकर आ जाएं, पालतू बनाने की चिंता हम बाद में करेंगे। इसके बाद पूरा झुंड उल्लू को खोजने निकल गया।

बोस्ट्रोम अपनी इस कहानी को यहीं अधूरा छोड़ देते हैं।

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अब इस कहानी से थोड़ा आगे बढ़ते हैं। चाहे आल्टमैन हो या डारियो अमोदेई या इलॉन मस्क या सुंदर पिचाई, ये सभी वे गौरेया हैं, जो अपने बीच ‘उल्लू’ लाने को लेकर बहुत उत्साहित हैं। हालांकि इन्हें भी शायद पता नहीं है कि इस उल्लू को पालतू कैसे बनाना है। सभी कहानी की बुज़ुर्ग गौरैया पास्टस जैसी मानसिकता से ग्रस्त हैं कि पहले उल्लू तो आ जाये। उसे नियंत्रित कैसे करना है, इसके बारे में बाद में सोचेंगे। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या ‘बाद में’ हमें मौक़ा मिलेगा भी?

मानवीय स्पर्श वाली तकनीक की राह पर…

आल्टमैन ने जिस ‘सुपर ब्रेन’ या आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस (ASI) की बात की है, उसके आने में वक़्त है। लेकिन अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि हम आर्टिफ़िशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) की राह पर ज़रूर हैं। AGI को आसान तरीक़ों से समझें तो यह ऐसी मशीन या तकनीक होगी, जो बिल्कुल मनुष्य की तरह काम करेगी। परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेगी और उसके कामों में एक तरह का मानवीय स्पर्श होगा। और तब हममें से उन अधिकांश लोगों की वह आख़िरी उम्मीद भी ध्वस्त हो जाएगी, जो यह मानकर चल रहे हैं कि एआई कभी भी मनुष्य की बराबरी नहीं कर पाएगी या मनुष्यों जैसे निर्णय नहीं ले पाएगी।

AGI कब तक आ सकती है? इसी साल की शुरूआत में मूनशॉट्स पॉडकास्ट से बात करते हुए इलॉन मस्क ने 2026 के आख़िरी तक इसके आने की संभावना जतायी है। मस्क कुछ ज़्यादा ही आशावादी रहे हैं और इसलिए उनके इस अनुमान को अगर हम ख़ारिज भी कर दें, तब भी यह तय है कि वह देर-सबेर आएगी ही। आख़िर बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी? और फिर AGI के बाद आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस (ASI) और यहीं से हम सबकी चिंताएं नेक्स्ट लेवल पर पहुंच जानी चाहिए। यहां से चिंताएं सिर्फ़ नौकरियों के जाने की नहीं रह जाएंगी।

इंसानी दिमाग़ से हज़ार गुना बुद्धिमान!

जब एक कंपनी का सीईओ कहता है कि आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस किसी कंपनी के सीईओ से भी ज़्यादा बेहतर तरीक़े से काम कर पाएगी तो सवाल यह है कि फिर आख़िर हम इसे लाना क्यों चाहते हैं? क्या हमारे इन चंद अरबपतियों को इस बात का मुग़ालता है कि वे इसके ज़रिये पूरी दुनिया पर क़ब्ज़ा कर सकेंगे?

निक बोस्ट्रोम ने अपनी किताब ‘सुपर इंटेलिजेंस’ आज से क़रीब 12 साल पहले लिखी थी और इसमें वे सुपर इंटेलिजेंस के ख़तरों को लेकर बार-बार आगाह करते हैं। गौरैया और उल्लू की अधूरी कहानी में वे यह सवाल भी छोड़ जाते हैं कि सुपर इंटेलिजेंस के आने के बाद उसे नियंत्रित कैसे किया जाएगा?

इसी बात को जेम्स बराट ने अपनी किताब ‘अवर फ़ाइनल इन्वेंशन’ में और भी स्पष्ट ढंग से व्याख्यायित किया है। वे लिखते हैं शुरू में आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस का दिमाग़ कॉकरोच के दिमाग़ जितना होगा। फिर मनुष्य उसे पालेगा-पोसेगा। फिर उसका दिमाग़ चूहे के दिमा़ग जितना होगा, फिर एक नन्हे शिशु के मस्तिष्क जितना। यह तेज़ी से बढ़ता जाएगा। उनके मुताबिक़, जल्द ही वह समय आएगा जब उसका दिमाग़ मनुष्य के दिमाग़ से हज़ार गुना ज़्यादा भी हो सकता है। जब कोई मशीन इंसानों से हज़ार गुना ज़्यादा स्मार्ट हो जाएगी, तो वह हमें अपने दिमाग़ (कोड) में छेड़छाड़ नहीं करने देगी। बराट लिखते हैं, “सोचिए, क्या आप चाहेंगे कि आपसे कम बुद्धिमान जीव (जैसे चींटियां) आपके दिमाग़ को खोलकर उसे दोबारा प्रोग्राम करें? नहीं। यही तर्क ASI पर लागू होता है। यदि ‘मित्रता’ उसके शुरूआती कोड का हिस्सा नहीं है, तो वह बाद में इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। अगर हम उसमें ‘दोस्ती’ या ‘मानवता’ भरने की कोशिश करेंगे, तो वह इसे एक ख़तरे के रूप में देखेगी।”

यानी अगर आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस को मानवीय बनाना है तो ऐसा अभी करना होगा। उसके विकास के शुरूआती चरणों में ही उसमें वे तमाम मानवीय गुण भरने होंगे, जो इंसानी चेतना को बचाये रख सकें। पर क्या हमारे ये अरबपति और अमेरिका व चीन जैसे साम्राज्यवादी ऐसा करना चाहेंगे? 25 फरवरी की एक ख़बर बताती है कि अमेरिका के रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने टेक कंपनी एंथ्रोपिक पर सैन्य मामलों में ऐसी एआई का इस्तेमाल करने को कहा है जिसमें इंसानी नियंत्रण बिल्कुल भी न हो। दुर्भाग्य से, एंथ्रोपिक इसके लिए राज़ी भी हो गयी है।

बुद्धिमत्ता का विस्फोट…

कुछ को यह अब भी कपोल-कल्पित बातें लग सकती हैं, लेकिन विज्ञान में अगर कोई अवधारणा आयी है, तो भले ही उसके सच होने में कई साल या कई दशक या सदियां लग जाएं, मगर वह अंतत: हमारी ज़िंदगी की हक़ीक़त बन जाती है। आज से क़रीब 60 साल पहले की एक अवधारणा पर चलते हैं। ब्रिटिश गणितज्ञ इरविंग जॉन गुड ने 1965 में एक कॉन्सेप्ट दिया था: बुद्धिमत्ता का विस्फोट (Intelligence Explosion)। उन्होंने इसमें ‘अल्ट्राइंटेलिजेंट मशीन’ की बात कही थी। गुड के अनुसार, यदि कोई मशीन किसी भी बौद्धिक कार्य में मानव से बेहतर प्रदर्शन कर सके, तो उसे अल्ट्राइंटेलिजेंट मशीन कहा जाएगा। यदि ऐसी मशीन अस्तित्व में आ गयी, तो वह ख़ुद को लगातार और बेहतर करती जाएगी। यहीं से शुरू होती है ‘इंटेलिजेंस एक्सप्लोज़न’ की अवधारणा। मशीन स्वयं को और अधिक बुद्धिमान बनाती जाएगी। दिलचस्प बात यह है कि अपनी इस अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए गुड ने आगाह भी किया था कि ऐसी ‘प्रथम अल्ट्राइंटेलिजेंट मशीन’ मनुष्य का ‘आख़िरी आविष्कार’ होगा। हालांकि उन्होंने तब आर्टिफ़िशियल सुपर इंटेलिजेंस की बात नहीं की थी, लेकिन आज 60 साल बाद उनकी चेतावनी हमारे सामने आ खड़ी हुई है।

तो क्या हम गोरिल्ला बन जाएंगे?

आज कोई गोरिल्ला स्वयं निर्णय नहीं ले सकता। उसका भविष्य ख़ुद उससे ज़्यादा मनुष्यों पर निर्भर करता है। अगर मनुष्य चाहेगा तो ही वह ज़िंदा रहेगा। अब तक वह ज़िंदा है, मगर कब तक? यह वही गोरिल्ला है, जिससे मौजूदा मानव का विकास हुआ। निक बोस्ट्रोम 12 साल पहले ही आगाह कर चुके हैं, कहीं हमारी स्थिति उसी गोरिल्ला जैसी न हो जाए!

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

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