ज्ञानरंजन, gyan ranjan
अध्ययन अस्मिता सिंह की कलम से....

कृतित्व के आईने में ज्ञानरंजन

             हिन्दी के जाने-माने कहानीकार ज्ञानरंजन जी नहीं रहे। पर हिन्दी साहित्य को उनका योगदान निर्विवाद अविस्मरणीय रहेगा। ज्ञानरंजन जी का जन्म, 21 नवम्बर, 1936 में महाराष्ट्र के अकोला ज़िले में हुआ था। पर उनकी जीवन-यात्रा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक फैली रही।

साठ के दशक में ज्ञानरंजन जी एक सशक्त कहानीकार के रूप में हिन्दी साहित्य में प्रवेश करते हैं और बहुत जल्दी घंटा, बहिर्गमन, पिता आदि कहानियों को लेकर चर्चित तथा प्रसिद्ध भी होते हैं। ग़ौर करने वाली बात यह है कि वो दौर नयी कहानी के अवसान का और ‘अ-कहानी’ के जन्म और प्रसार का था। ज्ञानरंजन ‘नयी कहानी’ के स्वर हैं व्यंग्यात्मकता के साथ। सुप्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश का मानना है- “अगर ‘नयी कहानी’ व्यंग्य या अन्य तरीक़ों से मात्र कहानी विधा पर ही नकारात्मक रवैया अख़्तियार करे तो वक़्त के चलते वह अ-कहानी में तब्दील होती है।”

‘अ-कहानी’ का मूल स्वर था’ नकार’, यानी जो हो रहा है और जो है- सब ग़लत है। कुछ भी सही नहीं है। और कोई विकल्प भी नहीं है। ज्ञानरंजन की कहानियों का सारतत्व यही है। ज्ञानरंजन का दौर देश के इतिहास में वह दौर था, जब देश की जनता आज़ादी के मोहभंग से बुरी तरह निराश और आहत हो चली थी। चारों तरफ़ अन्धेरा-ही-अन्धेरा दिख रहा था। जनमानस उहापोह की स्थिति में विकल्पहीन होकर भी विकल्प की तलाश में क्षत-विक्षत हो रहा था। ज्ञानरंजन की कहानियाँ उस ऐतिहासिक समय के मनुष्य की छटपटाहट, बेचैनी, आत्मसंघर्ष (बदलते परिवेश के साथ बदलते रिश्तों, नैतिक मूल्यों और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, मृत परम्पराओं) के साथ संघर्ष और तत्कालीन समाज के कटु यथार्थ को मनोवैज्ञानिक ढंग से अभिव्यक्ति देती हैं पर तीखी व्यंग्यात्मकता के साथ, जो उनकी ख़ास पहचान है। कई आलोचक मानते हैं कि उनकी कहानियों में सिर्फ़ अन्धकार है। यह सच है कि उनकी कहानियाँ विकल्पहीन हैं। ज्ञानरंजन का ध्यान समय के सच का उद्घाटन करना ही था और उसे लेखक ने पूरी ईमानदारी से निभाया है। उनके मित्र और कहानीकार दूधनाथ सिंह ने उनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है-

” दरअसल ज्ञानरंजन की सारी कहानियाँ एक ही कथा, एक ही उपन्यास की छोटी-छोटी द्वीप हैं, दो कहानियों के बीच के अंतरालों को वृतान्त की डोर से जोड़ दीजिए। तब एक छोटे से, खंड-खंड अखंड कथा संसार का रूप खड़ा हो जाएगा। एक मध्यवर्गीय उदास महोत्सव, जिसमें पिता, माँ, भाई, बहने, प्रेमिका, पत्नियां, सेक्स की भूखी औरतें, एक चाईंं और चौकन्ना मैं और अराजक बिगड़ैल किन्तु कमनीय दोस्तों का एक स्वर्णिम नरक, अत्यंत ठंडी, चमकदार और नव कवित्वपूर्ण गद्य-भाषा में वर्णित है।”

एक तरह से दूधनाथ ने कमोबेश ज्ञानरंजन की कहानियों की सारी विशेषताओं को उजागर कर दिया है, सिर्फ़ उनकी कहानियों में सर्वत्र व्याप्त व्यंग्य के स्वर को, जो ज्ञानरंजन की मूल विशेषता है और जिनके कारण वे सर्वत्र चर्चित रहे और प्रसिद्ध हुए। उनकी स्थितियों और पात्रों के वर्णन और चित्रण की बेबाकी, मनोवैज्ञानिक और तार्किक तथा व्यंग्यात्मकता ही आलोचकों के आकर्षण का केन्द्र बनी और साठोत्तरी कहानी के दौर में ‘चार यार’ के रूप में प्रसिद्ध मंडली के चारों सदस्य- ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया में सर्वाधिक प्रसिद्धि और लोकप्रियता ज्ञानरंजन को मिली।

ज्ञानरंजन, gyan ranjan

ज्ञानरंजन का कहानी-लेखन का काल बहुत सीमित रहा। उन्होंने मात्र पच्चीस कहानियाँ ही लिखीं। जो ‘सपना नहीं’ नामक संकलन में संकलित हैं। उनकी कहानियों की संख्या कम अवश्य है पर महत्वपूर्ण है। यह ज्ञानरंजन की अलग विशेषता है कि कम अवश्य लिखा पर जितना भी लिखा महत्वपूर्ण लिखा।

उक्त कहानी-संग्रह के अलावा उनकी दो और पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। एक का नाम है, ‘कबाड़खाना’, इसमें संस्मरण, व्याख्यान, संपादकीय, रचनात्मक निबंध, साक्षात्कार, अख़बारी टिप्पणियां तथा एक उपन्यास अंश संकलित हैं। ‘कबाड़खाना’ के अतिरिक्त एक और प्रकाशित पुस्तक उपलब्ध है जिसका शीर्षक है, ‘उपस्थिति का अर्थ’, इसमें मुख्यतः व्याख्यानों, साक्षात्कारों तथा कुछ अन्य विधाओं की रचनाओं को संकलित किया गया है। एक तरह से उनका संपूर्ण साहित्य पाठकों को उपलब्ध है।

अब ज़रा उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलू पर ध्यान दिलाना ज़रूरी है और वह है एक संपादक के रूप में उनकी भूमिका और महत्व। जो ज्ञानरंजन को प्रसिद्धि के शिखर पर ले गया। ज्ञानरंजन जितने महत्वपूर्ण कहानीकार रहे उससे भी ज़्यादा चर्चित, प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण संपादक भी रहे। ‘पहल’ पत्रिका के 114 अंक निकालकर इस क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित कर दिया। जबसे लघु पत्रिकाओं का प्रचलन शुरू हुआ है तबसे आज तक चर्चित-अचर्चित किसी पत्रिका के छपने का इतना लम्बा इतिहास उपलब्ध नहीं होता है। कम से कम हिन्दी में। इस पत्रिका में छपना लेखक अपना सम्मान मानने लगे। इस पत्रिका ने जितनी प्रसिद्धि ज्ञानरंजन को दिलवायी, उसी अनुपात में इसमें छपने वाले लेखकों को भी।

अब एक बात पर ध्यान जाना लाज़िमी है कि हिन्दी में जहाँ कोई भी पत्रिका लम्बा जीवन नहीं जी पायी, चाहे वह महत्वपूर्ण हो या साधारण, उस माहौल में एकमात्र ‘पहल’ को ज्ञानरंजन कैसे इतने वर्षों तक लगातार निकालने में कामयाब रहे!

‘पहल’ और संपादक ज्ञानरंजन की कामयाबी के पीछे मुख्य रूप से प्र.ले.स. के लेखकों बहुत बड़ा सहयोग रहा है। जनवादी-लेखन की पहल शुरू हो चुकी थी और उसी दरम्यान ज्ञानरंजन ने कहानी लिखना छोड़ दिया था और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। प्रगतिशीलता के नाम पर प्रगतिशील लेखक संघ के लेखकों को योजनाबद्ध ढंग से ‘पहल’ में छापना शुरू किया। बाद में बहुत सारे प्रगतिशील लेखक ‘पहल’ के माध्यम से सामने आये। और इन लेखकों के सहयोग से ‘पहल’ पत्रिका भी नियमित रूप से निकलती रही। हिन्दी की ज़्यादातर लघु पत्रिकाएं समय-समय पर अर्थाभाव के कारण बन्द होती थीं। पर ‘पहल’ के रास्ते में ऐसी कोई रुकावट नहीं आ पायी। उन दिनों सी.पी.आई का कांग्रेस से अच्छा रिश्ता था। वह दौर इन्दिरा गांधी का था। प्रगतिशील लेखक संघ एक मज़बूत संगठन था। जिसके चलते ‘पहल’ पत्रिका को अर्थ की कमी कभी नहीं हो पायी। ‘पहल’ ने भी उस ख़ेमे के लेखकों को छापा और सम्मान और ख्याति दिलवायी और लेखकों ने उसी तरह ‘पहल’ को हिन्दी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका बनाने में कारगर भूमिका अदा की। साथ ही पत्रिका के संपादक भी प्रसिद्धि पाते रहे। वैसे कुछ वर्षों पहले ज्ञानरंजन ने अपने को पहल से अलग करने की घोषणा कर दी थी।

तो, इस तरह हिन्दी में एक लघु पत्रिका ने संपादक ज्ञानरंजन के साथ एक नया कीर्तिमान रच दिया। आज हमारे बीच ज्ञानरंजन नहीं रहे, पर एक महत्वपूर्ण कहानीकार के रूप में और एक सफल और सशक्त संपादक के रूप में उनकी भूमिका हमेशा प्रेरणादायक रहेगी। ऐसा मेरा विश्वास है।

अस्मिता सिंह, asmita singh

अस्मिता सिंह

कहानीकार एवं आलोचक। लंबे समय तक मगध यूनिवर्सिटी और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिन्दी-साहित्य का अध्यापन। प्रमुख पुस्तकों में 'रंग से बेरंग होती ज़िंदगी', 'इन्तज़ार तो ख़त्म हुआ' (कहानी-संग्रह), 'फुलिया' (उपन्यास), 'शमशेर: अभिव्यक्ति की कशमकश (आलोचना पुस्तक), नारी मुक्ति: दशा एवं दिशा (नारी विमर्श), दलित अनुभव का सच (दलित-विमर्श) हैं। साथ ही, लू-शुन के पत्रों के अनुवाद और अन्य संकलित व संपादित पुस्तकें भी। बहुपठित एवं बहुप्रकाशित लेखक अस्मिता सिंह इन दिनों एस.ए. डांगे इंस्टीट्यूट आफ सोशलिस्ट स्टडीज़ एंड रिसर्च में निदेशक-प्रमुख हैं।

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