
- October 7, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
कटाक्ष आदित्य की कलम से....
अथ अशोभन शोभायात्रा कथा
डीजे से आ रहे कानफोड़ू शोर समतुल्य फ़िल्मी संगीत पर भक्तों को थिरकते और झूमते देखकर मेरा मन मायानगरी के मूर्धन्य कलाकारों के प्रति श्रृद्धा से भर जाता है। ऐसे उत्साह की वृष्टि करने वाले संगीत के रचयिताओं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी रचनाएं एक दिन सनातन के रक्षकों का उत्साह बढ़ाने में अपना योगदान देंगी। फ़िल्मी संगीत के समीक्षकों द्वारा फूहड़ करार दिये गये गाने आज धार्मिक शोभायात्राओं में हिट नंबर्स की श्रेणी में शामिल होकर पवित्र हो गये हैं। डीजे जॉकी भक्तों की डिमांड और क्षमताओं को देखते हुए फ़ास्ट और स्लो बीट के गाने यथा “मूंगड़ा मूंगड़ा मैं गुड़ की डली”, “अटरिया पे लोटन कबूतर”, सरकाइलो खटिया जाड़ा लगे” के रीमिक्स और “पीले पीले ओ मेरे राजा” आदि से भक्ति का समां बांध देता है। इस तरह देश का प्रगतिशील सनातन वर्ग अब सड़क पर ट्रैफ़िक को रोककर नाच-नाच कर धर्म की श्रीवृद्धि कर रहा है।
महिला श्रद्धालुओं द्वारा शोभायात्राओं के नृत्य में शामिल होने से स्थिति और विकट हो गयी है। पहले जो शोभायात्राएँ कम समय में संपन्न हो जाती थीं, अब तीन से चार गुना समय ले रही हैं। नवयुवतियों को नृत्य के लिए विशेष रुप से प्रेरित करने की गरज़ से मोहल्ले के लफंगे भी घेरा बनाकर सुरक्षा प्रदान करने का दिखावा करते देखे जा सकते हैं। दूसरी ओर नवयुवतियों के उत्साह और उमंग से डाह रखने वाली उम्रदराज़ महिलाएं भी घुटनों, कमर और पीठ दर्द की क़ीमत पर भक्ति नृत्य में फ़िल्मी स्टेप्स करने से नहीं चूक रही है। देश की बदहाल सड़कें इस तरह के आयोजनों के लिए जोखिम भरी हैं और यही मेरी चिंता का कारण है।
उत्तर भारत में यों तो वर्ष भर ही सड़कें किसी न किसी शोर-शराबे की साक्षी बनी ही रहती हैं। गणेश चतुर्थी, दो बार दुर्गा उत्सव, दशहरा, रामनवमी, हनुमान जयंती, ताजिये.. और फिर तमाम बाबाओं, नेताओं, मनौतियों, मान्यताओं आदि आदि के शोभायात्रामय आयोजन। सबसे विशिष्ट होता है श्रावण मास। इसको यातायात मास के रूप में मनाये जाने पर सरकारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस माह में आम जनता सड़क पर चलने से भी ख़ौफ़ खाती है। कावड़ यात्रा अपने आप में बहुआयामी वृहद् विषय है। हर बार की तरह उसके बहुत से पहलुओं पर गंभीर चर्चाएं हुई हैं, हम केवल प्रसंगानुसार उसके एक ही पहलू पर बात करेंगे जो चर्चा में रहता ही है। शिव जी के भक्त जब कावड़ धारण कर शिव तांडव करते हैं, तो हिमालय के क़दमों में फैला गंगा का मैदान काँप जाता है। कांवड़ियों के मनोरंजन के लिए इस बार शोभायात्रा की तरह कावड़ यात्रा को जीवंत बनाने के लिए बड़े रथों पर डांसिंग फ्लोर बनाकर भाड़े की नृत्यांगनाओं को नचाने का चलन देखा गया।

सर्वविदित है शिव तत्वों में भेद नहीं करते, अतः किसी भी चीज़ का निषेध नहीं करते। कांवड़िए ठहरे शिव के सच्चे भक्त इसीलिए उनके द्वारा नृत्य का विरोध नहीं किया गया। लेकिन बहुत-से लोगों के पेट दुःख रहे हैं, इस तरह के आयोजन को वे धर्मविरुद्ध और अश्लील करार दे रहे हैं। ज़रा-से नृत्य के पीछे कांवड़ियों के कठोर तप को बहुत कमतर आंका जा रहा है।
सड़क पर नाचने की कला का विकास कब शुरू हुआ! कहना मुश्किल है। इस कला के विस्तार से संबंधित साहित्य का अभाव है। गलियों में कीर्तन करते हुए भाव-विभोर होकर नाचने के प्रारंभिक प्रमाण को चैतन्य महाप्रभु के देशाटन से जोड़कर देखा जा सकता है, इससे इसे सड़क पर शोभायात्रा में किये जाने वाले नृत्य को धार्मिक और सामाजिक स्वीकृति मिल सकती है। शुरूआती दौर में कृष्ण जन्माष्टमी पर सड़क के यातायात को बाधित कर नृत्य करने को सिनेमा में बहुत बढ़ावा दिया गया, लेकिन आजकल लगभग सभी धर्मों और संप्रदायों के धार्मिक आयोजनों के दौरान निकाली गयी शोभायात्राओं में फ़िल्मी संगीत पर किये जा रहे नृत्य बारात से ज़्यादा साम्यता प्रदर्शित कर रहे हैं बनिस्बत कीर्तन और भजन के। भोले की बारात को तो अपवाद मानकर स्वीकार किया जा सकता है लेकिन बाक़ी का क्या?

आदित्य
प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।
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मज़ा आया पढ़कर, आदित्य
यह ज़रूरी लेख भी है. सिर्फ सनातन को महान कहते रहने से काम नही चलेगा. बेवकूफ़ी भी कोई सीधे शब्दों में बताये.
अगले लेख का इंतज़ार रहेगा.
आकांक्षा
Bahut badhiya