रति सक्सेना, rati saxena
पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....

अथर्ववेद और औषधीय विज्ञान

शामनिज्म में उपचार में संगीत और लयात्मक का आधार प्रकृति से घनिष्ठता है। प्रकृति में एक लय है, बिल्कुल संगीत की तरह। मनुष्य प्रकृति का एक अंग है, उसका संबन्ध पशु पक्षी पढ़ड़ पौधे आदि चेतन ही नहीं, अचेतन अंगों के साथ होता है। वह के साथ वह अन्य पाकृतिक साथियों से दूर होने लगा, लेकिन उनका अन्तर्सम्बन्ध सदैव जीवि रहता है। जब इन संबंधों को जागृत किया जाता है। शामनिज्म में स्वयं की अपेक्षा समुदाय को महत्व दिया जाता है। कुछ रोग व्यक्तिगत होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव समुदाय पर पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि घर में किसी एक को गंभीर रोग होता है, तो उसका प्रभाव संम्पूर्ण परिवार पर पड़ता है। अभी हम कोविद से जूझ कर निकले हैं , और हम समझते हैं कि रोग जब समुदाय में फेल जाता है तो कितना कष्टकारक होता है।

शामनिज्म अध्यात्म पर अधिक विश्वास करता है, उनका अध्यात्म दिखावा नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार है। वे जीने के एक कलात्मक तरीके कौ सिखाते हैं। संगीत प्रकृति का मूलभूत लय है, इसलिए शामनिज्म में संगीतात्मकता प्रमुख है। संगीत का आधार ध्वनि अथवा ताल है, शामनिज्म में संगीत और वाद्य ध्वनि का पूरी तरह से प्रयोग होता हैं।

लोक अथवा आदिवासी कलाओं में संगीतात्मक उपचार

यदि हम पूरे विश्व की बात न कर अपने देश के बारे में देखें तो हमें अनेक लोक कलाएं देखने को मिलेंगी जिनका उपयोग आदिवासियों द्वारा उपचार हेतु भी हुआ करता है। ये अनुष्ठानिक कलाएं भूमि की उर्वरता, मातृत्व बुरी आत्माओं का नाश आदि होता है। पहले जमाने में ये लोक गायक गृहस्थों के घर जाकर उनके सुख सुविधा के लिए मंगल कामना करूं। उदाहरण के लिए केरल की पडयनी नामक लोक कला मृत्यु से बचने के लिए अनुष्ठान के रूप में खेला जाता था, हालांकि आजकल यह व्यापारिकरण से प्रभावित हो गया है। इसी तरह काळम कोळम नामक लोक कला है, जो भूमि में उर्वरता और प्रजजन शक्ति के वर्धन के लिए खेला जाता था। इसी तरह तैयम, जिसका मूल अर्थ देवम है, जिसमें कामगार जन स्वय देवता का रूप धारण करते है्, और भद्र जनों को आशीर्वाद देते हैं।

एक वक्त ये कलाकार खेतों में काम करने वाले कामगार थे, जिनके साथ छुआछात की जाती थी। भद्र जन उनका स्पर्श भी नहीं करते थे। लेकिन केरल में कृषि कटने के बाद एक समय ऐसा आता था जब धानय की उपज नहीं हो सकती थी, एक तरह से सूखा होता था, उस वक्त इन कामगारों के पास समय होता था, और अमीरों के दान पर जीवित रहा जा सकता था। तभी संभवतया इस तरह की कलाओं ने जन्म लिया। सभ्य जनों को आशीर्वाद देने के बद्ले में उनका जीवन सहज हो जाता था। लेकिन न जाने कैसे और कब, वे अपने आप को देवता ही समझने लगते थे। संभवतया इसी से उनमें दैवीय शक्ति भी आने लगती, उनके वचन सत्य होने लगते। यह सब विचित्र तो है, लेकिन काफी हद तक सही है।

आदिम साहित्य में चिकित्सा के साथ कविता का प्रयोग

दुनिया में साहित्य की लम्बी परम्परा रही है, लेकिन अधिकतर साहित्य लुप्त हो गया है। मैं अपने देश की ही बात करूं तो हमारे देश में वैदिक साहित्य श्रुत परम्परा के कारण जीवित रहा। इसलिए मैं अथर्वेद से इसका उदाहरण देना चाहूंगी। मानव को आदि काल से आधि-व्याधि सताती रहीं हैं। अथर्ववेदीय काल तक मानव संस्कति उस पडाव तक पहुँच  चुकी थी कि लोक सामान्य भी आधि-व्याधियों के निवारण हेतु वनस्पति ओषधियों के प्रयोग को समझने लगे थे। किन्तु कभी-कभी औषधियों के साथ मनोवैज्ञानिक प्रभाव की भी आवश्यकता रहती है। यह प्रभाव वाचिक  शक्ति  से बढाया जा सकता है। यदि औषधियों के साथ प्रार्थना को भी सम्मिल्लित कर लिया जाए तो उनका प्रभाव बढ जाता है अर्थात् औषधियों के साथ पवित्र मन के साथ की  गई स्तुति अपरोक्ष रूप से औषधियों के  गुणों को बढ़ा देती हैं। इन स्तुतियों में औषधियों के गुणगान के साथ- साथ उन सभी परम शक्तियों से औषधियों के गुणवर्धन के लिए आग्रह निहित है जो पर्यावरण  को बनाए रखने में सहायक हैं ।जैसे प्रकाश दायक सूर्य, जल प्राप्ति के स्त्रोत वरुण, सभी तापो की सम्वाहिका अग्नि आदि। यह लोक की चिकित्सा पद्धति है ।आज भी आदिवासियों में देखी जा सकती है। इसका यह तात्पर्य नहीं कि यह चिकित्सा विधि अवैज्ञानिक या प्रभावहीन है। वस्तुस्थिति तो यह है कि लोक पर्यावरण से इतना जुडा रहता है कि उनमें एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित हो जाता है। वह वनस्पति को समझने की कोशिश करता है तो पत्ता-पत्ता अपना गुण बखानने लगता है। उसके पास बहुत से साधन तो होते नहीं, बस होता है अदम्य विश्वास जिसकी सहायता से वह औषधियों के गुणों को अनुकूल बनाने की कोशिश करता है। अथर्ववेदीय मन्त्रों में जिन्दगी को इसी समष्टि रूप में जीने की कामना स्पष्ट दिखाई देती है।

अथर्ववेद में रोगों से लड़ने के लिए जो मन्त्र मिलते हैं, उनकी निम्नलिखित विशेषता स्पष्टतः दिखायी देती हैं:

  1. निकट पर्यावरण से मानवीय सम्बन्ध की दृढ़ता
  2. जीवन में भौतिक उन्नति
  3. वनस्पति औषधियों का समुचित प्रयोग
  4. वनस्पति और मानव में मित्रता की स्थापना
  5. मानव शरीर का सर्वांग अध्ययन
  6. अंग-अंग के द्वारा सर्वांग तक पहुँच
  7. औषधियों का ज्ञान
  8. औषधियों में दिव्य शक्तियों का आह्वान
  9. रोगी की मानसिक शक्ति को जगाना
  10. चिकित्सक की मानसिक शक्ति को दृढ़ करना
  11. जीवन के प्रति मोह होते हुए भी मृत्यु की स्थिति को स्वीकार करना
  12. तन और मन का आत्मिक आनन्द से जुड़ाव

अथर्ववेदीय मंत्रों का आज तक जो महत्व है उसका प्रमुख कारण उसका औषध विज्ञान है। इस काल में जितनी वनस्पतियों के गुणों को पहचाना गया, उतना शायद ही किसी अन्य काल में संभव हुआ होगा। इस युग में न केवल वनों से औषध चुनी जाती थी बल्कि उनका उत्पादन भी होने लगा था। (अथर्व. 6.21.2) रोगों के उपचार के लिए विशिष्ट औषध प्रयोग का ज्ञान भी विकसित हो चुका था। जैसे राजयक्ष्मा के लिए शतवार,( अथर्व. 20.96.1-24) कुष्ठ के लिए जीवला,( अथर्व. 19.39.1-10) यक्ष्मा के लिए गुल्गुलुः ( अथर्व. 19.38.1)आदि का प्रयोग होता था। यहाँ तक दर्भ नामक ऐसी औषध का उल्लेख भी मिलता है जिसके प्रयोग से व्यक्ति सबका प्रिय बन जाता है। (अथर्व. 19.32.1-10) तत्कालिन औषध ज्ञान पर ही आयुर्वेद शास्त्र की नींव पड़ी। यह भी संभव है कि मनुष्य ने इन औषधियों का ज्ञान पशुओं की आदतों को समझते हुए किया हो। पशु पक्षियों की आदतें समझते हुए दिव्य शक्तियों की स्तुति मात्र से रोग दूर नहीं हो सकते, औषधियों का प्रयोग भी तो आवश्यक है ।यूँ तो लोक औषधियों को पहचानता था, उनका प्रयोग भी करता था, पर साथ ही में वह उनके गुणों को बढा ने के लिए स्तुति भी करता था। यह एक मनोवैज्ञानिक उपाय है तथा वैज्ञानिक सत्य है।

यह तो सिद्ध हो गया है कि वनस्पति में प्राण शक्ति होती है, अर्थात् जीवन होता है। इस दृष्टि से वनस्पति अपने प्राण देकर प्राणी समुदाय की रक्षा करती है तो उस बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है ।इसी अथर्वेदीय जन उन औषधियों की भी स्तुति करता है। वह उसे समस्त वनस्पतियों में श्रेष्ठ मानते हुए रोगों से छुटकारे की प्रार्थना करता है। जिस तरह नक्षत्रों में सोम श्रेष्ठ होता है, देवों में वरुण श्रेष्ठ है उसी तरह औषध भी सभी वनस्पतियों में श्रेष्ठ है। वे प्रार्थना करते हैं कि हे औषध! तुम देवी अरुन्धति के साथ मिल कर शान्ति प्रदायनी बनो जिससे हमारी गौशाला की गाएँ दुग्ध दायिनी बने और वीर पुरुष नीरोगी बनें। जब वह किसी विशिष्ट औषध का प्रयोग करता था तो उसी की प्रार्थना किया करता था जैसे विश्वजित् का प्रयोग करते समय वह कहता कि विश्वजित हमारी रक्षा करे इस जग में जितने भी दोपायें या चौपायें हैं सभी की रक्षा करे। पिप्पली के गुण गाते हुए वह कहता कि पिप्पली शीघ्रता से प्रभाव दिखाने वाली औषध है, देवताओं ने इसे जीवन के लिए आवश्यक माना है। अपामार्ग औषध के गुण गाते हुए वे कहते हैं कि- तुम सबसे प्राचीन औषध हो, तुम हमारे सभी शापों का शमन करने में समर्थ हो। इस तरह औषधियों के गुण कितने बढ़ सकते हैं, यह एक मनोवैज्ञानिक स्पष्ट कर सकता है। लोक में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जहाँ वनस्पतियों  के साथ मानव ऐसे ही सम्बन्ध स्थापित कर लेता है जैसा कि पशुओं के साथ करता है। निसन्देह प्राणवान औषधियों पर मानव की स्तुति का अनुकूल प्रभाव ही पड़ता होगा।

दिव्य शक्तियों की स्तुति मात्र से रोग दूर नहीं हो सकते, औषधियों का प्रयोग भी तो आवश्यक है। यूँ तो लोक औषधियों को पहचानता था, उनका प्रयोग भी करता था, पर साथ ही में वह उनके गुणों को बढा ने के लिए स्तुति भी करता था। यह एक मनोवैज्ञानिक उपाय है तथा वैज्ञानिक सत्य है। यह तो सिद्ध हो गया है कि वनस्पति में प्राण शक्ति होती है, अर्थात् जीवन होता है। इस दृष्टि से वनस्पति अपने प्राण देकर प्राणी समुदाय की रक्षा करती है तो उस बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है। इसी अथर्वेदीय जन उन औषधियों की भी स्तुति करता है। वह उसे समस्त वनस्पतियों में श्रेष्ठ मानते हुए रोगों से छुटकारे की प्रार्थना करता है। जिस तरह नक्षत्रों में सोम श्रेष्ठ होता है, देवों में वरुण श्रेष्ठ है उसी तरह औषध भी सभी वनस्पतियों में श्रेष्ठ है। वे प्रार्थना करते हैं कि हे औषध! तुम देवी अरुन्धति के साथ मिलकर शान्ति प्रदायिनी बनो, जिससे हमारी गौशाला की गाएँ दुग्धदायिनी बने और वीर पुरुष नीरोगी बनें।

जब वह किसी विशिष्ट औषध का प्रयोग करता था तो उसी की प्रार्थना किया करता था जैसे विश्वजित् का प्रयोग करते समय वह कहता कि विश्वजित हमारी रक्षा करे इस जग में जितने भी दोपाये या चौपाये हैं सभी की रक्षा करे। पिप्पली के गुण गाते हुए वह कहता कि पिप्पली शीघ्रता से प्रभाव दिखाने वाली औषध है, देवताओं ने इसे जीवन के लिए आवश्यक माना है। अपामार्ग औषध के गुण गाते हुए वे कहते हैं कि -तुम सबसे प्राचीन औषध हो, तुम हमारे सभी शापों का शमन करने में समर्थ हो। इस तरह औषधियों के गुण कितने बढ़ सकते हैं, यह एक मनोवैज्ञानिक स्पष्ट कर सकता है। लोक में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जहाँ वनस्पतियों  के साथ मानव ऐसे ही सम्बन्ध स्थापित कर लेता है जैसा कि पशुओं के साथ करता है। निसन्देह प्राणवान औषधियों पर मानव की स्तुति का अनुकूल प्रभाव ही पड़ता होगा।

अथर्ववेद में देह को इस तरह से प्रधानता दी गई है कि मनुष्य समाज के पक्ष में रह कर सकारात्मक जिन्दगी जी सके। इस रागात्मकता को परवर्ती विराग से काफी अलग रूप में समझा जा सकता है।

रति सक्सेना, rati saxena

रति सक्सेना

लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्र​काशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।

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