
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 1
संदर्भ: आज़ादी के आंदोलन में तरक़्क़ी-पसंद शायरों का किरदार और उनकी शायरी की आवाज़
ज़ाहिद ख़ान की कलम से....
आवाज़ दो हम एक हैं
तरक़्क़ी-पसंद तहरीक से निकले तमाम शायरों का ख़्वाब हिंदुस्तान की आज़ादी था। साल 1942 से 1947 तक का दौर, तरक़्क़ी-पसंद तहरीक का सुनहरा दौर था। यह तहरीक आहिस्ता-आहिस्ता मुल्क की सारी ज़बानों में फैलती चली गयी। हर भाषा में एक नये सांस्कृतिक आंदोलन ने जन्म लिया। इन आंदोलनों का आख़िरी मक़सद मुल्क की आज़ादी रहा। आन्दोलन ने जहां धार्मिक अंधविश्वास, जातिवाद व हर तरह की धर्मांधता और सामंतशाही का विरोध किया, तो वहीं साम्राज्यवादी दुश्मनों से भी जमकर टक्कर ली। जाँ निसार अख़्तर, मख़दूम मोहिउद्दीन और मुईन अहसन जज़्बी जैसे मशहूर-ओ-मारूफ़ शायर तरक़्क़ी-पसंद तहरीक के हमनवा, हमसफ़र थे। जाँ निसार अख़्तर ने शायरी को रिवायती रूमानी दायरे से बाहर निकालकर, ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों से जोड़ा। उनकी शायरी में इंक़लाबी अनासिर तो हैं ही, साम्राज्यवाद और सरमायेदारी की भी सख़्त मुख़ालफ़त है। वतन-परस्ती और क़ौमी यकजेहती पर उन्होंने कई बेहतरीन नज़्में लिखीं। सर्वहारा वर्ग का आह्वान करते हुए, वे अपनी एक इंक़लाबी नज़्म में कहते हैं:
मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं
जो शाने पर बग़ावत का अलम लेकर निकलते हैं
किसी ज़ालिम हुकूमत के धड़कते दिल पे चलते हैं

जाँ निसार अख़्तर साम्प्रदायिक सौहार्द्र के हिमायती थे। उनकी कई नज़्में इस मौज़ूअ पर हैं:
एक है अपना जहाँ
एक है अपना वतन
अपने सभी सुख एक हैं
अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं
जाँ निसार अख़्तर का एक अहम कारनामा ‘हिंदुस्तान हमारा’ है। यह किताब दो वॉल्यूम में है और इसमें तीन सौ सालों की हिंदुस्तानी शायरी का अनमोल सरमाया है। वतन-परस्ती, क़ौमी यकजेहती के साथ-साथ इस किताब में मुल्क की कुदरत, रिवायत और उसके अज़ीम माज़ी को उजागर करने वाली ग़ज़लें, नज़्में शामिल हैं। हिंदोस्तानी त्यौहार, तहज़ीब, दुनिया भर में मशहूर मुल्क के ऐतिहासिक स्थल, मुख़्तलिफ़ शहरों, आजादी के रहनुमाओं, देवी-देवताओं यानी हिंदुस्तान की वे सब बातें, वाक़िआत या किरदार जो हमारे मुल्क को अज़ीम बनाते हैं, से संबंधित शायरी सब एक जगह मौजूद है। इस किताब के ज़रिये उर्दू शायरी का एक ऐसा चेहरा हमारे सामने आता है, जो अभी तक पोशीदा था। मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब को परवान चढ़ाने और इसे आगे बढ़ाने में उर्दू शायरी ने अपना जो योगदान दिया, यह किताब बताती है।
मेहनत-कशों के चहेते, इंक़लाबी शायर मख़दूम मोहिउद्दीन का शुमार मुल्क में उन शख़्सियतों में होता है, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अवाम की लड़ाई लड़ने में गुज़ार दी। सुर्ख़ परचम के तले उन्होंने आज़ादी की तहरीक में हिस्सेदारी की। आज़ादी की तहरीक के दौरान उन्होंने न सिर्फ़ साम्राज्यवादी अंग्रेज़ी हुकूमत से टक्कर ली, बल्कि अवाम को सामंतशाही के ख़िलाफ़ भी बेदार किया। मख़दूम की क़ौमी नज़्मों का कोई सानी नहीं था। जलसों में कोरस की शक्ल में जब उनकी नज़्में गायी जातीं, तो एक समां बंध जाता। हज़ारों लोग आंदोलित हो उठते।
वो हिन्दी नौजवां यानी अलम्बरदार-ए-आज़ादी
वतन का पासबां वो तेग-ए-जौहर दार-ए-आज़ादी
‘आज़ादी-ए-वतन’ और ‘ये जंग है, जंग-ए-आज़ादी के लिए’ इन नज़्मों ने तो मख़दूम को हिन्दुस्तानी अवाम का महबूब और मक़बूल शायर बना दिया। मुल्क की आज़ादी की तहरीक के दौरान अंगेज़ी हुकूमत का विरोध करने के जुर्म में मख़दूम कई मर्तबा जेल भी गये, पर उनके तेवर नहीं बदले। मख़दूम मोहिउद्दीन ने न सिर्फ़ आज़ादी की तहरीक में हिस्सेदारी की, बल्कि अवामी थियेटर में मख़दूम के गीत गाये जाते थे। किसान और मज़दूरों के बीच जब इंक़लाबी मुशायरे होते, तो मख़दूम उसमें पेश-पेश होते।
मुईन अहसन जज़्बी उर्दू अदब की क्लासिकी रिवायत की नुमाइंदगी करते हैं। अपने कलाम में रिवायती अल्फ़ाज़, अलामात और इस्तिआरों को उन्होंने नये मायने दिये। उन्हें आगे बढ़ाया। ग़ज़ल की रिवायत से वाबस्ता रहते हुए सियासी मौज़ूआत को इस तरह पेश किया कि ग़ज़ल की ख़ूबसूरती भी बरक़रार रही और अपनी बात का इज़हार भी कर दिया। मुईन अहसन जज़्बी की शायरी में सिर्फ़ नाउम्मीदी और माज़ी के शिकवे-शिकायत ही नहीं है, मुस्तक़बिल का एक ख़्वाब भी है। उम्मीद का एक चिराग़ है, जिसकी रोशनी पूरे जहां को मुनव्वर करती है-
ज़िंदगी है तो बहरहाल बसर भी होगी
शाम आयी है तो आने दो सहर भी होगी
मुईन अहसन जज़्बी ने आज़ादी की तहरीक में सक्रिय हिस्सेदारी की। अपने कलाम से वे अवाम को बेदार करते रहे। एक लंबी जद्दोजहद के बाद मुल्क को आज़ादी मिली, मगर उसके साथ ही वह दो हिस्सो में बंट गया। पार्टीशन को मुईन अहसन जज़्बी मुल्क की सबसे बड़ी ट्रेजेडी मानते थे। इस वाक़िआत पर उन्होंने उस समय ‘तक़्सीम’ के उन्वान से एक नज़्म भी लिखी थी, जो काफ़ी मक़बूल रही:
क्या यही इंक़लाब है, क़ल्ब इधर, जिगर उधर
नाला ए-बेक़रार इधर, शोरिश-ए-चश्म-ए-तर उधर

जाहिद ख़ान
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।
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