डॉ. आज़म blog
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....

उर्दू कथा इतिहास में मील का पत्थर 'बस्ती'

         इंतिज़ार हुसैन लिखित ‘बस्ती’, यह नॉवेल पहली बार 1980 में लाहौर में प्रकाशित हुआ था। नॉवेल की मेन थीम भारत के बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान में इंसान की अंदरूनी और बाहरी यात्रा है। यह उसके खोये हुए वजूद और नयी पहचान के संकट को दिखाता है। इसमें जिस बस्ती की बात की गयी है, वह ख़ुद एक ऐसी जगह है जो पुरानी यादों, इतिहास और पुरातन संस्कृति में डूबी हुई है और अपनी मौजूदा पहचान खोने से परेशान है। इसमें सिम्बॉलिक स्टाइल अपनाया गया है। ऐतिहासिक घटनाओं को सिम्बल और मेटाफर के ज़रिये पेश किया गया है, जिनमें फ़िलॉसॉफ़िकल गहराई है। इसलिए यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, बल्कि एग्ज़िस्टेंशियल और फ़िलॉसॉफ़िकल सवाल भी उठाती है।

इसमें सभी किरदार आम ज़िंदगी से लिये गये हैं, जो रोज़ की भागदौड़ में शामिल हैं। साथ ही, गहरी फ़िलॉसफ़ी के ज़रिये भी हैं। किरदारों के बाहरी और अंदरूनी या आंतरिक टकराव को हाईलाइट किया गया है। इसकी भाषा आसान लेकिन बहुत असरदार है। नॉवेल का स्ट्रक्चर ट्रेडिशनल (पारंपरिक ढांचा) नहीं है, बल्कि यह अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच सफ़र करता रहता है, जो पढ़ने वाले को भ्रमित रखता है और गहराई से सोचने पर मजबूर करता है। यही इसकी ख़ासियत है। आम पाठकों के लिए यह बोझिल हो सकता है, लेकिन गंभीर पाठक इसकी दार्शनिक गहराई में जब उतरता है तो रोमांचित हो उठता है।

इस नॉवेल को बंटवारे के बाद मानसिक और सामाजिक उथल-पुथल, मनोवैज्ञानिक पीड़ा, ऐतिहासिक विलोपन और मौजूदा पहचान के सवालों पर एक गहरी दार्शनिक और प्रतीकात्मक टिप्पणी माना जाता है। इसीलिए यह उर्दू साहित्य में भी एक ख़ास स्थान रखता है, बल्कि इसे मील का पत्थर माना जाता है और इसे एक क्लासिक का दर्जा प्राप्त है। यह एक खोये हुए अतीत और वर्तमान के बीच इंसानी बेबसी को दिखाता है। इसमें अतीत की गूंज है, तो वर्तमान की निस्तब्धता भी है। ज़िंदगी का सफ़र और उसका अंत एक बस्ती को प्रतीक के ज़रिये पेश किया गया है।

समय के बहाव (TIME STREAM) को मिश्रित कर दिया गया है। अतीत, वर्तमान और भविष्य आपस में गुंथे हुए हैं। इसलिए, यह नॉवेल सीधा नहीं चलता बल्कि कई युगों से गुज़रता है। प्रतीकात्मक स्टाइल ऐसा है कि बस्ती ख़ुद इंसानी अस्तित्व का एक रूपक बन जाती है। इसमें जादुई यथार्थवाद (Magical Realism) का स्टाइल है, यही वजह है कि कुछ आलोचक इस मामले में इंतिज़ार हुसैन की तुलना गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ से भी करते हैं। अपनी कहानी, लिखने के स्टाइल और इंटरटेक्स्चुअलिटी (Inter-Texuality) के साथ, यह एब्स्ट्रैक्शन (Abstraction) और सिम्बॉलिज़्म (Symbolism) का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसमें ग्यारह अध्याय हैं। यह यूनाइटेड इंडिया के एक क़स्बे से शुरू होता है।

किरदारों में सबसे ख़ास है इतिहास का युवा प्रोफेसर ज़ाकिर। वह भारत के बंटवारे के बाद उत्तरप्रदेश के एक शहर रूपनगर से पाकिस्तान चला जाता है, लेकिन उसकी प्रेमिका साबिरा भारत में ही रहना पसंद करती है। ऐसा भी लगता है जैसे ज़ाकिर के रोल में ख़ुद नॉवेलिस्ट है। दूसरे किरदार हैं डॉ. अफ़ज़ल, इरफ़ान, सलामत, अजमल, सुरेंद्र, बी. अम्मान, मौलाना नासिर, तस्नीम, अनीसा, ख्वाजा साहिब, प्यारे लाल और जगदीश वगैरह।
रूपनगर उसकी खोयी हुई जन्नत है। वहाँ के हर रिश्ते, रहन-सहन, रीति-रिवाज, त्योहार और आयोजनों को बहुत बारीकी से दिखाया गया है। ज़ाकिर को उसे छोड़कर पाकिस्तान जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। नया देश, नये लोग और रीति-रिवाज, नये जश्न! ऐसे में रूपनगर की याद उसे सताती रहती है।

हालांकि, वह लाहौर में भी अपना एक मित्रमंडली बनाता है, लेकिन फिर भी जब भी वह दुखी होता है, तो उसे रूपनगर याद आता है।

अगर हम ध्यान से देखें, तो लेखक ने मुस्लिम राष्ट्र के सिर्फ़ बातों में उलझे रहने और कुछ नया न करने की ट्रेजेडी भी दिखायी है, यही वजह है कि ज़्यादातर युवा किरदार होटलों में बैठकर अनर्गल वार्तालाप करते रहते हैं, उनके पास करने के लिए कुछ ठोस नहीं होता। बुज़ुर्ग और मौलवी मौलाना धार्मिक सलाह देते रहते हैं, लेकिन वे ख़ुद पैरवी के नाम पर शून्य हैं। यह हमें पाकिस्तान के इतिहास और वहां के समाज की हालत का भी एहसास कराता है। वहां की अव्यवस्था, मार्शल लॉ, भारत के साथ युद्ध, ढाका विभाजन को प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। दो सभ्यताओं, दो देशों और दो राष्ट्रों की स्थिति भी देखने को मिलती है। इस तरह, इसे एक नॉस्टैल्जिक नॉवेल (Nostalgical Novel) भी कहा जा सकता है।

डॉ. आज़म blog

नॉवेल की शुरूआत देखें, एक कस्बे की स्थिति को कितनी ख़ूबसूरती से पेश किया गया है:

“जब दुनिया अभी नयी थी, जब आसमान ताज़ा था और धरती अभी गंदी नहीं हुई थी, जब पेड़ सदियों में सांस लेते थे और चिड़ियों की आवाज़ में जग बोलते थे। वह अपने आस-पास की हर चीज़ को देखकर कितना हैरान होता था, सब कुछ कितना नया था मगर कितना पुराना लगता था। नीलकंठ, बाज़, मोर, कबूतर, गिलहरी, तोता, उसके सभी जीव उसके संग पैदा हुए थे, हर जगह के भेद संग लिये फिरते थे। मोर की झनकार रूपनगर के जंगल से नहीं बल्कि वृंदावन से आती लगती थी। जब खट बुढ़िया (बाज़) उड़कर ऊंचे नीम पर उतरती, तो ऐसा लगता था कि वह मलका सबा के महल में कोई चिट्ठी छोड़कर आ रही है और हज़रत सुलेमान के किले की तरफ़ जा रही है। और जब गिलहरी, मुंडेर के चारों ओर दौड़ते हुए, अचानक अपनी पूंछ पर खड़ी होकर चक-चक करती, तो वह उसे घूरता और हैरानी से सोचता कि उसकी पीठ पर ये काली धारियाँ रामचंद्रजी की उंगलियों के निशान हैं और हाथी तो दुनिया का अजूबा था। जब अपनी ड्योढ़ी में खड़े होकर उसे दूर से आते हुए देखता, तो ऐसा लगता जैसे पहाड़ चला आ रहा है। यह लंबा सूंड, पंखों की तरह हिलते हुए बड़े कान, तलवार की तरह मुड़े हुए दो सफेद दांत, दोनों तरफ़ निकले हुए। उसे देखकर, वह हैरान होकर अंदर आता और सीधे अपनी अम्मा के पास जाता…”

एक और सोचने पर मजबूर करने वाला अंश देखिए:

“जब मैं घर से चला था, तो मेरे सारे बाल काले थे। तब मेरी उम्र ही क्या थी? बीस इक्कीस के पेटे में था। जब मैं पाकिस्तान पहुँचा और नहाने के बाद आईने में देखा, तो मेरे सिर के सारे बाल सफ़ेद हो चुके थे। पाकिस्तान में यह मेरा पहला दिन था। मैं काले बालों और परिवार के साथ घर से निकला था। जब मैं पाकिस्तान पहुँचा, तो मेरा सिर सफ़ेद था और मैं अकेला था।”

एक नज़र: इंतिज़ार हुसैन

जन्म 21 दिसंबर, 1925 को बुलंदशहर ज़िले के डिबाई क़स्बे में हुआ था। यानी बीती 21 तारीख़ को उनकी जन्म शताब्दी भी संपन्न हुई। उन्होंने मेरठ कॉलेज से उर्दू में BA और MA किया। भारत के बंटवारे के बाद, परिवार लाहौर में बस गया। वे पत्रकारिता के पेशे से जुड़े थे। उनकी कहानियों का पहला संकलन “गली-कूचे” 1952 में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने अख़बारों और रेडियो के लिए कॉलम लिखे। कहानियों और नॉवेल में भी बहुत नाम कमाया। वे एक पत्रकार, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, अनुवादक, आलोचक, स्मृति लेखक, आत्मकथाकार, यात्रा वृतांत लेखक, संपादक और बाल साहित्यकार थे। उर्दू कहानी में वे एक जाना-माना नाम हैं। उन्होंने एक ख़ास शैली में दास्तानों जैसे माहौल में वर्तमान सरोकारों को पात्रों द्वारा से पेश किया है। देवमालाई वातावरण (पौराणिक ट्रेंड्स) देखने को मिलता है। रूपक, बिंब और प्रतीक (Symbolic and Metaphorical) उनकी लेखनी की विशेषताएं हैं।

आख़िरी आदमी, शहर-ए-अफ़सोस, आगे समंदर है, बस्ती, चांद गहन, गली कूचे, कछुए, ख़ाली पिंजरा, ख़ेमे से दूर, दिन और दास्तान, अलामतों का ज़वाल, बूंद-बूंद, शहज़ाद के नाम, ज़मीन और फ़लक, चिराग़ों का धुआं, दिल था जिसका नाम, जुस्तजू क्या है, क़तरे में दरिया, जन्म कहानियां, क़िस्से कहानियां, शिकस्ता सतून पर धूप, सईद की पुरअसरार ज़िंदगी आदि उनकी अहम रचनाएं हैं।

वे पहले पाकिस्तानी लेखक हैं जिनका नाम ‘मैन बुकर प्राइज़’ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें “सितारा-ए-इम्तियाज़ (स्टार ऑफ़ एक्सीलेंस)” और पाकिस्तान एकेडमी ऑफ़ लेटर्स ने उन्हें पाकिस्तान के सबसे बड़े लिटरेरी सम्मान “कमाल-ए-फ़न अवॉर्ड” से सम्मानित किया। 2 फरवरी 2016 को लाहौर में उनका निधन हुआ।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *