
- December 31, 2025
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पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
भाषाओं के पार: व्यंग्य का भारतीय संसार
वर्तमान में हिंदी व्यंग्य के परिदृश्य पर दृष्टि डालते हुए सहज ही यह प्रश्न उभरता है कि जब देश की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना व्यापक रूप से लगभग समान है, तथा जीवन की समस्याएँ और जटिलताएँ भी मूलतः एक-सी प्रतीत होती हैं, तो क्या भारत की अन्य भाषाओं में व्यंग्य का स्वरूप, उसकी संवेदना और उसका वैचारिक फलक भी हिंदी व्यंग्य जैसा ही है? यह प्रश्न केवल साहित्यिक जिज्ञासा का नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक मानसिकता और उसकी अभिव्यक्ति के विविध रूपों को समझने की एक कोशिश भी है।
इसी जिज्ञासा के समाधान की प्रक्रिया में जब अन्य भारतीय भाषाओं में व्यंग्य लेखन की स्थिति का अध्ययन प्रारंभ किया और विभिन्न वेबसाइटों, ब्लॉगों, साहित्यिक पत्रिकाओं तथा आलोचनात्मक पुस्तकों से संदर्भ सामग्री संकलित की, कुछ मित्रों से विचार-विनिमय किया तो यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में व्यंग्य की एक समृद्ध परंपरा विद्यमान रही है। हिंदी व्यंग्य की तरह ही, अन्य भाषाओं का व्यंग्य भी सामाजिक विसंगतियों राजनीतिक विडंबनाओं, सांस्कृतिक रूढ़ियों, धार्मिक आडंबरों और मध्यवर्गीय मानसिकताओं को अपना मुख्य लक्ष्य बनाता रहा है। कुछ भाषाओं में तो व्यंग्य-लेखन इतनी प्रचुर मात्रा में हुआ है कि वह उस भाषा-साहित्य की एक स्वतंत्र और प्रभावशाली विधा के रूप में स्थापित दिखाई देता है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अनेक भारतीय भाषाओं के प्रमुख व्यंग्यकारों की रचनाएँ विभिन्न भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई हैं। इससे न केवल उनके व्यंग्य की सार्वदेशिक प्रासंगिकता सिद्ध होती है, बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि व्यंग्य, भाषा-भेद के बावजूद, समाज की साझा पीड़ाओं और विडंबनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति है। प्रस्तुत आलेख में इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अन्य भारतीय भाषाओं में व्यंग्य लेखन की स्थिति, उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों और हिंदी व्यंग्य से उसके अंतर्संबंधों पर विचार किया गया है, ताकि भारतीय व्यंग्य की एक समग्र और तुलनात्मक समझ विकसित की जा सके।

इस क्रम में सबसे पहले भारत की प्राचीनतम मानी जाने वाली भाषा, संस्कृत से बात आरंभ करना स्वाभाविक है। संस्कृत साहित्य में व्यंग्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन, सुदृढ़ और वैचारिक रूप से समृद्ध रही है। यह धारणा कि व्यंग्य आधुनिक या केवल मध्यकालीन विधा है, संस्कृत साहित्य के अध्ययन से खंडित हो जाती है। व्यंग्य शब्द स्वयं भी संस्कृत की देन है, जहाँ इसका प्रयोग व्यंजना-शक्ति के माध्यम से प्रत्यक्ष कथन से भिन्न अर्थ संप्रेषित करने के लिए होता रहा है। ‘अंजन’ धातु में ‘वि’ उपसर्ग के योग से ‘व्यंजन’ शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। इसी से ‘व्यंजना’ शब्द विकसित हुआ है, जिसका आशय है – अर्थ का विशेष प्रकार से प्रकट होना। जिस प्रकार आँखों में अंजन लगाने से दृष्टि-दोष दूर होता है और वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं, उसी प्रकार शब्द की व्यंजना-शक्ति उसके भीतर निहित, अकथित और सूक्ष्म अर्थ को उद्घाटित करती है।
संस्कृत व्यंग्य की प्रारंभिक झलक वैदिक साहित्य में ही मिल जाती है। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में देवताओं के आपसी व्यवहार, यज्ञीय आडंबर और मानवीय दुर्बलताओं पर सूक्ष्म कटाक्ष दिखाई देता है। ब्राह्मण-ग्रंथों और उपनिषदों में कर्मकांड की अतिशयोक्ति तथा खोखले आचारों पर तर्कपूर्ण और व्यंग्यात्मक प्रश्न उठाए गए हैं। वैदिक कर्मकांड पर चार्वाक का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है – “पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति । स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते ॥”
इसका भावार्थ है, यदि ज्योतिष्टोम यज्ञ में मारा गया पशु स्वर्ग को प्राप्त होता है, तो यज्ञ करने वाला व्यक्ति अपने पिता की हत्या क्यों नहीं कर देता, ताकि वह भी स्वर्ग चला जाए? यह श्लोक प्रत्यक्ष रूप से कोई निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि तर्क की आड़ में एक तीखा और विचारोत्तेजक व्यंग्य रचता है। चार्वाक यहाँ एक अत्यंत असहज और अतार्किक प्रतीत होने वाला प्रश्न उठाते हैं, ताकि कर्मकांड के समर्थकों को उनकी ही मान्यता की आंतरिक विसंगति समझ में आ जाए। इस श्लोक का प्रहार किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि एक पूरी विचार-प्रणाली पर है। यह व्यंग्य उस परंपरा को आईना दिखाता है, जो धार्मिक आडंबर और कर्मकांड के नाम पर हिंसा को औचित्य प्रदान करती है और मानवीय करुणा तथा विवेक को हाशिए पर धकेल देती है। उपनिषदों में नचिकेता–यम संवाद और श्वेतकेतु–उद्दालक जैसे प्रसंगों में व्यंग्य गंभीर दार्शनिक स्वरूप ग्रहण कर लेता है। महाभारत में दुर्योधन की आत्ममुग्धता, शकुनि की कुटिलता और धृतराष्ट्र की अंधी आसक्ति, ये सभी चरित्र व्यंग्यात्मक संरचना के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
संस्कृत नाटकों में विदूषक सामाजिक रूढ़ियों, राजसी आडंबरों और मानवीय कमजोरियों पर तीखा व्यंग्य करता है। कालिदास, भास और शूद्रक के नाटकों में व्यंग्य सामाजिक अन्याय, भ्रष्ट प्रशासन और वर्ग-भेद पर केंद्रित है। भर्तृहरि के ‘नीतिशतक’ और ‘वैराग्यशतक’ में, सत्ता, विद्वानों की खोखली विद्वत्ता और संसार की असारता पर किए गए तीखे व्यंग्य हैं। पंचतंत्र और हितोपदेश का कथासाहित्य पशु-पक्षियों के माध्यम से लोकधर्मी सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करता है, जिसमें मूर्ख राजाओं, चापलूस मंत्रियों, कपटी साधुओं और स्वार्थी मित्रों पर व्यंग्य है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि संस्कृत में व्यंग्य की जड़ें अत्यंत गहरी, व्यापक और सुसंस्कृत रही हैं। आधुनिक हिंदी व्यंग्य इसी परंपरा का समकालीन विस्तार है, जिसने लोकतांत्रिक संदर्भों और आधुनिक सामाजिक यथार्थ के अनुरूप स्वयं को रूपांतरित किया है। अनेक आलोचकों का यह मत रहा है कि संस्कृत व्यंग्य की परंपरा को समझे बिना हिंदी व्यंग्य की सम्यक और संपूर्ण समझ संभव नहीं है।
विडंबना यह है कि आज संस्कृत की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। संस्कृत आज पूजा-पाठ और अनुष्ठानों की भाषा बनकर सीमित रह गई है। व्यंग्य की इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद संस्कृत में समकालीन व्यंग्य लेखन लगभग नगण्य है और उससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि उसे पढ़ने वाला वर्ग भी लगातार सिमटता जा रहा है।
उर्दू साहित्य में भी व्यंग्य लेखन की एक समृद्ध और सुदृढ़ परंपरा रही है। इस भाषा के व्यंग्य में भी सामाजिक असमानताएँ, राजनीतिक विरोधाभास और धार्मिक कठमुल्लापन स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होते रहे हैं। इस परंपरा के प्रमुख हस्ताक्षरों में मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके व्यंग्य की अनेक पंचलाइनें इतनी प्रचलित हो चुकी हैं कि वे बार-बार वक्ताओं और लेखकों के उद्धरणों में सुनाई देती हैं। यूसुफ़ी धार्मिक विसंगतियों और अतार्किक आस्थाओं पर तीखा किंतु बौद्धिक व्यंग्य करते हैं। उनका यह कथन – “इस्लाम के लिए सबसे ज़्यादा कुर्बानी बकरों ने दी है”या फिर “इस्लामिक वर्ल्ड में आज तक कोई बकरा नेचुरल डेथ नहीं मरा”धार्मिक आडंबर और रूढ़ मान्यताओं पर करारा प्रहार है। इसी प्रकार राजनीतिक फिरकेबाज़ी और सामाजिक यथार्थ पर उनका व्यंग्यात्मक कथन “हमारे मुल्क की अफ़वाहों की सबसे बड़ी ख़राबी यह है कि वे सच निकलती हैं”समकालीन राजनीति की विडंबनाओं को सटीक रूप में उजागर करता है। इन उद्धरणों का आशय मात्र इतना है कि उर्दू व्यंग्य में भी, ठीक हिंदी व्यंग्य की तरह, समाज की हर प्रकार की विद्रूपताओं, पाखंडों और विरोधाभासों पर विचारोत्तेजक और विवेकपूर्ण प्रहार किया गया है।
उर्दू साहित्य में व्यंग्य के लिए प्रायः ‘फ़िक़रा’ और ‘फ़क़रिया’ शब्दों का प्रयोग किया गया है। मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के अतिरिक्त उर्दू में व्यंग्यकारों की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। इस परंपरा में रशीद अहमद सिद्दीक़ी, अज़ीम बेग चुगताई, सआदत हसन मंटो, मुजतबा हुसैन, गुलाम अब्बास, कृष्ण चंदर, शौकत थानवी, सिराज अहमद अलवी, पतरस बुख़ारी, कन्हैया लाल कपूर, इब्राहीम जबीस, मुख़्तार टोंकी, ख्वाजा हसन निजामी, कश्मीरी लाल जाकिर तथा सलमा सिद्दीकी जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन रचनाकारों ने सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक पाखंड, मध्यवर्गीय मानसिकता और मानवीय दुर्बलताओं को अपने व्यंग्य का विषय बनाया और उर्दू व्यंग्य को वैचारिक गहराई तथा साहित्यिक गरिमा प्रदान की।
पाकिस्तान के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों – सितारा-ए-इम्तियाज़ (1999) और हिलाल-ए-इम्तियाज़ (2002), से सम्मानित मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का जन्म राजस्थान के टोंक में हुआ था, किंतु भारत–पाक विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए। उर्दू व्यंग्य में उन्हें निर्विवाद रूप से शिखर-पुरुष माना जाता है। उनकी रचनाओं में हास्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक और बौद्धिक अंतर्दृष्टि का माध्यम है। उनकी प्रमुख पुस्तकों में खोया पानी, मेरे मुँह में ख़ाक, धन यात्रा, चिराग तले, ख़ाक़म-ब-दहन और ज़रगुज़श्त शामिल हैं। खोया पानी पर टिप्पणी करते हुए हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने लिखा है कि ‘इस उपन्यास में हास्य की पराकाष्ठा और इम्प्रोवाइज़ेशन के अद्भुत प्रयोग देखने को मिलते हैं।’ यह कथन यूसुफ़ी के व्यंग्य की ऊँचाई और कलात्मक सामर्थ्य को रेखांकित करता है।
उर्दू व्यंग्य साहित्य में पतरस बुख़ारी का नाम भी अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उनका वास्तविक नाम सैयद अहमद शाह बुख़ारी था। उनका केवल एक ही संग्रह प्रकाशित हुआ, किंतु उन्होंने जो भी लिखा, वह स्थायी और स्मरणीय सिद्ध हुआ। उनके व्यंग्य लेख मज़ामीन-ए-पतरस में संकलित हैं, जिन्हें उर्दू व्यंग्य की क्लासिक कृतियों में गिना जाता है। रशीद अहमद सिद्दीक़ी को चारपाई, अरहर का खेत, धोबी और गवाह जैसे व्यंग्य लेखों से व्यापक प्रसिद्धि मिली। वहीं सिराज अहमद अलवी के चर्चित व्यंग्यों में ग़ालिब जन्नत में, हालात क़ाबू में हैं, अदीबों की क़िस्में और मकान की तलाश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
गधे को केंद्र में रखकर लिखे गए तीन उपन्यासों ने राजस्थान के भरतपुर में जन्मे कृष्ण चंदर को व्यंग्य-साहित्य में लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया। यद्यपि उनका रचना-संसार अत्यंत व्यापक और बहुविध रहा और ख़्याल, नज़्ज़ारे, नग़मे की मौत जैसे कहानी-संग्रह तथा शिकस्त जैसा उपन्यास 1943 से पहले ही प्रकाशित हो चुके थे, फिर भी एक गधे की आत्मकथा, गधे की वापसी और एक गधा नेफ़ा में उनकी सबसे अधिक पढ़ी और चर्चित कृतियाँ मानी जाती हैं। इन रचनाओं में व्यंग्य के माध्यम से सत्ता, व्यवस्था और मानवीय मूर्खताओं पर तीखा प्रहार किया गया है।
कन्हैया लाल कपूर की पहचान उर्दू साहित्य में हास्य–व्यंग्य के प्रथम श्रेणी के लेखक के रूप में स्थापित है। 1942 में अदबी दुनिया में प्रकाशित उनका व्यंग्य ‘ग़ालिब तरक़्क़ी-पसंद शुअरा की मजलिस में’, उन्हें तत्कालीन साहित्यिक जगत में ख्याति के शिखर पर ले गया। चौपट राजा, नया शिकंजा, कॉमरेड शेख़ चिल्ली, पाँच प्रकार के बेहूदा पति, देसी फिरंगी का दरबार और बंदा परवर! कब तलक जैसे व्यंग्यों ने उनकी लोकप्रियता को और विस्तार दिया। चंग-ओ-रुबाब, शीशा-ओ-तीशा, गर्द-ए-कारवाँ और कॉमरेड शेख़ चिल्ली उनके प्रमुख व्यंग्य-संग्रह हैं।
हैदराबाद के प्रसिद्ध व्यंग्यकार मुज्तबा हुसैन के व्यंग्यात्मक तेवर आओ जापान चलें और हैदराबाद बाय नाइट जैसी रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं, जहाँ यात्रा-वृत्तांत के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक विडंबनाओं पर सूक्ष्म प्रहार किया गया है। शौकत थानवी अपने विलक्षण हास्यबोध के लिए जाने जाते हैं। उनकी कृति स्वदेशी रेल को उर्दू हास्य-साहित्य की अद्भुत रचना माना जाता है। मौज-ए-तबस्सुम, तूफ़ान-ए-तबस्सुम, सौतिया चाह, जोड़तोड़ और ससुराल उनकी चर्चित पुस्तकें हैं।
समग्रतः कहा जा सकता है कि उर्दू व्यंग्य की यह समृद्ध परंपरा सामाजिक चेतना, बौद्धिक सूक्ष्मता और मानवीय संवेदना से संपन्न रही है। इन रचनाकारों ने व्यंग्य को केवल हास्य का साधन नहीं, बल्कि समाज और सत्ता से संवाद करने का एक सशक्त माध्यम बनाया। इसी कारण उर्दू व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य की तरह, भारतीय व्यंग्य-साहित्य की एक महत्वपूर्ण और अविभाज्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
बांग्ला साहित्य में व्यंग्य के लिए ‘व्यंग’’, ‘उपहास’ तथा ‘प्रहसन’ जैसे शब्दों का प्रयोग प्रचलित है। विषय-वस्तु की दृष्टि से बांग्ला व्यंग्य हिंदी व्यंग्य से भिन्न नहीं है। यहाँ भी व्यंग्य की एक श्रेष्ठ, समृद्ध और अनुकरणीय परंपरा देखने को मिलती है। बांग्ला व्यंग्य में सामाजिक विषमताएँ, आर्थिक असमानताएँ, धार्मिक पाखंड एवं कट्टरता के साथ ही राजनीतिक उठापटक और पद-लोलुपता से उपजा अशोभनीय आचरण प्रमुखता से अभिव्यक्त हुआ है।
जैसा कि पूर्ववर्ती आलेख में उल्लेख किया गया है, हिंदी की पहली व्यंग्य-केंद्रित पत्रिका ‘मतवाला’ की शुरुआत बांग्ला में प्रकाशित व्यंग्य-पत्रिका ‘अवतार’ से प्रेरित थी। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि बांग्ला में व्यंग्य-केंद्रित पत्रिकाओं का प्रकाशन हिंदी से पहले आरंभ हो चुका था, जो वहाँ की सशक्त व्यंग्य-परंपरा का प्रमाण है। बांग्ला साहित्यकार राजशेखर बसु, जो साहित्य-जगत में ‘परशुराम’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, बांग्ला व्यंग्य के पहले व्यापक रूप से चर्चित व्यंग्यकार माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ तीक्ष्ण सामाजिक दृष्टि, पैने व्यंग्य और संतुलित हास्य के लिए जानी जाती हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘गड्डलिका’ और ‘कज्जली’ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
शरतचंद्र पंडित जो ‘दादा ठाकुर’ के नाम से लिखते थे, अपने समय के एक प्रसिद्ध बांग्ला व्यंग्यकार और हास्य-कवि थे। बांग्ला के अन्य प्रमुख व्यंग्यकारों में माइकल मधुसूदन दत्त, कुमारेश घोष, सुकुमार राय, शिवराम चक्रवर्ती और दधीन कुमार खोला के नाम उल्लेखनीय हैं। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी व्यंग्य की कुछ अत्यंत प्रभावशाली व अवस्मरणीय रचनाएँ दी हैं। बंकिमचंद्र की ‘कमला कोतेर दफ़्तर’ और ‘लोकरहस्य’, तथा रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘चिरकुमार सभा’ और ‘वैकुंठेरखाता’ इस श्रेणी में रखी जा सकती हैं। माइकल मधुसूदन दत्त की ‘बूढ़ो’ और ‘शालिकेल घड़े रो’ उनके व्यंग्य के प्रखर रूप को सामने लाती हैं, वहीं शिवराम चक्रवर्ती की ‘विश्वपति’ और कुमारेश घोष की ‘एकवर अनेक कणे’ बांग्ला व्यंग्य की तेजस्विता और रचनात्मक वैविध्य को रेखांकित करती हैं। आधुनिक बांग्ला साहित्य में संजीब चट्टोपाध्याय एक प्रतिष्ठित नाम हैं, जिनकी रचनाओं में समकालीन समाज की विडंबनाओं पर सटीक और प्रभावशाली व्यंग्य देखने को मिलता है।
हिंदी और बंगला के बाद मराठी भारत की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। मराठी साहित्य में व्यंग्य के लिए प्रायः ‘उपरोध’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। मराठी व्यंग्य के पितृ-पुरुष माने जाने वाले श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर के अनुसार व्यंग्य का उद्देश्य ‘समाज को दुलारकर सुधार के अनुकूल बनाना नहीं, बल्कि उसे छेड़कर और चिढ़ाकर स्वदोष-निरीक्षण के लिए प्रेरित करना है।’ यही तीखा और चुनौतीपूर्ण तेवर उनकी रचनाओं में परिलक्षित होता है। उनकी प्रमुख रचनाओं में सुदामयाचे पोहे, वधु परीक्षा, मति विकार तथा मूकनायक उल्लेखनीय हैं।
मराठी व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें हास्य और करुणा, कटाक्ष और आत्मीयता, तथा मनोरंजन और सामाजिक हस्तक्षेप का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। मराठी व्यंग्य की जड़ें संत-साहित्य और लोकपरंपरा तक जाती हैं। संत तुकाराम और समर्थ रामदास की रचनाओं में पाखंड, आडंबर और सामाजिक अन्याय पर व्यंग्यात्मक दृष्टि के संकेत मिलते हैं। आधुनिक मराठी व्यंग्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय रचनाकार पु.ल. देशपांडे माने जाते हैं। उनके व्यंग्य में मध्यवर्गीय जीवन की छोटी-छोटी विडंबनाएँ और गहरी मानवीय संवेदना, सूक्ष्म हास्य के साथ उभरती हैं। बटाट्याची चाळ, व्यक्ती आणि वल्ली तथा हसवणूक जैसी कृतियाँ मराठी व्यंग्य की क्लासिक रचनाएँ मानी जाती हैं। उनका व्यंग्य कटु नहीं, बल्कि आत्मीय, संवेदनशील और मानवीय है। इसी परंपरा में वि.पु. काळे (वसंत पुरुषोत्तम काले) ने शहरी जीवन, दांपत्य संबंधों और सामाजिक दिखावे पर हल्के किंतु प्रभावी व्यंग्य किए। उनका लेखन संवादात्मक, आत्मपरक और समकालीन जीवन से गहरे जुड़ा हुआ है। द.मा. मिरासदार ने ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखकर देशज भाषा और लोकबोध से समृद्ध व्यंग्य रचा, जिसमें ग्रामीण समाज की विसंगतियाँ चुटीले अंदाज़ में सामने आती हैं।
चिंतामण विनायक जोशी, गंगाधर गाडगीळ, मुकुंद टकसाले और शं.ना. नवरे ने मराठी व्यंग्य को बौद्धिक और वैचारिक गंभीरता प्रदान की। उनके यहाँ व्यंग्य सामाजिक संस्थाओं, मध्यमवर्गीय ढोंग और नैतिक द्वन्द्वों पर केंद्रित है। वि.स. खांडेकर, मुख्यतः कथाकार और विचारक के रूप में प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनके लेखन में सामाजिक और नैतिक व्यंग्य की सशक्त उपस्थिति मिलती है।
मराठी व्यंग्य और नाट्य-परंपरा में आचार्य अत्रे (प्र.के. अत्रे) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनका व्यंग्य निर्भीक, तीखा और प्रत्यक्ष है, जो राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पाखंड पर सीधा प्रहार करता है। भाषा में धार और दृष्टि में साहस उनकी पहचान है। भ्रमाचा भोपला, साष्टांग नमस्कार और मी मंत्री झालो उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं।
समग्रता में देखें तो मराठी व्यंग्य की परंपरा जनजीवन से गहरे जुड़ी हुई रही है। यह परंपरा समाज के भीतर व्याप्त विसंगतियों से संवाद करती हुई विकसित हुई है। मराठी व्यंग्य सत्ता से संवाद करता है, समाज को आईना दिखाता है और पाठक को हँसाते हुए सोचने के लिए विवश करता है। इसी कारण मराठी व्यंग्य भारतीय व्यंग्य-साहित्य की एक सशक्त, संवेदनशील और अविभाज्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित है।
कोंकणी महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों और गोवा में बोली जाने वाली एक समृद्ध भाषा है। कोंकणी साहित्य में व्यंग्य की परंपरा आकार में भले ही सीमित हो, किंतु सामाजिक दृष्टि से वह अत्यंत प्रभावशाली और जीवंत है। कोंकणी व्यंग्य मुख्यतः लोकजीवन, धार्मिक आडंबर, सामाजिक रूढ़ियों, प्रवासी जीवन की विडंबनाओं और सत्ता-संरचनाओं पर केंद्रित है। इसके विकास में नाटक और लोक-प्रहसन की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है क्योंकि इन माध्यमों के जरिए व्यंग्य जनसाधारण तक सहजता से पहुँचा। शेनॉय गोएंबाब को आधुनिक कोंकणी साहित्य का प्रवर्तक माना जाता है। उनके लेखन में सामाजिक चेतना तथा व्यंग्यात्मक दृष्टि के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।
क्रमश:

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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