
- January 6, 2026
- आब-ओ-हवा
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कटाक्ष राजेंद्र प्रसाद सक्सेना की कलम से....
भाई शरद के बहाने
शरद भाई! क्या तुम जैसे दुबले-पतले आदमी के होने या न होने से फ़र्क पड़ता है? तुम व्यंग्यकार थे, मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं। न तुम कवि थे, न आलोचक और न ही आला अफ़सर। इसलिए तुम्हारे संबंध में प्रश्न मंच से उछाले गये प्रश्न का उत्तर एक लड़का, जो पढ़ता नहीं है, अटकलपच्ची से उत्तर देता है और इनाम ले जाता है। तुम बंबई में बीमार हुए और बंबई में ही तुम्हारा इलाज होता रहा। तुम सरकारी विमान से न्यूयॉर्क नहीं जा सके। दिल्ली के बड़े अस्पताल में सरकारी खर्चे से महीने भर पड़े रहना भी तुम्हें नागवार होता। तुम मालवा के थे और अन्त तक रज्जू भैया (राजेंद्र माथुर) के समान निपट मालवी बने रहे। आम आदमी की तरह तुमने ‘ये जो है ज़िन्दगी।’ उसे जिया, भोगा, चखा और लिखा। अतः बंबई जैसे महानगर में पहुंचकर भी तुमने अपनी पहचान बनायी। एव्हरशाइन नगर में पहुँचकर तुम हमेशा के लिए एव्हरशाइन हो गए।
तुमने सच के बारे में ‘प्रतिदिन’ सच-सच लिखकर सच को नंगा कर दिया। इससे तुम्हारे अपने दोस्त भी भयानक दुश्मन बन गये। उन्हें लगता था तुम बंबई में रहकर भी भोपाल के भवनों में होने वाली हर छोटी-बड़ी बात को लाखों लोगों तक पहुंचाते रहे। भोपाल छोड़कर तुम्हारे बंबई जाने पर लोगों ने तरह-तरह के सुर्रे छोड़े। यार लोगों ने कहा, ‘हमने शरद को भोपाल से खदेड़ दिया।’ लोग, आज भी जब तुमने भोपाल तो क्या यह संसार ही छोड़ दिया, तब भी तुम्हारे भोपाल से जाने का कारण ढूंढ रहे हैं। बैठे-ठाले लोग ‘परिक्रमा’ के बहाने तुम्हारे ख़िलाफ़ इधर-उधर झूठ बकते रहे। अस्पताल में बिस्तर पर लेटे-लेटे या मानसरोवर के उस छोटे कमरे से तुम भोपाल के भोपालियों के बारे में सोचते रहे, लिखते रहे और हाँ, हर आम आदमी तुम्हें बड़े चाव से पढ़ता रहा प्रतिदिन। एक वर्ग विशेष दोस्तों और दुश्मनों का था, जो तुम्हारी रचनाओं को दूसरे नज़रिये से देखता था, पढ़ता कभी नहीं था। तुम्हारी रचनाओं में दोष निकालने का दुष्प्रयास करता था। इस देश में रुपये का अवमूल्यन ज़रूर हो गया, परन्तु तुम्हारा अवमूल्यन करने वालों को भोपाल छोड़ना पड़ा। व्यंग्यकार होने के नाते तुम्हें अख़बार में वे हमेशा-हमेशा के लिए ‘बन्द’ कर देना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि तुम भोपाल के उच्च भवनों के उच्च लोगों के साथ बैठकर रचनापाठ करो। यह अलग बात है कि भोपाल में रहकर तुमने ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी की हर किताब को चाट डाला था। तुम हमेशा सरल और सहज बने रहे। तुम्हारा भोपाल के प्रति प्रेम इरफ़ाना से तो क्या किसी से भी छिपा नहीं है। लक्ष्मीकांत वैष्णव ने जब आत्महत्या की तो तुम बंबई से दौड़कर आये। जिन दिनों तुम्हें पद्मश्री मिला था, उन्हीं दिनों मेरी तुमसे प्रियदर्शिनी की सीढ़ियों पर लम्बे अर्से के बाद मुलाक़ात हुई थी। अफ़वाहों के बावजूद तुम भारत भवन न्यास के सदस्य नहीं बने। तुममें इन सब कीर्तिमानों के बावजूद कोई फ़र्क नहीं आया। अगर तुममें फ़र्क आया होता तो लोग तुम्हारे आगे-पीछे घूमते। तुम्हारी तारीफ़ में कविताएं लिखते।

लोग कहते हैं तुमने भोपाल छोड़कर ठीक नहीं किया। तुम निर्यात योग्य वस्तु न थे। लोगों के साथ भांग खाते, पापड़ चखते और मालवा की दाल-बाटी सूतते, गुरू! कभी मन होता तो भोपाल से जूनी इन्दौर तक हो आते। तीस बटा एक, तुम्हारे पुराने भोपाली पते से इंडियन कॉफ़ी हाउस आदतन तुम पैदल आ-जा सकते थे। तुम्हारा यार हरि जोशी तुम्हें चकमा देकर छापेखाने से ज़रूर नदारद हो गया। लगता है हरि, लक्ष्मीकांत, रज्जू बाबू से मिलने की जल्दी में तुम सीधे बंबई से उड़ गये। अगर तुम भोपाल में होते तो मैं सही के रिया हूं ख़ां कि हम भोपाली तुम्हें इतनी जल्दी नहीं उड़ने देते। तुम्हें सूखी सेवनिया से वापस ले आते।
भोपाल ने रात की बाँहों में तुम्हें निगलने की कोशिश की। माफ़ी मांगना तुम्हें रास नहीं आया। नौकरियों से नफ़रत और अक्खड़पन, तुम्हारा स्वभाव था। तुमने सरकारी नौकरी से जल्दबाज़ी में तलाक़ ले लिया। व्यंग्यकार का तबादला होना, सस्पेंड होना आदि-आदि उसकी अपनी नियति है। सरकारी नौकरी तो यूँ ही पेंशन होती है। हमारे प्रदेश में छुट्टियों की बढ़ती संख्या देखकर तुम्हें इस बात का एहसास ज़रूर हुआ होगा। सूचना व जनसम्पर्क विभाग वाले हर प्रकार की सरकार से सिफ़ारिश कर तुम्हें प्रदेश में बड़वानी से बस्तर तक ट्रांसफ़र कर-कर के पूरा प्रदेश फोकट में घुमाते। व्यंग्यकार की सेहत के लिए घूमना बहुत ज़रूरी है। सरकारी नौकरी छोड़ने के जुर्म में तुम साठ की उमर में हमेशा-हमेशा के लिए रिटायर कर दिये गये। सरकारी जीप पर सवार इल्लियों की भांति देश तो नहीं परन्तु संपूर्ण प्रदेश का भ्रमण तो तुम कर ही लेते। अंधों का हाथी बनना तुम्हें नहीं सुहाया।
प्रसिद्धि पाने के लिए हर आदमी का पिटना भी ज़रूरी है। अगर कोई न पीटे तो अपनी बीबी से पिटने में ही क्या बुराई है। परन्तु शूरवीर या तो अपनी पत्नी को पीटते हैं या दूसरों की बीवियों से पिटते हैं। प्रेम विवाह के कारण तुम्हारे अपनी बीवी से पिटने के चान्सेज़ बहुत कम थे। परन्तु अगर तुम भोपाल में जमे रहते तो यहां के आज़ाद कॉलेज के आज़ाद छात्रों से पिटने का सौभाग्य तुम्हें इंडियन कॉफ़ी हाउस के पास न्यू मार्केट में ज़रूर प्राप्त होता। इसका फ़ायदा यह होता कि तुम व्यंग्यकार के रूप में शीघ्र प्रतिष्ठित हो जाते। मैं भी प्रसिद्धि पाते-पाते बस रह ही गया। हुआ यूँ कि एक बार उसी जगह मेरे एक शिष्य ने, जिसे मैंने नक़ल करते हुए पकड़ा था, मुझे हमेशा के लिए ‘दी एण्ड’ का अल्टीमेटम दे दिया। बदक़िस्मती से उस दिन मैं बच गया, परन्तु कुछ दिनों बाद मेरे इस विद्यार्थी ने दिल्ली में बैंक रॉबरी कर ख़ूब नाम कमाया।
हर भोपाली नागरिक तुम्हें व्यंग्यकार के रूप में जानने-पहचानने लगा था। इससे शासन में प्रतिष्ठित लोगों को तकलीफ़ होती है। वे कहते हैं व्यंग्य को विधा माना ही नहीं जा सकता! ज़्यादा प्रसिद्धि पाने से व्यंग्यकार जनता को गुमराह कर सकता है। अतः शासन व्यंग्यकारों को एक जगह जमे नहीं रहने देता। किसी को सागर तो किसी को नरसिंहगढ़ तो किसी को अजमेर भेज देता है। यह कार्य हमेशा सार्वजनिक हित में किया जाता है। अपने हित में अपनी बीवियों को भोपाल में ही रखा जाता है। हर सरकार की निजी मंशा होती है कि प्रदेश के हर हिस्से में बसे लोगों से व्यंग्यकारों का साक्षात्कार हो। सरकार की मंशा! तुम दादा! अगर भोपाल में बीमार पड़ते तो केवल भोपाल के ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों के लोग तुम्हें देखने के बहाने आते और सचिवालय जाकर अपने ट्रांसफ़र की जुगाड़ भी लगा आते। हमीदिया अस्पताल पहुँचकर अपनी यारी, फ़र्ज़ निभा लेते और उधर वल्लभ भवन या बंगले पर पहुँचकर सूचना भी दे आते। जिन लोगों ने तुम्हें भोपाल की कला और संस्कृति से दूर रखने की कोशिश की उन्हें भी अंततोगत्वा भोपाल छोड़ना पड़ा।

राजेंद्र प्रसाद सक्सेना
प्रोफ़ेसर, लेखक, व्यंग्यकार, स्तंभकार, अनुवादक एवं वक्ता के रूप में ख्याति। हिंदी व अंग्रेज़ी में विपुल लेखन। लगभग आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। कई पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन के साथ ही आकाशवाणी व दूरदर्शन पर अनेक बार प्रसारित। 1960 के दशक में जेबी प्रीस्ट्ले पर पीएचडी के बाद अध्यापन क्षेत्र में लगभग 40 वर्ष। 2005 में सेवानिवृत्ति यानी पिछले 20 साल से स्वाध्याय, लेखन और अनुवाद आदि कार्यों में रत।
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