
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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अरुण अर्णव खरे की कलम से....
भारतीय व्यंग्य इतिहास का प्रस्थान बिंदु "शिवशंभू के चिट्ठे"
व्यंग्य का मूल स्वभाव विरोध है, यह सत्ता के विरुद्ध एक बौद्धिक प्रतिरोध के रूप में कार्य करता है। व्यंग्यकार के लिए सत्ता केवल राजनीतिक सत्ता नहीं होती, बल्कि वह हर उस वर्चस्व, प्रभुत्व और दमन के विरुद्ध खड़ा होता है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता, विवेक और अधिकारों को बाधित करता है। यह सत्ता चाहे सामाजिक संरचनाओं से उपजी सत्ता हो, सांस्कृतिक रूढ़ियों की हो या आर्थिक असमानताओं की। व्यंग्यकार के लिए सत्ता बहुआयामी होती है। वह राजसत्ता से लेकर जातिगत वर्चस्व, उपभोक्तावादी संस्कृति और धर्म-संप्रदाय के नाम पर किये जाने वाले दमन, पाखंड एवं कूपमंडूपता, सभी को प्रश्न के घेरे में लाता है।
सत्ता का चरित्र प्रायः आत्ममुग्धता वाला होता है। वह प्रशंसा चाहती है, आलोचना से चिढ़ती है, और अपने अंतर्विरोधों को छिपाने का प्रयास करती है। सत्ता की इन्हीं विडंबनाओं से व्यंग्य को विषय मिलते हैं। व्यंग्यकार भाषा, प्रतीकों और लक्षणों के माध्यम से सत्ता की परतों को उधेड़ता है, वह न तो सीधा आक्रमण करता है और न ही चापलूसी, बल्कि एक चुभते हुए प्रश्न की तरह सत्ता की आत्मा को कुरेदता है।
हर काल में राजनीतिक सत्ता सबसे प्रभावी और प्रत्यक्ष सत्ता मानी गयी है, क्योंकि राजनीतिक सत्ता के पास वह औपचारिक शक्ति होती है जिससे आमजन का जीवन प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है। उसकी नीतियाँ, उपेक्षाएँ और निर्णय जीवन की दिशा तय करते हैं। शरद जोशी इस संदर्भ में लिखते हैं- “सत्ता को सबसे अधिक डर व्यंग्य से लगता है, क्योंकि वह शस्त्र भी नहीं और शांति भी नहीं- बल्कि दोनों के बीच की चुभन है।” हरिशंकर परसाई की वाणी इसे और स्पष्ट करती है- “जब शासन सोता है, तब व्यंग्य उसकी नींद में काँटे बिछाता है।”
आधुनिक हिंदी साहित्य में व्यवस्थित और विधागत व्यंग्य लेखन की शुरूआत भारतेन्दु युग (19वीं शताब्दी उत्तरार्ध) से मानी जाती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र इस विधा के जनक कहे जाते हैं। उनके लेखों, नाटकों और निबंधों में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विडंबनाओं पर चुटीला तंज़ देखने को मिलता है। उनके द्वारा लिखित “अंधेर नगरी चौपट राजा” एक विशुद्ध व्यंग्यात्मक नाटक है, जो भ्रष्ट और अराजक शासन व्यवस्था पर करारा प्रहार करता है। भारतेंदु युग के एक अन्य उल्लेखनीय रचनाकार प्रताप नारायण मिश्र थे। हिंदी साहित्य में उनकी प्रतिष्ठा एक ऐसे लेखक के रूप में हैं जिन्होंने व्यंग्य को न केवल साहित्यिक गरिमा दी बल्कि उसे जनता के मनोभावों से भी जोड़ा। उनके लेखन में सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों, धार्मिक पाखंड, अंग्रेजी शासन और नवशिक्षित वर्ग की नकलपरस्ती पर हास्यजनित तीखा व्यंग्य मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में हास्य और कटाक्ष को ऐसा पिरोया कि वह जनमानस को गुदगुदाते हुए गंभीर चिंतन के लिए विवश कर देता है। उनके द्वारा संपादित पत्रिका ‘ब्राह्मण’ (वर्ष 1883 में आरंभ) को हिन्दी व्यंग्य की आधारशिला माना जाता है।
20वीं शताब्दी के प्रारंभ में व्यंग्य का दिशासूचक रूप सामने आया जब बालमुकुंद गुप्त ने राजनीतिक विषमताओं को उजागर करने के लिए व्यंग्य को एक चेतनात्मक औज़ार बनाया। उनके लेखन में व्यंग्य की जो प्रखरता और वैचारिकता है, वह आज भी व्यंग्यकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके द्वारा लिखे गये “शिवशम्भू के चिट्ठे”, हिंदी व्यंग्य के ऐसे दस्तावेज़ हैं, जिसने व्यंग्य के लिए गंभीर और जनोन्मुखी विषयों को रेखांकित किया और आने वाली पीढ़ी के व्यंग्यकारों को एक सशक्त परंपरा प्रदान की। 1903 से 1905 के बीच बालमुकुंद गुप्त ने लार्ड कर्ज़न के शासनकाल पर आठ चिट्ठों की एक तीखी, व्यंग्यात्मक और गहरी लेखमाला प्रस्तुत की, जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य की “सभ्यता” के खोखलेपन की सर्जनात्मक चीरफाड़ दर्ज है। ये सभी लेख ‘भारतमित्र’ समाचार पत्र में छपे, जिसके संपादक गुप्त जी स्वयं थे। ‘शिवशंभू’ एक प्रतीकात्मक पात्र है जो भांग के नशे में देखे गये सपनों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की विडंबनाओं की चीर-फाड़ करता है।
“शिवशंभू के चिट्ठे” केवल पत्र नहीं हैं, बल्कि एक जागरूक नागरिक की विवेकपूर्ण पीड़ा का लेखा-जोखा है। इन चिट्ठियों के शीर्षक ही गुप्त जी की व्यंग्य-दृष्टि की सटीकता को दर्शाते हैं। ये शीर्षक हैं- बनाम लॉर्ड कर्जन (प्रकाशित 11 अप्रैल 1903), श्रीमान का स्वागत (29 नवंबर 1904), वैसराय कर्त्तव्य (17 दिसंबर 1904), पीछे मत फेंकिए (21 जनवरी 1905), आशा का अंत (25 फ़रवरी 1905), एक दुराशा (18 मार्च 1905), बिदाई-संभावना (2 सितंबर, 1905) और बंग-विच्छेद (21 अक्टूबर 1905)। इन चिट्ठों को पढ़ते हुए बालमुकुंद गुप्त की व्यंग्य दृष्टि से परिचित तो हुआ ही जा सकता है, साथ ही उनकी निर्भीकता और बेबाकीपन जैसे व्यंग्य के प्राथमिक औज़ारों का उपयोग करने की विधि को भी सीखा जा सकता है। यहाँ हम उनके इन चिट्ठों से निकलकर आये कुछ सूत्र-वाक्यों पर नजर डालते हैं-
- “हिसाब कीजिए, नुमाइशी कामों के सिवा काम की बात आप कौन-सी कर चले हैं? और भड़कबाज़ी के सिवा ड्यूटी और कर्तव्य की ओर आपका इस देश में आकर कब ध्यान रहा है? आप बार-बार अपने दो अति तुमतराक से भरे कामों का वर्णन करते हैं- एक विक्टोरिया मेमोरियल हाल और दूसरा दिल्ली दरबार। पर ज़रा विचारिए तो ये दोनों काम ‘शो’ हुए या ‘ड्यूटी’?” (बनाम लॉर्ड कर्जन)
- “विक्टोरिया मिमोरियल हाल चन्द पेट भरे अमीरों के एक दो बार देख आने की चीज़ होगा।” (बनाम लॉर्ड कर्जन)
- “जिस पद पर आप आरूढ़ हुए, वह आपका मौरूसी नहीं।” (बनाम लॉर्ड कर्जन)
- “एक बार जाकर देखने से विदित होता है कि वह कुछ विशेष पक्षियों के कुछ देर विश्राम लेने के अड्डे से बढ़कर कुछ नहीं है।” (बनाम लॉर्ड कर्जन)
- “इस समय भारतवासी यह सोच रहे हैं कि आप क्यों आते हैं और आप यह जानते भी हैं कि आप क्यों आते हैं। यदि भारतवासियों का वश चलता तो आपको न आने देते और आपका वश चलता तो और भी कई सप्ताह पहले आ विराजते।” (श्रीमान का स्वागत)
- “आपने इस देश को कुछ नहीं समझा। ख़ाली समझने की शेख़ी में रहे और आशा नहीं कि इन अगले कई महीनों में भी कुछ समझें। किंतु इस देश ने आपको ख़ूब समझ लिया और अधिक समझने की आवश्यकता नहीं रही।” (वैसराय का कर्त्तव्य)
- “यद्यपि आप कहते हैं कि यह कहानी का देश नहीं, कर्त्तव्य का देश है, तथापि यहाँ की प्रजा ने समझ लिया है कि आपका कर्त्तव्य ही कहानी है।” (वैसराय का कर्त्तव्य)
- “आडंबर से इस देश का शासन नहीं हो सकता। आडंबर का आदर इस देश की कंगाल प्रजा नहीं कर सकती। आपने अपनी समझ में बहुत कुछ किया; पर फल यह हुआ कि विलायत जाकर वह सब अपने ही मुँह से सुनाना पड़ा। कारण यह है कि करने से अधिक कहने का आपका स्वभाव है।” (वैसराय का कर्त्तव्य)
- “प्रजा की चाहे कैसी ही दशा हो, पर ख़ज़ाने में रुपये उबले पड़ते हैं। विलायत के प्रधान समाचार पत्र मानो आपके बंदीजन हैं। बीच-बीच में आपका गुणगान सुनना पुण्य कार्य समझते हैं।” (पीछे मत फेंकिए)
- “देशपति राजा और भिक्षा मांगकर पेट भरने वाले कंगाल का परिणाम एक ही होता है।” (पीछे मत फेंकिए)
- “बड़े लाट के रूप में आपके भारत आगमन के समय इस देश के लोगों ने आपसे जो आशाएँ जोड़ी थीं, जो सुख-सपने सँजोये थे, वे सब पल भर में ध्वस्त हो गये। कलकत्ता में आपके पदार्पण के साथ ही नगर निगम की स्वायत्तता का अंत कर दिया गया। (आशा का अंत)
- “यह इस देश के बड़े ही दुर्भाग्य की बात है! माई लार्ड! इस देश की प्रजा को आप नहीं चाहते और वह प्रजा आपको नहीं चाहती, फिर भी आप इस देश के शासक हैं और एक बार नहीं, दूसरी बार शासक हुए हैं।” (आशा का अंत)
- “माई लार्ड को ड्यूटी का ध्यान दिलाना सूर्य को दीपक दिखाना है।” (दुराशा)
- “मेरे जैसा पागल ही राजा के द्वार होली खेलने का सपना देख सकता है!” (दुराशा)
- “विचारिए तो क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गयी! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे।” (विदाई संभाषण)
- “तूने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा; पर मैंने तेरे बिगाड़ने में कुछ कमी न की।” (विदाई संभाषण)
- “अंगरेज़ी सत्ता अब राजा-प्रजा के मेल की नहीं, ज़िद और ज़ुल्म की बीन बजा रही है।” (बंग-विच्छेद)
- “इतिहास के कड़वे कटाक्ष में अब कर्जन भी तुगलक के साथ बैठ सकते हैं।” (बंग-विच्छेद)
बालमुकुंद गुप्त की यह लेखमाला भारत के औपनिवेशिक इतिहास में व्यंग्य के हथियार से लड़े गये पहले सशक्त बौद्धिक संग्रामों में एक है। यह लेखमाला सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि विवेक का आग्रह थी। सत्ता के दंभ पर यह चोट जितनी गहरी थी, उतनी ही लोक-चेतना से भी परिपूर्ण थी। उनकी भाषा में लोक का स्वर, बुद्धि की तीक्ष्णता और देश की कराहती आत्मा एक साथ बोलती थी। यह लेखमाला बताती है कि कलम तलवार से भी पैनी हो सकती है, और कभी-कभी ‘भंगड़ ब्राह्मण’ की भंग में भी एक समूचा आंदोलन जन्म ले सकता है। यह लेखमाला न केवल साहित्यिक विरासत है, बल्कि सत्ता और समाज के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने का सशक्त प्रयास भी। इन चिट्ठियों ने हिंदी साहित्य में व्यंग्य के लिए उर्वर भूमि तैयार की, जिसकी फसल आगे चलकर हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे रचनाकारों ने लहलहायी।

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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बहुत बढ़िया और ज्ञानवर्धक लेख
बहुत बढ़िया और ज्ञानवर्धक लेख
“जब शासन सोता है, तब व्यंग्य उसकी नींद में काँटे बिछाता है।”
औपनिवेशिक काल में राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत कविताओं, लेखों की चर्चा ज्यादातर होती है। वे रचनाएँ आसानी से पढ़ने सुनने में भी आती हैं लेकिन शिव शंभू के चिट्ठों की पड़ताल करते हुए इस लेख से कर्जन के समय की गतिविधियों और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाओं से परिचय हुआ। मैंने ज्यादातर समसामयिक व्यंग्य ही पढ़े हैं, पहली बार ऐतिहासिक व्यंग्य को जाना ।
“अंगरेज़ी सत्ता अब राजा-प्रजा के मेल की नहीं, ज़िद और ज़ुल्म की बीन बजा रही है।” (बंग-विच्छेद)
हार्दिक बधाई सर
जब शासन सोता है, तब व्यंग्य उसकी नींद में काँटे बिछाता है।”
औपनिवेशिक काल में राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत कविताओं, लेखों की चर्चा ज्यादातर होती है। वे रचनाएँ आसानी से पढ़ने सुनने में भी आती हैं लेकिन शिव शंभू के चिट्ठों की पड़ताल करते हुए इस लेख से कर्जन के समय की गतिविधियों और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाओं से परिचय हुआ। मैंने ज्यादातर समसामयिक व्यंग्य ही पढ़े हैं, पहली बार ऐतिहासिक व्यंग्य को जाना ।
“अंगरेज़ी सत्ता अब राजा-प्रजा के मेल की नहीं, ज़िद और ज़ुल्म की बीन बजा रही है।” (बंग-विच्छेद)
हार्दिक बधाई सर