मिर्ज़ा ग़ालिब, mirza ghalib, ghalib
प्रोफ़ेसर अब्दुलकवी दस्नवी लिखित इस तहरीर का अनुवाद मतीन सैयद ने किया और यह बरसों पुरानी एक किताब 'ग़ालिब स्मृति' में छपी थी। मिर्ज़ा ग़ालिब के अवसान दिवस (27.12.1797-15.02.1869) के मौक़े पर यह टिप्पणी प्रो. नौमान ख़ान ने अपने निजी संग्रह से उपलब्ध करवायी है।

भोपाल और मिर्ज़ा ग़ालिब

           सुप्रसिद्ध कवि, मिर्ज़ा असदउल्ला ख़ां “ग़ालिब” का भोपाल से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा। 1857 के ज़माने में ग़ालिब आर्थिक तौर पर बहुत परेशान थे। जब उनकी परेशानी का हाल भोपाल नवाब सिकन्दर जहां बेगम को मालूम हुआ तो उन्होंने ग़ालिब को भोपाल बुलाना चाहा। लेकिन ग़ालिब दिल्ली छोड़ने के लिए तैयार न हुए। तब सिकन्दर जहां बेगम ने अपने मामा, नवाब फ़ौजदार मोहम्मद ख़ां के हाथ गालिब के लिए नज़राने की रक़म दिल्ली भिजवायी। इस आर्थिक सहायता से ग़ालिब बहुत प्रभावित हुए और ख़ुश होकर अपना दीवान (काव्य ग्रन्थ) नवाब फ़ौजदार मोहम्मद ख़ां को पेश किया, जो उनके निजी ग्रन्थालय की शोभा बना और बाद में “नुस्ख़-ए-हमीदिया” के नाम से प्रकाशित हुआ।

इस बात में सन्देह हो सकता है कि ग़ालिब ने अपने हाथ का लिखा हुआ दीवान ख़ुद, नवाब फ़ौजदार मोहम्मद ख़ां को पेश किया या नहीं, परन्तु इस बात में कोई शक नही कि यह दीवान फ़ौजदार मोहम्मद ख़ां के ग्रन्थालय में था। इस दीवान में कई ऐसी रचनाएं थीं, जिन्हें ग़ालिब ने अपना दीवान प्रकाशित करते समय उसमें सम्मिलित नहीं किया था।

भोपाल में मिर्ज़ा ग़ालिब के ग्यारह शागिर्द (शिष्य) थे। जिनमें से दो, मौलाना अब्बास “रिफ़अत” और नवाब यार मोहम्मद ख़ां “शौकत” उल्लेखनीय हैं।

अब्बास “रिफ़अत” अरबी फ़ारसी और उर्दू के आलिम (ज्ञानी) और प्रसिद्ध कवि थे। नवाब भोपाल, सिकन्दर जहां बेगम ने उन्हें भोपाल का इतिहास और क़ानून की किताबें लिखने का काम सौंपा था। उन्होंने 62 किताबें लिखीं। मिर्ज़ा ग़ालिब, अब्बास रिफ़अत के फ़ारसी भाषा के ज्ञान से बहुत प्रभावित थे और उनका आदर करते थे।

मिर्ज़ा ग़ालिब, mirza ghalib, ghalib

नवाब यार मोहम्मद ख़ां “शौकत” जो नवाब फ़ौजदार मोहम्मद ख़ां के सुपुत्र थे, अच्छे कवि थे। ये ग़ालिब के शिष्य बने और बाद में ग़ालिब की सलाह पर अब्बास रिफ़अत के शिष्य बन गये। वह कवियों और साहित्यकारों का बहुत आदर करते थे। उनके निजी ग्रन्थालय में कई अनमोल पुस्तकें थीं।

शिष्यों के अतिरिक्त भोपाल में ग़ालिब के दोस्त नवाब सिद्दीक हसन ख़ां और सैयद अमजद अली अशहरी भी थे।

भोपाल में ग़ालिब के प्रशंसक ही नहीं, आलोचक भी रहे हैं। मुशी शंकरप्रसाद “जोश” ने ग़ालिब की आलोचना के हेतु अपनी पुस्तक ‘मगलूबियत-ए-ग़ालिब” लिखी, जिसमें उन्होंने ग़ालिब पर बड़े तीखे वार किये।

भोपाल के एक साहित्यकार सैयद मुमताज़ हुसैन “सुहा” मुजद्दी ने ग़ालिब की रचनाओं की “शरह” (व्याख्या) लिखी, जो 1928 ई. में “मतालिबुल ग़ालिब” के नाम से प्रकाशित हुई।

यह बात भोपाल के लिए अत्यन्त गौरव की है कि ग़ालिब का प्रायः पूर्ण अप्रकाशित काव्य-संग्रह, भोपाल ही से मिला है। ग़ालिब का पहला कलमी दीवान 1918 ई. में प्राप्त हुआ था जो 1921 ई. में “नुस्ख़-ए-हमीदिया” के नाम से प्रकाशित हुआ और अब 1969-70 ई. में, (जो कि ग़ालिब शताब्दी वर्ष है) उनका एक और कलमी नुस्ख़ा (बयाज़े-ग़ालिब व ख़त्ते ग़ालिब जिसे ‘नुस्ख़-ए-भोपाल सानी” कहना चाहिए, मिला है। यह नुस्ख़ा ग़ालिब ने अपने क़लम से उस समय लिखा था (लगभग 1816 ई. में) जब उनकी आयु केवल 19 वर्ष थी। इस तरह यह ग़ालिब के दीवान का बरसों पुराना नुस्ख़ा है। इसमें कई ग़ज़लें, रुबाइयां आदि ऐसी हैं, जो इससे पहले प्रकाशित नहीं हुईं और जिन्हें गालिब ने क़लम-जद कर दिया था।

इस सदी में भोपाल ने ग़ालिब की अप्रकाशित रचनाओं का अमूल्य ख़ज़ाना साहित्य जगत को पेश किया है, जो ग़ालिब की ज़िन्दगी और शायरी को सही रूप से समझने में अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

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